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06.03.2012


मनोज अबोध के मुक्‍तक

( 1 )
आपसे फिर मिलन, हो न हो।
फिर ये दीवानापन, हो न हो।
आज रोको न संवेग को.....
प्रीत का फिर सृजन, हो न हो।
( 2 )
कुछ हृदय से यतन कीजिए।
प्रीत का अंकुरण कीजिए।
मात्र अर्पण समर्पण नहीं...
प्रीत का वन सघन कीजिए।
( 3 )
अनकही-सी कहन के लिए।
अनछुई-सी छुअन के लिए।
आइये, पास आ जाइए ...
अनचुभी-सी चुभन के लिए।
( 4 )
चित्‍त का उत्‍खनन तो करो।
सत्‍य का आकलन तो करो।
प्रेम क्‍या सिर्फ़ मिलना ही है..
थोड़ा चिंतन मनन तो करो।
( 5 )
नेह का संकलन प्रेम है।
भावना का सृजन प्रेम है।
ब्‍याज में प्रेम दो याकि लो...
प्रेम का मूलधन प्रेम है।
( 6 )
सत्‍य का बहुवचन प्रेम है।
शून्‍य का आकलन प्रेम है।
तुम गुणा करके भी देख लो..
प्रेम का आयतन प्रेम है।
( 7 )
पांव में कब थकन चाहिए।
बस, हृदय में तपन चाहिए।
प्रेम में त्‍याग बलिदान का..
अनवरत इक हवन चाहिए।
( 8 )
शत्रुता का हनन तो करो।
नेह भीगा कथन तो करो।
भाव रखकर सघन प्रेम का..
मित्रता का जतन तो करो।
( 9 )
भावनाओं में यूं ना बहो।
जो भी कहना है खुल के कहो।
था समय तो ना कुछ कह सके
हो ये अफ़सोस, ऐसा न हो।
( 10 )
ठीक है, दिल में सबके रहो।
प्रेम-धारा के सँग-सँग बहो।
लौटकर वक्‍त़ आता नहीं ..
वक्‍त है, कुछ तो अपनी कहो।


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