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05.03.2012
 

मेरा होना...... 
मनोज अबोध


कई बार लगता है कि
मैं नहीं हूँ

मेरा होना...
तुम्हारे लिए-
सिर्फ़ एक गुदगुदा अहसास-भर था
जो समय के साथ
घनीभूत पीड़ा में बदल गया है
होकर भी यूँ ..
मेरा न होना
तुम्हारे अस्तित्व को छल गया है

गहरी नींद से चौंककर जागी
तुम्हारी आँखों के जलते रेगिस्तान को
ज़रूरत थी जब-
मेरे पोरों के शीतल स्पर्श की
कहाँ था.. मैं ?

पलकों की मुँडेरी पर झिलमिलाते
आँसुओं की कतार को
ज़रूरत थी जब-
मेरे अधरों के भगीरथ की,
उस गंगोत्री को
अपने अंतस तक प्रवाहित करने के लिए ..
कहाँ था.. मैं ?

वक्त के खौफ़नाक अंधड़ में
स्वाभिमान से खड़े रहने के
संघर्ष में हलकान..
तुम्हारे शुभ्र ललाट को
ज़रूरत थी जब-
मेरे मजबूत कंधों की
कहाँ था.. मैं ?

उद्दीप्त यौवन के उत्कर्ष में
विछोह की लहरों से जूझती
तुम्हारी चंदन-देह को
ज़रूरत थी जब-
मेरे भुजपाश की
कहाँ था.. मैं ?

प्रतीक्षा की तीक्ष्ण दुपहरी में
झुलसकर अहिल्या बनते
तुम्हारे सर्वांग को
ज़रूरत थी जब-
मेरे राम-नामी स्पर्श की
कहाँ था.. मैं ?

कहीं ऐसा तो नहीं
एक-दूजे की आँखों से
दुनिया देखने का हमारा सपना
मुठ्ठी में बंद रेत की मानिन्द
फ़िसल गया है ?
होकर भी यूँ
मेरा न होना
तुम्हारे अस्तित्व को छल गया है..

कई बार लगता है कि
मैं.. नहीं हूँ
मेरा होना
तुम्हारे लिए
सिफ एक गुदगुदा अहसास-भर था
जो समय के साथ
घनीभूत पीड़ा में बदल गया है
घनीभूत पीड़ा में बदल गया है ।।


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