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| 07.13.2008 |
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अपने ही परिवेश से अंजान है |
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अपने ही परिवेश से अंजान है हर डगर मिलते हैं बेचेहरा—से लोग भावना को मौन का पहनाओ अर्थ चाँद पर शायद मिले ताज़ा हवा कामनाओं के वनों में हिरण—सा नाव मन की कौन —से तट पर थमे आओ चलकर जंगलों में जा बसें साँस का चलना ही जीवन तो नहीं खून से ‘साग़र’! लिखेंगे हम ग़ज़ल |
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