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05.03.2012
 

 औरत और अख़बार
मनोज अबोध


रो की तरह
श्रीमती जी का चढ़ा हुआ था पारा
चिरपरिचित अंदाज में
उन्होंने हमे लताड़ा -
अलसुब्ह से ही
आँखों पर चढ़ाकर के चश्मा
डूबे रहते हो मरदुए अख़बार में
कतरने-टाइटिल-स्टोरी
यहाँ से नकल - वहाँ से चोरी
अरे! अख़बार निकालने के अलावा भी
बहुत कुछ है संसार में !
कभी मुझपर भी ध्यान दिया करो
मेरी साड़ी..
मेरे स्टाइल की भी तारीफ़ किया करो

हमने तुरन्त ख़तरे को आँका
चश्मे के पिछवाड़े से
श्रीमती जी की आँखों में झाँका
और/पेप्सोडेन्टी मुस्कान के साथ
कुछ इस तरह समझाया-
सुमुखी!
तुम और अख़बार
यही तो है मेरे जीने का आधार
दोनों से ही मुझे सच्चा है प्यार
तुम मुझे समझती हो
ये तुम्हारी महानता है
सच बात तो ये है कि
तुम औरतों और अख़बार
दोनों में बहुत सारी समानता है !

तुम, औरत हो या अख़बार
दोनों का एक-सा है व्यवहार
दोनों के ही तैयार होने में
बहुत वक्त लगता है
दोनों की ही रहती है कोशिश
कि, उनकी नकल पड़ोसी न कर ले

दोनों की ही सजधज और स्टाइल में
बदलाव करते रहना है मजबूरी
क्योंकि- औरत हो या अख़बार
दोनों का
सुन्दर लगना है बेहद ज़रूरी

दोनों का ही स्टेटमेन्ट होता है ’फ़ाइनल‘
दोनों जहाँ-जहाँ जाते हैं
अपने साथ
कई कच्ची-पक्की ख़बरें लाते हैं !
स्त्री हो या अख़बार
यदि कुछ अलग हटकर हों तो
दूर-दूर तक इनका नाम होता है
कहीं भी झगड़ा करा देना
इनके बाँए हाथ का काम होता है !
अब तो यह बात भी है जग-ज़ाहिर
कि/ दोनों अपने-अपने क्षेत्र में
हफ्रता वसूलने में भी होते हैं माहिर !

औरत हो या अख़बार
दोनों में
सबसे बड़ी समानता यही होती है
कि/पुराने संस्करण की
कहीं भी ’डिमाण्ड‘ नहीं होती है!
सही बात तो ये है यार
कि/औरत हो या अख़बार
हर पुरुष के पास अपना होना चाहिए
पड़ोसी पर निर्भर रहना
हमेशा नहीं चलता है
क्योंकि/दूसरे का अख़बार पढ़नेवाला
कई बार
सिर्फ़ हाथ मलता है ।।


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