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02.18.2014


वैध हो मानव अंगों का व्यापार
(मनोहर पुरी के नए उपन्यास जिन्दगी और जुगाड़ के अंश)

ज़िन्दगई और जुगाड़डाक्टर बाजपेई की रुचि जीवित शरीर की अपेक्षा मुर्दा अथवा मरने वाले शरीर में अधिक होती है, इस बात को उनके छात्रों ने कई बार लक्ष्य किया है। एक बार जब वह कक्षा में शल्य क्रिया के विषय में पढ़ा रहे तो उनके एक मुँह लगे छात्र रमेश यादव ने पूछा, “सर आप मुर्दा शरीर को जिन्दा व्यक्ति से अधिक महत्व क्यों देते हैं।”

“क्योंकि जीवित व्यक्ति इतना मूर्ख होता है कि वह अपने शरीर के किसी भी अंग को किसी भी मूल्य पर बेचने के लिए तैयार नहीं होता। कितना भी गरीब आदमी हो। भले ही उसे भूखा रहना पड़े अपना कोई अंग नहीं बेचता तो उससे हमें क्या लाभ। वह इस बात के विषय में सोचता ही नहीं कि यदि वह भूख से मर गया तो इन अंगों का क्या होगा। इससे किसी को कोई लाभ नहीं होगा। उसके सब अंग बेकार ही जला दिए जायेंगे अथवा मिट्टी में दबा दिए जायेंगे। मुर्दा शरीर के किसी भी अंग को आप बेचें उसे कोई आपत्ति नहीं होगी।” डाक्टर ने बहुत ही सहज भाव से एक सफल व्यापारी की भान्ति उत्तर दिया।

“तो आपकी संस्था देहदान की बात न करके देह बेचने की बात क्यों नहीं करती?” एक अन्य छात्र ने पूछा।

“दुर्भाग्यवश हमारे देश का कानून इसकी आज्ञा नहीं देता। वैसे यदि व्यक्ति को अपनी देहदान करने का अधिकार है तो बेचने का भी होना ही चाहिए। आखिर आप उसी वस्तु का दान कर सकते हैं जो आपकी है और जो वस्तु आपकी है उसे बेच क्यों नहीं सकते। जिसकी गर्ज हो वह खरीदे इससे हजारों लोंगो को जीवन दान मिलेगा।” उन्होंने तर्क दिया।”

थोड़ा रुक कर फिर बोले, “उदाहरण के रूप में परिवार वाले मरने के बाद अपने मृतक की आँखें दान कर सकते हैं। कुछ कर भी देते हैं। देश में फिर भी असंख्य अंधे हैं। मेरा दावा है कि यदि परिवार वालों को मृतक की आँखें बेचने का अधिकार दे दिया जाए तो देश तो क्या पूरे विश्व में एक भी अन्धा नहीं बचेगा। यदि व्यक्ति को अपने जीवन काल में अथवा मरने के बाद उसे अथवा उसके परिवार वालों को अंग बेचने का अधिकार दे दिया जाए तो मृतक के अन्तिम संस्कार पर होने वाले भारी भरकम व्यय को ले कर उसके सगे संबंधी आपस में झगड़ना बंद कर देगें। फिर यह कहावत बेमानी हो जायेगी “सांझा बाप न रोये कोय” क्योंकि अंग बेचने से होने वाली आय के हिस्से बाँटने के लिए इतने अधिक वारिस अचानक पैदा हो जायेगें कि रोने वालों की लाइन लग जायेगी। आँसुओं की बाढ़ आ जायेगी।”

“रोने वालों की नहीं सर बंटवारा करने के लिए झगड़ने वालों की । तब लाश के वारिस शरीर पर कब्जा करने के लिए कुत्तों की तरह से लड़ेगें।” राजरानी ने चुटकी ली।

“पर आप तो बात दान की करते हैं और चाहते हैं कि मानव अंगों का क्रय विक्रय मण्डी में किया जाये।” एक व्यापारीनुमा छात्र हजारी प्रसाद ने कहा।

“जहाँ तक दान की बात है भारत में आज भी उसे आदर की दृष्टि से देखा जाता है। हमारे देश में दान को पुण्य का कार्य माना जाता है। पुण्य होता है स्वर्ग का द्वार खोलने की चाबी। इसलिए हर कोई उस चाबी को प्राप्त करना चाहता है। क्योंकि लालच मानव का शाश्वत गुण है इसलिए वह मरने के बाद भी स्वर्ग के लालच से फँसा रहता है। हम लोंगो की इसी कमजोरी का लाभ उठाते हैं। हमारी संस्था द्वारा समय समय पर बड़े बड़े आयोजन करके लोगों को यह बताया जाता है कि मरने के बाद हमारा शरीर किसी काम का नहीं रहता। यह एक ऐसा सत्य है जिसे कोई झुठला नहीं सकता। शरीर के अंगों को जला कर अथवा दबा कर और भी बेकार कर दिया जाता है। वह राख हो जाता है अथवा मिट्टी हो जाता है। इतनी मूल्यवान वस्तुओं को राख अथवा मिट्टी बना देना कहाँ की बुद्धिमानी है। इससे शरीर की पूरी उपयोगिता ही समाप्त हो जाती है। जबकि देश के सैंकड़ों मेडीकल कॉलेजों में हजारों छात्रों को इनकी बहुत अवश्यकता पड़ती है। मुर्दा शरीरों के अभाव में हमारे हजारों छात्र चिकित्सा के क्षेत्र में कई प्रकार के प्रयोग करने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे शरीरों के अभाव में वे मानव के शरीर की बारीकियों को समझ भी नहीं पाते। यदि हमारे छात्र मानव शरीर की ऐसी बातों का अध्ययन ठीक से कर पायें तो नई नई औषधियों की खोज की जा सकती है। उन दवाइयों के प्रयोग से हजारों लोगों के प्राणों की रक्षा करने में सफलता मिल सकती है।” डाक्टर बाजपेई ने उत्तर दिया।

 “खरीदने बेचने की बात को तो आपने बीच में ही छोड़ दिया सर।” एक छात्र ने अपना मुँह डैस्क में छिपाते हुए प्रश्न किया।

“खैर जिसने भी यह प्रश्न किया है। अच्छा प्रश्न किया है। आज देश में कितने ही मरीज ऐसे हैं जिन्हें किसी न किसी अंग के अभाव में जिन्दा रहना पड़ रहा है। कितने ही लोग ऐसे हैं जिनका जीवन सभी सही सलामत अंगों के साथ भी एक मुर्दे का सा ही है। उन्हें हम जिन्दा लाशें भी कह सकते हैं। इस प्रकार दोनों को एक दूसरे की आवश्यकता है। आप सब जानते हैं कि मानव के कुछ अंग ऐसे हैं जिन्हें किसी दूसरे को दिया जा सकता है। तो फिर क्यों न एक दूसरे की सहायता की जाए। जिसके पास धन है वह धन दे और जिसके पास अतिरिक्त अंग है वह अंग दे। बस साफ सुथरा लेन देन का मामला है। सरकार को इसमें टाँग अड़ाने की कोई आवश्यकता ही नहीं है।” डाक्टर साहब ने सविस्तार समझाते हुए उत्तर दिया।

“तो आपका यह मानना भी है कि मरने के बाद मनुष्य के शरीर का विधिवत क्रियाकर्म न करके उसे दान कर दिया जाए,” राजरानी ने जिज्ञासा की।

“बिल्कुल। शरीर को जला कर बेकार करने से तो अच्छा है इसे छात्रों के अध्ययन के लिए दान में दे दिया जाए अथवा बाजार में बेच दिया जाए । इससे जहाँ हजारों छात्रों को उनकी पढ़ाई में लाभ होगा वहीं मरने वाले के परिवार को अनेक प्रकार की उलझनों से छुटकारा मिल जायेगा। क्रियाकर्म जैसे बेकार के कामों पर हमारे गरीब देश में प्रतिदिन करोड़ों रुपए स्वाहा कर दिए जाते हैं। लोग मृत्यु भोज और श्राद्ध कर्मो के लिए बनिए अथवा साहूकार से उधार ले कर जिन्दगी भर गुलामी की चक्की में पिसते रहते हैं। मरने वाला तो मर जाता है उसके जिन्दा बचे परिवार वालों की गाढे पसीने की कमाई निठल्ले पंडे हलवा पूड़ी के रूप में डकार जाते हैं। इस काम के लिए प्रतिदिन लाखों मन लकड़ी जला दी जाती है। जिस देश में ईंधन का अकाल हो वहाँ इस प्रकार से ऊर्जा के स्रोत को नष्ट करना कहाँ की समझदारी है। बल्कि मैं तो कहूँगा कि यह एक प्रकार का अपराध ही है। इतना ही नहीं इस बेकार के काम के लिए हम प्रतिदिन हरे भरे जंगल काट कर पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ रहे हैं।” उन्होंने जोश में भर कर कहा।

फिर एक अर्थशास्त्री की भान्ति बोले, “इतना ही नहीं इस प्रकार से शवों को नष्ट कर देने की और भी बहुत सी हानियाँ हैं। एक एक शव यात्रा में सम्मिलित होने के लिए कितने ही मानव श्रम घंटों की बर्बादी की जाती है। यदि उतन मानव श्रम घंटों का उपयोग सजृनात्मक आर्थिक गतिविधियों में किया जाए तो हमारा देश कुछ ही समय में दुनिया का सबसे अमीर देश बन सकता है। शवों को ढोने के चक्कर में हम अपने देश की गरीबी को ढो रहे हैं। एक देहदान अथवा देह विक्रय से देश का, समाज का और स्वयं हमारा अपना कितना लाभ हो सकता है इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।”

“हमारा समाज एक धर्मपरायण समाज है। फिर हमारी धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं का क्या होगा।” रमेश बोला।

“होगा क्या। नई मान्यताएँ बनेंगीं। क्या हमारे ऋषि मुनियों ने हमारा मार्ग दर्शन इस विषय में नहीं किया। क्या दीधिची ने देहदान करके अपनी अस्थियाँ देवताओं को नहीं दीं जिससे इन्द्र ने व्रज नामक अस्त्र बनाया और दानवों का संहार किया।” डाक्टर साहब ने उत्तर दिया।

“इस विषय में आपने भी तो कोई आदर्श स्थापित किया होगा, स,” एक छात्र ने चुटकी लेने के अन्दाज में कहा।

“जब मेरे पिता जी का देहान्त हुआ तो मैंने उनके शव को कूड़े के ढेर पर फिंकवा दिया था। मैं पंडों के चक्कर में फँस कर पैसे की बर्बादी करना नहीं चाहता था। मुझे लगा कम से कम उनका शरीर चील कौओं के खाने के काम ही आयेगा। जिन्दगी में तो उन्होंने किसी पक्षी को दाना चुगाया नहीं होगा। मर कर उनका चुगा बन सके यही बहुत है।”

“कमाल का काम किया सर। पर आपको इसकी प्रेरणा कहाँ से मिली,” शीला ने एक पत्रकार की भान्ति प्रश्न किया।

“हमारे देश में भी पारसी समाज है जो इस तरह अपने मुर्दों की उपयोगिता को प्रयोग में लाता है।”

“सुना है जब आपके बेटे का एक ही वर्ष की आयु में देहान्त हो गया तब भी आपने कुछ ऐसा ही करिश्मा किया था।” राज रानी ने कहा।

“तब मैंने उसकी लाश को नदी में डाल दिया था ताकि मछलियाँ उसके शरीर से अपनी भूख मिटा सकें और फिर वही मछलियाँ हमारे भोजन का हिस्सा बन कर हमारी खाद्य समस्या के समाधान में योगदान दे सकें ।” डाक्टर बाजपेई ने बिना किसी झिझक के उत्तर दिया। .................

“हमारी सरकार से माँग है कि कम से कम दुर्घटना में मरने वाले व्यक्ति की लाश हस्पतालों की सम्पति मान ली जाए। यदि इतना करना भी संभव न हो तो लावारिस लाश पर तो हमारा हक स्वीकार कर ही लिया जाए। वैसे भी सरकार के लिए उसे ठिकाने लगाना ही एक समस्या है। इस प्रकार इतनी बड़ी समस्या का सहज ही समाधान भी हो जायेगा।” डाक्टर साहब बोले।

“तो सरकार का इस बारे में क्या कहना है। उसे तो किसी प्रकार की आपत्ति होनी ही नहीं चाहिए। मैंने सुना है कि इसके लिए सार के पास धन ही नहीं है। जितने पैसे सरकार ईंधन के लिए देती है उतने से लाश जलाई नहीं जा सकती। मिट्टी का तेल डाल कर किसी तरह से लाशों को निपटाया जाता है।” राजरानी ने जानकारी दी।

“अरे यही तो मैं कह रहा हूँ। वैसे यही तो इस देश का दुर्भाग्य है। कभी धर्म आड़े आ जाता है तो कभी कमबख्त समाज। इन दोनों से छुटकारा मिले तो कोई न कोई कानूनी अड़चन सामने आ खड़ी होती है। कमबख्त लाशों पर भी इस तरह से कुंडली मार कर बैठ जाते हैं जैसे साँप गड़े हुए धन पर। भाई इससे किसी को लाभ होता है तो होने दो तुम्हारे बाप का क्या जाता है। व्यापार का कोई नया रास्ता खुलता है तो खुलने दो। इतने पर भी मन न भरे तो टैक्स लगा लो। सरकार को तो टैक्स लगा कर जनता का खून ही चूसने से मतलब है न। कोई मरे अथवा जीवित रहे उसे क्या। वैसे भी ऐसी कौन सी चीज है जिस पर आपने टैक्स नहीं लगा रखा। इस पर भी लगा ले क्या फर्क पड़ता है इस देश की जनता को। उसे तो आदत है सरकार रूपी जौंक से खून चूसवाने की।” डाक्टर आक्रोश में भर कर बोले। ........

उन्होंने आगे कहना शुरू किया, “वैसे भी मृतक के परिवार को कदम कदम पर इस मामले में कुछ न कुछ खर्च करना ही पड़ता है। इसके विपरीत यदि उसे लाश बेच कर कुछ धन मिलने लगेगा तो यह व्यापार जल्दी ही उद्योग की श्रेणी में आ जायेगा इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं। आखिर चीन हर क्षेत्र में हम से आगे क्यों निकल रहा है क्योंकि वहाँ के लोगों को अपने अंग बेचने का अधिकार है। इसके लिए वहाँ विज्ञापन दिए जाते हैं। देश विदेश में इसका प्रचार किया जाता है। भारत सहित विश्व के कोने कोने से लोग अंग प्रत्यारोपण के लिए चीन जाते हैं और बहुमूल्य विदेशी मुद्रा वहाँ पर खर्च करते हैं। इससे वहाँ की अर्थव्यवस्था को कितना बल मिलता होगा इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। हमारी सरकार है कि कुछ समझती ही नहीं। या यूँ कह लें कि समझना ही नहीं चाहती। हर प्रगतिशील मार्ग की तरफ से आँखें ही बंद कर लेती है। मैं तो कहता हूँ कि पूरी की पूरी सरकार अन्धों की सरकार है।”

“पर अंग प्रत्यारोपण तो भारत में भी होता है सर। मैंने पढ़ा है कि मद्रास का एक क्षेत्र इस काम में बहुत प्रगति कर चुका है। उस जिले को किडनी जिले के नाम से पुकारा जाता है।” रमेश ने कहा।

“हो सब कुछ रहा है। सब छिपे मुंदे ढंग से चोरी छिपे होता है। परन्तु यह सब है तो गैर कानूनी ही न। सरकार स्वयं गैर कानूनी काम करने के लिए हम जैसे लोगों को प्रोत्साहित कर रही है। यदि सरकार अंग बेचने की आज्ञा दे दे तो कितने ही लोगों का जीवन गरीबी की रेखा को एक ही रात में छलाँग लगा कर पार कर लेगा। फिर बीस सूत्री जैसे फिजूल के कार्यक्रमों की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। आखिर भगवान ने कुछ अतिरिक्त पुर्जे मानव के शरीर में इसीलिए तो बनाए हैं कि वक्त जरूरत काम आ सकें। यदि शरीर के अंगों के बाजार भावों की ताजा जानकारी लोगों को मिलती रहेगी तो बिचौलिये गरीबों का शोषण नहीं कर पायेंगे। पर यह सरकार तो है ही शोषकों का पोषण करने वाली।” डाक्टर साहब ने अपने अर्थशास्त्र के ज्ञान का परिचय देते हुए कहा।

“भई वाह ! यहाँ भी शोषण, कमाल है शोषण के इस नए रूप के बारे में पहले तो कभी नहीं सुना था।” राजरानी ने आश्चर्य व्यक्त किया।“

“हाँ शोषण कहाँ नहीं हो रहा। उदाहरण के रूप में गत दिनों एक विदेशी ने मद्रास के एक निर्धन व्यक्ति से किडनी खरीदी। क्या आप लोग अनुमान लगा सकते हैं कि उसे इसके बदले में कितना धन मिला। नहीं न । मैं बताता हूँ केवल ४०० ब्रिटिश पौंड। और क्या आप लोग जानना नहीं चाहेंगे कि जिस ने किडनी खरीदी उसने कितना धन दिया। बीस हजार पौंड। अब सरकार की गलत नीतियों के कारण कितनी बड़ी राशि बिचौलिए खा गए। यह राशि काले धन में परिवर्तित हो कर हमारी अर्थव्यवस्था को खोखला करने में सहायता कर रही होगी।। यदि यही राशि उस व्यक्ति को अथवा उसके परिवार को सीधी मिलती तो इस आय पर सरकार को कितना टैक्स मिलता। यदि वह इस राशि से कोई काम धन्धा प्रारम्भ कर लेता तो न केवल उसकी गरीबी दूर हो जाती वह निरन्तर सरकारी खजाने में कर के रूप में कुछ न कुछ बढ़ोतरी ही करता रहता।” डाक्टर बाजपेई ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा।

 “पर मानव के अंगों की कोई कीमत कैसे आँकी जा सकती है सर।” उस पत्रकारनुमा छात्र ने जिज्ञासा की।

“सही सही न भी आँकी जा सके तो क्या। अनुमान तो लगाया ही जा सकता है। चीन ने इस मामले में पहल की है। चीन में मनुष्य के कोर्निया का मूल्य तीस हजार अमरीकी डालर माना गया है। फेफड़ों की कीमत एक लाख पचास हजार से एक लाख सत्तर हजार डालर, किडनी की बासठ हजार, लीवर की एक लाख से एक लाख तीस हजार, किडनी पैनक्रिया की ड़ेढ लाख डालर और दिल की एक लाख तीस हजार से एक लाख साठ हजार डालर तक मानी जाती है। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि हम अरबों रुपए मूल्य के मानव अंग बेकार ही जला डालते हैं अथवा दबा कर उन्हें कीड़ों का भोजन बना देते हैं। यह मानव अंगों के वर्त्तमान बाजार भाव हैं। मैं यह भाव अपनी किसी कल्पना से नहीं बता रहा। इसका बकायदा समाचार पत्रों में प्रकाशन होता है। इसके अतिरिक्त माल की कीमत तो माँग और आपूर्ति के नियम से संतुलित होती है। वहाँ पर भी होती होगी। इसकी पूरी जानकारी अभी मुझे नहीं है परन्तु प्राप्त की जा सकती है।” बाजपेई ने जैसे मानव अंगों के बाजार भाव बताते हुए कहा।

“तो क्या यह नैतिक होगा। लोग अपनी जरा जरा सी जरूरतों को पूरा करने के लिए मेहनत कन की बजाय शरीर के अंग बेचने गेंगे तो भी आप उनका समर्थन करेंगे।” रमेश ने जिज्ञासा की।

“पहली बात तो इस मामले को नैतिकता के साथ जोड़ना ही सरासर गलत है। जिस देश में लोग रोज अपना रक्त बेचते हों। गरीब अपनी सन्तान तक को बेच देते ह। महिलाएँ अपनी आबरू बेच रही हों। वहाँ की सरकार अथवा समाज को नैतिकता की बात करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। भले ही कोई व्यक्ति धन प्राप्त करने के लिए यह काम करे तो भी उसे रोका जाना गलत है। न जाने हम कब तक ऐसी दकियानुसी बातों में उलझ कर पिछड़े रहेंगे।” डाक्टर बाजपेई ने बहुत ही आधुनिकता दिखाते हुए कहा।

“इस प्रकार तो आप बात को कहीं से कहीं ले जा सकते हैं। समाज को चलाने के लिए कुछ न कुछ नैतिकता अनैतिकता में अन्तर करना ही पड़ेगा।” राजरानी ने कहा।

“इस बात को नैतिकता के साथ क्यों जोड़ें। हर बात के कई पहलू होते हैं। बात केवल इतनी ही नहीं है। हम अरबों रुपया परिवार नियोजन के नाम पर गाँव गाँव गली गली बाँटते फिर रहे हैं। हो क्या रहा है आबादी बढ़ती ही जा रही है। क्योंकि जनसंख्या हमारी नीतियों के विरूद्ध बढ़ रही है इसलिए हम नई आने वाली आबादी का स्वागत नहीं करते। यदि भारत के लोगों को मानव अंगों का विश्वव्यापी व्यापार करने की आज्ञा दी जाए तो क्या हमें इतना पैसा बेकार ही नालियों में बहाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। नहीं न। उल्टे हमें अधिक संख्या में लोगों के जन्म लेने अथवा मरने पर अफसोस भी नहीं होगा। हर मरने वाला देश के खजाने में कुछ न कुछ जमा करवा कर ही मरेगा। हर नया पैदा होने वाला कुछ न कुछ आशा का संचार करेगा। उसे कच्चे माल की तरह मान कर तैयार माल में परिवर्तित करना कौन नहीं चाहेगा। वैसे भी ’एडेड वेल्यू‘ का जमाना है। इस पर ’वेट‘ तो सरकार को मिलेगा ही। आज हस्पतालों के रख रखाव पर कितना धन बेकार ही व्यय हो रहा है। कितने डाक्टरों को दिन रात तैयार करना पड़ रहा है ताकि किसी तरह मरते हुए आदमी को बचा लिया जाए। क्यों भाई ! इसका कोई उत्तर नहीं देता। भाई यदि किसी के मरने से देश और समाज को लाभ होता हो तो सफेद हाथी जैसे हस्पतालों को अपने वर्त्तमान स्वरूप में विकसित करने से क्या लाभ। आज तो आवश्यकता इस बात की है कि हस्पतालों को नया रूप दिया जाए। डाक्टरों को इस प्रकार से तैयार किया जाये कि वे बिना किसी समस्या के अधिक से अधिक अंगों का प्रत्यारोपण कर सकें। मरे हुए व्यक्ति के अंगों को अधिक समय तक सुरक्षित रख सकें। नए अंगों की पैदावार के लिए अधिक बच्चे कैसे पैदा हों इस पर शोध कर सकें। क्या जरूरी है कि मानव का बच्चा नौ माह बाद ही पैदा हो अथवा एक समय में एक ही हो। इस बात पर शोध किया जाना चाहिए कि किस प्रकार गंधारी ने सौ बच्चे पैदा किए और कुन्ती में इच्छा मात्र करने से माँ बनने की क्षमता कैसे विकसित हुई।” डाक्टर साहब ने समस्या के अनेक पहलूओं पर प्रकाश डालते हुए कहा।

“सर ! यह सब बातें तो कपोल कल्पित हैं। क्या कोई महिला एक जन्म में सौ बच्चे पैदा कर सकती है। अथवा इच्छा मात्र से कहीं सन्तान पैदा होती है। हम लोग मेडीकल के छात्र हैं। जानते हैं कि बच्चा कैसे पैदा होता है।” शीला ने कहा।

“पूरी तरह से कपोल कल्पित भी नहीं कह सकते। आखिर जानवरों की क्लोनिंग ने रोशनी की एक किरण दिखाई है। मानव क्लोंनिंग के दावे किए जा रहे हैं। अभी दावे सच्चे न भी हों तो भी इस दिशा में गंभीरता से प्रयोग तो हो ही रहे हैं। इस प्रकार की चर्चाएँ भी सुनने में आ रहीं हैं कि जल्दी ही मन चाहे मानव शरीर कारखानों में तैयार होने लगेंगे। खैर वह जरा दूर की बात है। यदि महाभारत काल को कल्पना मानना है तो फिर इस बात का ढिंढोरा नहीं पीटा जाना चाहिए कि महाभारत काल वास्तविक था और उस समय हमारी यह सभ्यता अपने चरम उत्कर्ष को छू रही थी।” बाजपेई ने टोका।

फिर अपने मूल विषय पर लौटते हुए बोले, “वास्तविकता तो यह है कि देश की लाखों एकड़ धरती शमशान और कब्रिस्तान के रूप में बेकार पड़ी हुई है। लोग एक एक इंच धरती के लिए एक दूसरे का गला काट रहे हैं। एक एक वर्ग मीटर भूमि के मूल्य करोड़ का आँकड़ा छूने जा रहे हैं। यदि सरकार को अक्ल आ जाये तो यह बहुमूल्य भूमि आगे आने वाली आबादी के काम आ सकेगी और निरन्तर प्रगति कर रहे भवन निर्माण उद्योग को पंख लग जायेंगे। मेरे विचार में तो इस विषय में बड़े बड़े भवन निर्मात्ताओं को सामने आ कर मोर्चा लेना चाहिए। खैर यह मामला मैं भवन निर्मात्ताओं की बुद्धि पर छोड़ा हूँ। मैंने उन्हें भूमि हथियाने का एक नए क्षेत्र सुझा दिया है। आगे वे जाने और देश का भावी भवन निर्माण उद्योग।” डाक्टर साहब ने बात समाप्त करते हुए कहा।


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