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ISSN 2292-9754

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12.30.2015


और क़त्ल हो गया बचपन

(16 दिसम्बर,2014 को पाकिस्तान के पेशावर में आर्मी स्कूल में हुए आतंकी हमले से आहत होकर लिखी गई रचना)

रोज़की ही तरह,
वो गए थे स्कूल,
ये सोचकर कि शायद,
मिलेगा आज भी कुछ,
नया सीखने कोl

वो लेकर लौटेंगे,
कुछ नई बातें,
इस उम्मीद के साथ भी,
माँ ने किया था तैयार उन्हें,
और करवाया था सुबह का नाश्ताl

और फिर ममता से भरे,
उस चिंतित हृदय ने,
कितनी ही बार समझाया,
कि बेटा शरारत मत करना,
पढ़ाई करना मन लगाकरl

मगर नहीं जानता था,
उस माँ का हृदय,
कि नहीं लौटेगा,
उसके जिगर का टुकड़ा,
दोपहर के बाद घर कोl

वह चढ़ जाएगा भेंट
उन चन्द लोगों की,
रुग्ण मानसिकता का,
निज संबेदनाओं की,
अर्थी उठाकर,
जो क़त्ल कर देते हैं,
मासूम बचपन को भीl

मज़हब के नाम पर,
ये गुमराह लोग,
क्यों बन बैठे हैं पाषाण,
जो कर रहें हैं लज्जित,
उस माँ की कोख को भी,
जिसने इन्हें कभी दिया था जीवनl


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