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01.16.2009
 

सुर्ख़ होठों पे उँगलियों की तपिश
मनोज अबोध


सुर्ख़ होठों पे उँगलियों की तपिश
जैसे फूलों पे तितलियों की तपिश

उसको छूना था हादसा, जैसे
गीले हाथों पे बिजलियों की तपिश

रात होते ही जाग जाती है
बंद कमरों में सिसकियों की तपिश

खो गए स्वप्न फिर भी बाकी है
बुझती आँखों में मस्तियों की तपिश

तेज़ बारिश में जिस्म जल उठ्ठे
कितनी पागल थी बदलियों की तपिश


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