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05.03.2012
 

 बिन बरसा इक बादल-सा
मनोज अबोध


बिन बरसा इक बादल-सा
मन है गुमसुम पागल-सा

अबके वो रोया ऐसे
हर आँसू गंगाजल-सा

आँखे छल-छल करती हैं
पर चेहरा है निश्छल-सा

ज़िद करता है बच्चों-सी
प्यार करे है पागल-सा

जब भी मिलता हूँ उससे
लग जाता है साँकल-सा

बाबा जब तक घर में थे
इक साया था पीपल-सा


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