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05.03.2012
 

मेरी नज़रों का धोखा हो ऐसा भी हो सकता है
मनोज अबोध


मेरी नज़रों का धोखा हो ऐसा भी हो सकता है
वो भी मेरा ही चेहरा हो ऐसा भी हो सकता है

छान दिए सब पर्वत जंगल जिसकी चाहत में मैंने
वो भी मुझको ढूँढ रहा हो ऐसा भी हो सकता है

सोते-सोते हिचकी आई, जागा, सोचा ध्यान किया
उसने मुझको याद किया हो ऐसा भी हो सकता है

खुशबू आई, शायद उसने आँचल को लहराया हो
उसके आँगन फूल खिला हो ऐसा भी हो सकता है

देख के उसको फैल गया है कैसा उजाला आँख में
मन के अन्दर दीप जला हो ऐसा भी हो सकता है

नींद नदारद आँखों से है बीत गई है आधी रात
वो भी अब तक जाग रहा हो ऐसा भी हो सकता है


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