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ISSN 2292-9754

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03.22.2015


मजदूर औरत

पीठ पर शाल में लिपटे हुए अढ़ाई साल के बच्चे को लेकर जैसे ही वो मजदूर औरत प्रोजैक्ट साईट की डिस्पैंसरी में प्रवेश हुई तो अनायास ही सबका ध्यान उसकी ओर चला गया। पसीने से तर-बतर और हाँफते हुए वह बोली मेरे बच्चे को चोट लग गई है बाबू जी, ज़रा पट्रटी कर दीजिये। वहाँ बैठे प्राथमिक चिकित्सा सहायक ने रोबीले स्वर में उससे पूछा, " कैसे चोट लग गई" तो वो रुआँसे से स्वर में बोली, "कमरे में अपने पाँच साल के भाई के साथ खेल रहा था, बाबू जी। दरवाज़े की चौखट और पल्ले के बीच बायें हाथ का अँगूठा आ गया।"

"तुम कहाँ थी उस वक्त," प्राथमिक चिकित्सा सहायक ने जैसे सवालों की झड़ी ही लगा दी थी।

"मैं और मेरा आदमी तो रोज यहाँ काम पर आ जाते हैं, साहब। दोनों बच्चे कमरे में ही रहते हैं।" "अच्छा दिखाओ,इस बार प्राथमिक चिकित्सा सहायक की आवाज में नरमी थी। उसने अपने बच्चे को पीठ से उतारकर गोद में लिया, जो दर्द से कराह रहा था।

जैसे ही प्राथमिक चिकित्सा सहायक ने बच्चे की उंगली पकड़ी तो वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लग गया। बच्चे की चीखों से डिस्पैंसरी के उस कमरे में मौजूद चार-पाँच लोगों सहित रोबीले से दिखने वाले चिकित्सा सहायक का दिल जैसे पसीज सा गया था। उसने बच्चे का ज़ख्म साफ़ किया और उसकी मरहम पट्टी की और पेन किल्लर का इंजेक्शन लगा दिया। फिर उसने उस औरत को कुछ दवाई दी और एक काग़ज़ पर कुछ लिखते हुए बोला कि ये लो, ये दवाई बाज़ार से ले लेना। काग़ज़ को हाथ में लेते हुए वो मजदूर औरत कुछ सोचने लगी.....।

"क्या हुआ......अब क्या सोच रही हो.....?" चिकित्सा सहायक के स्वर दोबारा से तल्ख़ हो उठे थे।

तभी वहाँ पर बैठा साईट इन्जीनियर शेखर जो अभी तक एक ज़रूरी फोन कॉल अटैंड कर रहा था, ने उस औरत को सहज भाव से कहा कि आपके बच्चे की मरहम-पट्टी कर दी है, अब आप घर जाइए और बाज़ार से दवाई ले लीजिए।

इतना सुनते ही उस औरत की आँखों में आँसू आ गए।

"दवा-दारू कहाँ से करेगें, हम गरीब लोग हैं बाबू जी....! मैं और मेरा आदमी तो दिन भर यहाँ काम करते हैं। हमारे गाँव में पिछले साल बाढ़ आई थी, जिसमें खेत-खलिहान, मकान सब बह गए। घर में और लोग भी हैं जिन्हें हर महीने रुपए भेजने पड़ते हैं, इसीलिए यहाँ दूर परदेश में मर-खप रहे हैं।"

इतना सुनते ही शेखर ने जेब से 500 रुपए निकाले और उस औरत के हाथ में थमा दिए और भावुकता के आवेश में बिना कुछ कहे ही कमरे से बाहर निकल गया। वो औरत निश्चल नेत्रों से हाथ जोड़ उसे जाते देखती रही। चिकित्सा सहायक और अन्य लोग बिना कुछ कहे अब भी उस औरत को देख रहे थे। बच्चे की चीखें शांत हो गई थी, शायद पेन किल्लर ने अपना असर दिखा दिया था।


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