अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 

मेरी मंज़िल का पता दे, राहबर कोई तो हो
मनोज अबोध


मेरी मंज़िल का पता दे, राहबर कोई तो हो
जो मुझे उससे मिला दे रहगुज़र कोई तो हो

पाँव यदि थक जाएँ भी तो सोच थक पाए नहीं
अनवरत चलता रहे ऐसा सफ़र कोई तो हो

दिल-से-दिल के फ़ासले ये नफ़रतों का कारोबार
जिसमें सब मिलकर रहें ऐसा नगर कोई तो हो

तट से मिलकर फिर न पलटे, सो रहे, गुम हो रहे
तुझमें ऐ बहती नदी ऐसी लहर कोई तो हो

जिस तरफ़ देखो, उधर उलझी हुई पगडंडियाँ
वन में जीवन के मगर सीधी डगर कोई तो हो


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें