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ISSN 2292-9754

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01.31.2016


 बाज़ार

बाज़ार आख़िर क्या है
इंसानी ज़रूरतों को
पूरा करने के लिए इजाद की गई
एक प्राचीन व्यवस्था
मोल – भाव करते
इंसानों का जमघट
या फिर किसी गरीब बच्चे की
न पूरा होने वाली इच्छाओं को
चिड़ा देने वाला सम्मोहन ?

बाज़ार आख़िर क्या है ?
एक अमीर के लिए
सुख - सुविधाओं के साधन
जुटाने की जगह
और एक ग़रीब के लिए
चार निवाले भर
कमा लेने की कशमकश।

बाज़ार हर आदमी के लिए
अलग अर्थ लिए हुए है
हर रोज़ खुलता है बाज़ार
और शाम को बंद होते - 2
छोड़ जाता है कई सवाल।

उस बड़े दूकानदार के लिए
जिसे मुना्फ़ा तो हुआ मगर
पिछले कल जितना नहीं
एक मध्यम वर्गीय गृहणी के लिए
जो खींच लाई है बिलखते बच्चे को
खिलौनों की दुकान से
मात्र दाम पूछकर ही
इस बहाने से
कि अच्छा नहीं है वह खिलौना
और ग़रीब भोलू के लिए भी
जिसकी रेहड़ी से नहीं बिका है आज
एक भी हस्त - निर्मित सजावटी शो पीस।

अपने–अपने सवालों के चक्रव्यूह में
अभिमन्यु सा फँसते जा रहे हैं
वह बड़ा दुकानदार
मध्यम वर्गीय गृहणी
और गरीब भोलू भी।

कल फिर खुलेगा बाज़ार
मगर क्या भेद सकेंगे वे सब
अपने-अपने
सवालों के चक्रव्यूह को?


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