सुर्ख़ होठों पे उँगलियों की तपिश मनोज अबोध
सुर्ख़ होठों पे उँगलियों की तपिश जैसे फूलों पे तितलियों की तपिश उसको छूना था हादसा, जैसे गीले हाथों पे बिजलियों की तपिश रात होते ही जाग जाती है बंद कमरों में सिसकियों की तपिश खो गए स्वप्न फिर भी बाकी है बुझती आँखों में मस्तियों की तपिश तेज़ बारिश में जिस्म जल उठ्ठे कितनी पागल थी बदलियों की तपिश