अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
02.18.2014


ज़िन्दगी और जुगाड़ : परिचय

zindagi aur jugad
उपन्यास --- जिन्दगी और जुगाड़
लेखक --- मनोहर पुरी
पृष्ठ --- २०८
प्रकाशक ---वंदना बुक एजेंसी
मूल्य ---रु.२५०/- सजिल्द
सम्पर्क --- ८२,साक्षर,ए-३ पश्चिम विहार,
नई दिल्ली -११००६३ 

आपाधापी के इस युग में व्यक्ति को अपना अस्तित्व बचाने के लिए जुगाड़ का सहारा लेना ही पड़ रहा है। व्यक्तिगत, पारिवारिक अथवा सामाजिक जीवन में कोई भी गतिविधि बिना जुगाड़ के संपन्न करना निरंतर कठिन होता जा रहा है। आर्थिक, राजनीतिक और यहाँ तक कि शैक्षणिक जीवन भी जुगाड़ पर निर्भर होकर रह गया है। हर एक व्यक्ति दिन-भर किसी न किसी प्रकार से जुगाड़ करके अपने जीवन की गाड़ी को धकेलने का प्रयास कर रहा है। उसके चौबीसों घंटे किसी न किसी प्रकार का जुगाड़ करने में ही व्यतीत होते हैं। देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति और अन्य सभी गतिविधियाँ जुगाड़ के बिना निरर्थक हैं। ज़िन्दगी का कोई पक्ष जुगाड़ से अछूता नहीं रहा, इसका अनुभव प्रायः हर व्यक्ति को प्रत्येक कदम पर होता है।

Zindgi aur jugad backइस उपन्यास में जीवन के कुछ ही पक्षों को छूना संभव हो पाया है। रोज़मर्रा का पारिवारिक जीवन, हमारे संबंध, राजनीति, शिक्षा, चिकित्सा और प्रशासन, समाज में निरन्तर फैलता भ्रष्टाचार, नशे की दुनिया में डूबती हमारी नई पीढ़ी, धन की अंधाधुंध दौड़ के मोहजाल में फँसी वर्तमान पीढ़ी जल्दी से जल्दी वह सब प्राप्त कर लेना चाहती है, जो उसे वर्षों के परिश्रम के बाद भी ईमानदारी से मिलना संभव नहीं दिखाई देता। इसके लिए शॉर्टकट ज़रूरी और यही शॉर्टकट जुगाड़ का मकड़जाल है। एक बार इसमें फँसा व्यक्ति लाख सिर पटक ले, इससे बाहर नहीं निकल पाता।

इस उपन्यास में विश्वविद्यालयों में पनपते माफिया गिरोह और देह-व्यापार, अस्पतालों से होती मानव-अंगों की व्यापक स्तर पर तस्करी और राजनीति में लगातार पनप रहे भ्रष्ट गठजोड़ सरीखे कुछ पक्षों को ही मात्र छुआ जा सका है। ये समाज में फलने-फूलने वाले कैंसर की एक बानगी मात्र हैं। आप स्वयं इससे कहीं अधिक जानते हैं और प्रतिदिन उसे भोगने को अभिशप्त हैं। समाज के किसी एक व्यक्ति अथवा वर्ग ने इस उपन्यास से प्रेरणा लेकर विरोध का एक स्वर भी उछाला तो मैं अपने प्रयास को सार्थक समझूँगा। हाँ, इतना निश्चित है, जितना इसमें लिखा गया है, हालत उससे कहीं अधिक गंभीर है। समय रहते जाग जाना बहुत ज़रूरी है। जागो, कहीं बहुत देर न हो जाए। 


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें