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मालूम नहीं उनको ये मैं कौन हूँ, क्या हूँ
सहराओं के सन्नाटों में इक शोर-ए सदा हूँ
कितने ही मुसाफ़िर यहाँ सुस्ता के गये है
मैं मील के पत्थर -सा सर-ए-राह खड़ा हूँ
इक ख़्वाब-ए-शिकस्ता हूँ मैं फिर जुड़ नहीं सकता
माना कि कभी उनकी निगाहों में रहा हूँ
उस शहर-ए-निगाराँ में मैं लौट आया हूँ आख़िर
जो अहद किया था कभी अब भूल चुका हूँ
आवाज़ के पत्थर से न तुम तोड़ सकोगे
आईना नहीं यारो ! मैं गुम्बद की सदा हूँ
वो और थे जो ख़ाक हुए बर्क़-ए-नज़र से
मैं अपनी ही साँसों की हरारत से जला हूँ
जुगनू नहीं मुझको वो हथेली पे न रक्खे
जलता है जो तूफ़ाँ में वो मिट्टी का दिया हूँ
वो भूल गये हों मुझे ये हो नहीं सकता
‘साग़र’! मैं सदा जिनके ख़्यालों में रहा हूँ
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