मनोज अबोध

कविता
औरत और अख़बार
मनोज अबोध के मुक्‍तक
मेरा होना......  
दीवान
अपने आप से लड़ता मैं
उसपे मर मिटने का ...
एक टूटी छत लिए ...
कुछ वो पागल है ...
कैसे उसको छोड़ूँ ...
क्या होगा अंजाम, न पूछ
घरों के द्वार से परदे उड़ा
चढ़ते दरिया को अभी पार
तुमसे मिलना बातें करना
तू मेरी सोच पे हावी है
दिल दीवाना एक तरफ़
न तो इंसां न अप्सरा कोई
बिन बरसा इक बादल-सा
मिलके चलना बहुत ज़रूरी है
मेरी नज़रों का धोखा हो
मेरी मंज़िल का पता दे
मेरे भीतर महक रहा है
ये तो तय है मुश्किल से
ये न कह पाऊँगा कि ....
सुर्ख़ होठों पे उँगलियों ...