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05.03.2012
 

ये न कह पाऊँगा कि तुझसे मुहब्बत है बहुत
मनोज अबोध


ये न कह पाऊँगा कि तुझसे मुहब्बत है बहुत
लेकिन ए दोस्त, मुझे तेरी ज़रूरत है बहुत

मैं जिसे चाहता हूँ मुझको वो ही मिल जाए कहीं
मेरे मालिक की यही मुझपे इनायत है बहुत

रोज़ कहती है नदी-अब तो उतर जा मुझमें
तेरी तो मुझमें समा जाने की हसरत है बहुत

अबके जाओ तो ज़रा लौट के जल्दी आना
घर की अँगनाई को इस फूल की आदत है बहुत

उसको क़ुरबत नहीं मुझसे ये अलग बात है, पर
जानता हूँ कि उसे आज भी चाहत है बहुत


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