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| 01.16.2009 |
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चढ़ते दरिया को अभी पार भी करना है मुझे |
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चढ़ते दरिया को अभी पार भी करना है मुझे सिर्फ़ झगड़ा ही कराना मेरी आदत क्यों हो याद है आपके अहसान ज़ुबानी मुझको ये ही बेहतर है उसे और न रोकूँ टोकूँ जागते रहने की पूछी जो वजह, तो बोले |
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