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02.18.2014


यूँ ही कह दिया होगा

यूँ ही कह दिया होगाबहुत भावुक हो उठा था वह, देश के आवास निर्माण मंत्री उसके द्वार पर खड़े उसके अत्यन्त साधारण घर को यूँ निहार रहे थे जैसे कोई सपना देख रहे हों। कच्चे मकान की दीवार को वह बार बार छू छू कर देख रहे थे। कुंभज को लगा जैसे गंगू तेली के घर राजा भोज पधारें हों। पर वह तो तेली भी नहीं था। वह था एक अदना सा कुम्हार। तेली के पास कम से कम एक बैल होता है और होता है एक कोल्हू। उसके पास तो अपना कहने को गधा तक नहीं था। ले दे कर उसकी पूरी जमा पूँजी एक चाक था जो उसके बाप को उसके दादा ने दिया था और बाप उसके लिए यही विरासत में छोड़ गया था। इसके अतिरिक्त उसे जो एक गुण विरासत में मिला था वह था दिन रात मिट्टी से खेलना और मिट्टी के साथ नये नये प्रयोग करना।

गत कुछ महीनों से वह देख रहा था कि गाँव में बड़े जोर शोर से सफाई का कार्य चल रहा है। जगह जगह गन्दगी के ढेर जलाये जा रहे हैं। जोहड़ों,तलाबों और कुँओं में दवाई डाली जा रही है। टूटी फूटी पगडंडियों के दोनों ओर चूना बिछाया जा रहा है। कुछ पेड़ों को भी रंगा जा रहा है और बरसों से वीरान पड़े पंचायत घर की मरम्मत करवा कर उस पर सफेदी की गई है। मन ही मन वह समझ रहा था कि कि इधर कुछ होने वाला है। परन्तु क्या, न तो उसकी समझ में आ रहा था और न ही उसे इसकी आवश्यकता थी। उसे किसी भी तरह अपने परिवार का पेट पालने के लिए रात दिन परिश्रम करना था सो वह कर रहा था।

कुंभज का पूरे गाँव की गतिविधियों से कुछ लेना देना नहीं था। मुँह अन्धेरे उठ पर वह अपने चाक पर बैठ जाता अथवा मिट्टी को गूँथ पीट कर बर्तन बनाने के योग्य बनाता। हर सप्ताह लगने वाले हाट में उन बर्तनों को बेच कर उसे इतना भर मिल जाता था कि पेट पीठ के साथ मिलने से रह जाता था। किसी न किसी तरह वह अपने परिवार का भरण पोषण करने का जुगाड़ कर ही लेता था।

वैसे तो कुंभज के पास समय का इतना अभाव था कि वह अपनी पत्नी के साथ दो क्षण बात करने के लिए भी नहीं निकाल पाता था। बच्चों के गाल पर भी वह अपने मिट्टी से सने हाथ तभी फिरा पाता जब वे चाक के पास आ कर जम जाते और उसकी गोद में बैठने के लिए मचल उठते। रात्रि को भी वह इतना अधिक थक जाता कि जब तक पत्नी उसके प्यार भरे दो बोल सुनने की कामना करती वह सो चुका होता। दोनों में जो थोड़ी बहुत बातचीत होती वह चूल्हें से गरमागरम रोटी के पकने और उसकी थाली में आने के मध्य के समय में ही होती। यह बात भी प्राय: आटा, तेल, नमक तथा हाट के लिए बनाये जाने वाले बर्तनों तक ही सीमित रहती। यदि कभी समय मिलता अथवा बर्तनों के लिए तैयार की गई मिट्टी में से थोड़ी बहुत बच रहती तो वह उसका उपयोग नई नई विधियों से ईंटें बनाने के लिए करता। कई वर्षों से वह ऐसा ही कर रहा था।

उसने ईंट बनाने की एक ऐसी विधि खोज निकाली थी जिसे बिना अधिक परिश्रम और लागत से बनाया जा सकता था। उसने कुछ समतल पत्थर एकत्र किए थे जिनसे एक विशेष प्रकार का साँचा तैयार कर लिया था। उस साँचें में वह मिट्टी का एक विशेष मिश्रण मिला कर उसके ऊपर पत्थरों का दबाव डालता था। यह दबाव वह निरन्तर बढ़ाता जाता था। एक विशेष विधि से ईंट को बीच में से खोखली रखता था। पोली होने के वावजूद इस ईंट की मजबूती देखते ही बनती थी। इतना ही नहीं इन ईंटों का आकार ऐसा होता था कि पाँच ईंटें मिल कर एक ब्लाक के रूप में जुड़ जातीं और फिर उनको अलग करने के लिए तोड़ना ही पड़ता। ये ब्लाक भी बिना किसी मसाले के एक दूसरे से ऐसे फंस जाते कि उन्हें फिर हटाना संभव नहीं रहता। कुछ दिनों में एक ऐसा ब्लाक तैयार हो जाता था जिसे आसानी से घर बनाने के लिए काम में लाया जा सकता था। ईंटों का आकार प्रकार ऐसा था कि उन्हें अत्यन्त सुगमता से एक दूसरे के साथ फंसा कर दीवार खड़ी की जा सकती थी। उनकी चिनाई पक्की ईंटों से कहीं बेहतर दिखाई देती थी। इन ईंटों पर वह एक विशेष लेप लगाता था जिससे उन पर किसी प्रकार के मौसम का प्रतिकूल प्रभाव नहीं होता था। ऐसी ही ईंटों से उसने अपने लिए एक छोटा सा घर बना लिया था जो सरदी में गरम और गर्मी में ठंडा रहता था। बारिश तो जैसे उसकी दीवारों को मजबूत करने के लिए ही होती थी। इन दीवारों पर उसकी पत्नी समय मिलते ही मिट्टी का लेप कर देती थी जिससे न केवल दीवारें साफ सुथरी दिखाई देतीं थी बल्कि उनकी मजबूती भी बढ़ जाती थी। इस दीवार में किसी प्रकार का छेद करना तो दूर कील ठोंकना तक कठिन होता था। उस पर भी उसके घर में हमेशा ताजी हवा के बहने का अहसास होता रहता था।

गाँव के मुखिया ने कई बार उसकी कला की प्रशंसा करते हुए उसे सुझाव दिया था कि वह बर्तन बनाने की अपेक्षा ऐसी ईंटों को बनाने का ही धन्धा करे। परन्तु यह कार्य इतना आसान नहीं था। एक तो ऐसी ईंटें बड़ी मात्रा में बनाना उसके लिए संभव नहीं था दूसरे घर गृहस्थी चलाने के लिए उसे निरन्तर चाक चलाते रहना होता था। ईंट बनाना उसे फुर्सत के क्षणों में विलासता भरा काम दिखाई देता था। इसलिए उसने मुखिया की बात पर कभी ध्यान नहीं दिया। बिना पकाये ईंटें बनाने के कारण कुछ लोग उसे सनकी समझते थे और वक्त बेवक्त उसका उपहास करते थे इसलिए भी उसने कभी इस विषय पर गंभीरता से विचार नहीं किया।

आज मंत्री जी उन्हीं ईंटों से बनी दीवार को निहार रहे थे। ईंटों को छू छू कर देख रहे थे। उनकी आँखें आश्चर्य से फैलती जा रहीं थीं। अपने देश में एक से बढ़ कर एक प्रतिभावान कारीगर हैं यह बात वह जानते थे परन्तु ऐसे किसी कारीगर को देखने का शायद उनके लिए यह पहला अवसर था। ईंटों की बनावट देख कर लगता था कि जैसे किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने लाखों रुपये व्यय करके वर्षों रिसर्च करवाने के बाद ऐसी ईंटों के विकास में सफलता पाई हो। गाँव के एक साधारण कुम्हार का यह करिश्मा उन्हें अभिभूत कर रहा था। प्रौद्योगिकी के इस कमाल पर उन्हें साहसा विश्वास ही नहीं हो रहा था।

मंत्री जी गदगद थे और बांछें खिल उठीं थीं कुंभज की भी। भले ही वह मंत्री होने का सही सही अर्थ नहीं जानता था परन्तु उसे इतना ज्ञान तो था ही कि वह देश के राजा सरीखे कोई आदमी हैं जिनके सामने गाँव के मुखिया ही नहीं क्लैक्टर साहब भी बिछ बिछ जा रहे हैं। कुंभज की इतनी औकात तो थी नहीं कि वह मंत्री जी को भीतर आने के लिए कहता। वैसे भी अन्दर था ही क्या? कुछ बर्तनों का ढेर और एक साधारण सी चारपाई। रस्सी पर लटक रहे एक दो मैले कुचैले कपड़े। दीवार पर टंगी एक मिट्टी के तेल की डिब्बिया और फर्श पर पड़े एक दो आटा चावल रखने के कनस्तर जो उसके पेट की तरह हमेशा आधे खाली ही रहते थे।

उसके कंधे पर मंत्री जी का कोमल स्पर्श उसे अपनी पत्नी के उस स्पर्श से भी अधिक सुख दे रहा था जो जीवन में पहली बार उसे तब मिला था जब वह विवाह करके अपनी नवविवाहिता पुनिया को हाथ पकड़ कर इस अधबनी झोंपड़ी के भीतर लाया था। मंत्री जी उसकी तारीफों के पुल बांध रहे थे। उन्हें अफसोस हो रहा था कि ऐसी प्रतिभा इस दूर दराज के गाँव में उपेक्षित पड़ी है। मंत्री जी क्या कह रहे हैं वह कुछ समझ नहीं पाया परन्तु उसे इतना जरूर लग रहा था कि वह उससे बहुत प्रसन्न हैं और उनकी सारी प्रसन्नता इन ईंटों को ले कर ही है।

द्वार पर आये अतिथि का कुछ स्वागत किया जाना चाहिए यह संस्कार उसने जन्म से ही सीखा था। वर्षों पहले बनाई एक मिट्टी की कलाकृति उसने मंत्री जी को भेंट में दे कर अपना यह कर्तव्य भी पूरा कर दिया। यह खिलौना उसने अपने सबसे बड़े बेटे के दूसरे जन्म दिन पर बहुत प्यार से बनाया था। इस खिलौने से खेलने के लिए वह जीवित नहीं बचा था। जन्म दिन के पाँचवें दिन ही किसी अनजान बीमारी का शिकार हो कर खिलने से पहले ही मुरझा गया था वह फूल। उसे लगा शायद वह उसके लिए पैदा ही नहीं हुआ था। उसके बाद से कुंभज ने कभी कोई खिलौना नहीं बनाया। घर के एक कोने में रखी यह कलाकृति उसे अक्सर अपनी तरफ घूरती हुई लगती। वह चाह कर भी उसकी ओर आँख उठा कर देख नहीं पाता था। उस खिलौने से छूटकारा पाने का उसे यह अच्छा अवसर जान पड़ा।

मंत्री जी मिट्टी की वह सजीव कलाकृति पा कर अभिभूत हो उठे थे। सार्वजनिक रूप से उन्होंने स्वीकार किया कि जीवन में इतनी सुन्दर और जीवन्त कलाकृति उन्होंने नहीं देखी। उन्होंने अपने पी.ए. को आदेश दिया कि इसे बहुत ही संभाल कर राजधानी ले जाया जाये और उनके कार्यालय में किसी अच्छे स्थान पर सजा दिया जाये। स्वयं आगे बढ़ कर उन्होंने कुंभज से उसकी बनाई एक ईंट भी माँग ली। उसकी प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा, “यदि जीवन में कुछ बड़ा करने का इरादा बनाओ तो मेरे पास अवश्य आना। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी प्रतिभा का भरपूर लाभ देश और समाज को मिले। तुम्हारी बनाई गई इन ईंटों से भवन निर्माण के क्षेत्र में एक क्रान्ति हो सकती है। इनका बड़े पैमाने पर उत्पादन होना ही चाहिए। मुखिया जी और क्लैक्टर साहब ने भी उसकी पीठ ठोंकी थी। जाते समय मंत्री जी ने स्वयं अपनी जेब से एक कार्ड निकाल कर उसे थमा दिया था। कहा था, “काम न भी हो तो भी कभी राजधानी आना तो मुझे जरूर मिलना। मैं तुम्हें देश के अच्छे अच्छे भवन निर्माण विशेषज्ञों से मिलवाऊँगा।”

धूल उड़ाती हुई मंत्री जी की जीप वापिस लौट गई थी। मंत्री जी की आत्मीयता से वह तो क्या पूरा गाँव प्रसन्न था। गाँव में उसका आदर चार गुना बढ़ गया था। उसने वह कार्ड घर की छत में खोंस दिया था और अगले सप्ताह के हाट की तैयारी में जुट गया था।

एक महीने बाद ही उसके गाँव ही नहीं आस पास के डेढ़ दो सौ गाँवों पर कहर बरपा हो गया था। एक शक्तिशाली भूकम्प ने पृथ्वी को हिला कर रख दिया था और पूरे के पूरे गाँव तबाह हो गये थे। उसके घर के अतिरिक्त मीलों तक कोई मकान खड़ा दिखाई नहीं दे रहा था। इस विनाश लीला में घर मकान, दुकान झोंपड़ी तो क्या पेड़ पौधे तक धराशायी हो गये थे। कितने ही धरती में समा गये थे। जगह जगह से धरती फट गई थी। विध्वंस का यह दृश्य किसी का भी कलेजा दहला सकता था। ऐसी स्थिति में भी कुंभज की झोंपड़ी का बाल बांका न होना कोई कुदरत का करिश्मा मान रहा था तो कोई कुंभज की भवन निर्माण कला का कमाल। चारों ओर विनाश लीला देख कर कुंभज बहुत अधिक व्यथित था परन्तु वह कर ही क्या सकता था। अन्य हजारों लोगों की तरह वह भी भिखारियों की भान्ति लाईन में खड़े हो कर भोजन प्राप्त करने के लिए विवश था। वह चाहता था कि जल्दी से जल्दी इन बस्तियों का पुन: निर्माण हो जाये। ऐसे गाँव और शहर बसाये जायें जिनका बाल बांका भी ऐसे भूकम्प न कर पायें। परन्तु विनाश के इस वातावरण में कोई उसकी बात सुनने वाला नहीं था। दूसरी ओर चर्चा यहाँ तक हो रही थी कि इन गाँवों के मलबे को यूँ ही छोड दिया जाये और यहाँ का वीभत्स दृश्य विश्व भर के पर्यटकों को दिखा कर भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा अर्जित की जाये।

इस विनाशलीला के सदमे से जब लोग उबरे तो मुखिया जी ने कुंभज को राजधानी जा कर आवास निर्माण मंत्री जी से मिलने का सुझाव दिया। गाँव के सभी लोगों का यह मत था कि आवास निर्माण मंत्री कुंभज की प्रतिभा से बहुत अधिक प्रभावित थे इसलिए यदि वह कुछ भी नहीं करेंगे तो भी कम से कम इस गाँव के पुनर्निमाण के लिए तो अवश्य ही सहायता देंगे। वैसे विदेशों से भी भारी मात्रा में सहायता राशि प्राप्त हो रही थी। धन से अधिक आवश्यकता ऐसे प्रतिभाशाली और ईमानदार लोगों की थी जो पुनर्निर्माण का कार्य अपना धर्म समझ कर करें।

कुंभज कभी अपने कस्बे से बाहर निकल कर किसी शहर तक नहीं गया था। उसका संसार साप्ताहिक हाट तक ही सीमित था। गाँव वालों का निरन्तर किया जाने वाला आग्रह और मंत्री जी का आत्मीयता से भरा स्पर्श उसे कुछ कर दिखाने के लिए प्रेरित कर रहा था। जैसे तैसे कह सुन कर कुंभज को राजधानी जाने वाली गाड़ी में बिठा दिया गया। रेल की टिकट के अतिरिक्त मंत्री जी का दिया हुआ कार्ड उसकी एक मात्र पूँजी थी। रास्ते के लिए कुछ चना चबेना भी लोगों ने उसकी गठरी में बांध दिया था।

राजधानी के विशाल रेलवे स्टेशन पर जब कुंभज ने अपने चारों ओर दौड़ते लोगों को और उन्हीं के साथ होड़ लेते बड़े बड़े वाहनों पर नजर दौड़ाई तो उसे सहसा अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ। देश के किसी भाग में कोई भयानक भूकम्प आया है इस बात की कोई छाया तक कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। उसके लिए यह एक नई दुनिया थी। उसके ख्वाबों से भी परे की कोई दुनिया। जैसे तैसे पूछते पूछाते थका मंदा वह आवास निर्माण मंत्री जी के विशाल बंगले के द्वार तक जा पहुँचा।

चमचमाती चौड़ी सड़क के किनारे बड़े बड़े लोहे के मजबूत फाटकों वाली वह कोठी उसे स्वर्ग का द्वार लगी थी परन्तु मुख्य द्वार पर बन्दूकधरी सिपाही देख कर वह काँप उठा था। बंगले का दूर तक चक्कर लगाया था उसने। भीतर जाने का कोई अन्य मार्ग नहीं था। ऊँची ऊँची दीवारें, उन पर कंटीले तार। अब उसे लगा शायद वह मंत्री की के निवास की अपेक्षा किसी जेल के पास आ गया है। कुछ ऐसी ही तो थी उसके कस्बे की जेल जिसे वह हाट पर जाते समय देख कर डर जाया करता था। उसे अचंभा हुआ था यह जानकर कि इतने बड़े मंत्री इस जेलनुमा घर में रहते हैं। क्यों रहते हैं यह पहेली वह सुलझा नहीं पाया था। उसने बार बार भीतर जाने का प्रयास किया परन्तु हर बार उसे दुत्कार दिया गया। संतरी किसी ऐरे गैरे को भीतर नहीं जाने देंगें यह जानकर वह निराश हो कर वहीं पटरी पर बैठ गया। पोटली खोल कर उसने कुछ चने खाये। अब उसे बहुत तेज प्यास लग रही थाी परन्तु आस पास कहीं कोई कुआँ तलाब इत्यादि दिखाई नहीं दे रहा था।

उसके बहुत अनुनय विनय करने पर एक संतरी ने दया करके उसे पानी पिला दिया था। कोठी के भीतर जाने वाली समस्या का अभी तक कोई समाधान वह सोच नहीं पाया था। उसे यह विश्वास अवश्य था कि मंत्री जी उसे देखते ही गले से लगा लेगें। गाँव और गाँव वालों का हाल चाल पूछेगें। गाँव की तबाही पर दु:ख व्यक्त करते हुए अवश्य ही कहेगें कि मुझे अब तक बताया क्यों नहीं गया। उसके पुनर्निर्माण के प्रबंध की कमान तुरन्त ही उसे सौंप देगें। राजा के पास धन की कोई कमी नहीं होती यह बात वह दादी नानी की कहानियों से जानता था। उसका भोला मन उसे बार बार कह रहा था कि बस एक बार मंत्री जी की नजर भर उस पर पड़ जाये। बाकी समस्या तो स्वयं ही हल हो जायेगी। इसी लालच में वह बार बार द्वार के समीप जाता और भीतर झाँकने का प्रयास करता। द्वार के पार भी उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। धीरे धीरे सूरज सिर पर चढ़ने लगा था और उसका मन आशा निराशा में डूबने उतरने लगा था।

अचानक उसे वह व्यक्ति कार में बैठा दिखाई दिया जो उस दिन मंत्री जी के साथ था और जिसको उन्होंने उसका दिया हुआ खिलौना संभालने के लिए कहा था। वह लपक कर उसके पास पहुँचा। संतरी कार के लिए दरवाजा खोलने में व्यस्त था। सिपाही का काम कार के लिए दरवाजा खोलना भी होता है यह बात भी उसे अजीब लगी थी। उसके लिए तो सिपाही मारपीट करके लोगों को थाने में ले जाने का ही काम करता है। पर यह सोचने का समय नहीं था। वह कार के पीछे भागता हुआ भीतर पहुँच गया। मंत्री के पी.ए. को देखते ही उसने हाथ जोड़ कर राम राम कहा परन्तु उसे कोई उत्तर नहीं मिला। पी.ए. ने जैसे उसे देखा ही नहीं था। तब तक संतरी उसके सिर पर आ पहुँचा। उसने जल्दी से धोती की छोर में बंधा कार्ड निकाल कर सामने कर दिया। पी.ए.की प्रश्नचिन्ह बनी मुद्रा को अनदेखा करते हुए उसने कहा साहब हमारे इलाके में बड़ी तबाही हुई है। इसलिए मैं मंत्री जी से मिलने के लिए आया हूँ। आप जानते हैं कि मंत्री जी ने स्वयं मुझे यहाँ आने का निमंत्रण दिया था। आप मुझे उनके पास ले चलो बड़ी मेहरबानी होगी।

पास पड़े एक बैंच की ओर संकेत करते हुए उसने कहा वहाँ बैठ जाओ। देखते नहीं कितने बड़े बड़े लोग तुम से पहले यहाँ खड़े हैं। बाद में समय होगा तो तुम्हें भी मिलवा देगें। न जाने कहाँ से चले आते हैं, वह बड़बड़ाता हुआ भीतर चला गया। पी.ए. जिसका नाम शायद गुड़बोले था के बोल खासे कड़वे और अपमान से भरे हुए थे। उस दिन कुत्ते की तरह उसके घर के द्वार पर मंत्री जी के सामने दुम हिलाने वाले इस व्यक्ति का यह रूप उसे पूरी तरह से अलग लग रहा था। भले ही मंत्री के घर आ कर उसे आनन्द नहीं आया परन्तु वह मजबूर था। सोचा आया हूँ तो मिल ही लूँ। शायद मंत्री जी का व्यवहार ठीक ही हो। वह चुपचाप जा कर बैंच पर बैठ गया। घन्टों तक चमचमाती कारें भीतर आती रहीं। कारों के स्वामी स्वर्णजड़ित मुद्रिकाओं से भरे हाथों में बढ़िया ब्रीफकेस थामें भीतर आते जाते रहे परन्तु उसकी ओर किसी ने नजर उठा कर भी नहीं देखा। ऊपर सूर्य की तेजी बढ़ती ही जा रही थी। उसे लगा इस अनन्त आकाश के नीचे छाया देने वाला कोई तुच्छ पर्ण भी उसके लिए नहीं बना। उपेक्षा और अपमान से उसकी आँखें छलछला रहीं थीं। माथे का पसीना भी बह कर उसकी आँखों में भर रहा था। वह बैंच के एक कोने पर दुबका सा बैठा रहा। उसे लगा कहीं गलती से हिलने के कारण ही उसे बाहर न निकाल दिया जाये। आने जाने वालों का तांता थम ही नहीं रहा था। वह नहीं जानता था कि वह क्या करे। उसके पास तो वापिस लौटने तक के पैसे भी नहीं थे।

एकाएक उसने देखा कि एक व्यक्ति को बाहर कार तक छोड़ने के लिए मंत्री जी स्वयं चले आ रहे हैं। भीड़ कुछ कम हो चुकी थी। सुनहरी अवसर जान कर वह मंत्री जी के पास तक जा पहुँचा। एक अपरिचित सी दृष्टि डाल कर मंत्री जी ने अपने पी.ए. से पूछा यह व्यक्ति कौन है और क्या चाहता है। पी.ए. ने उसका और उसके गाँव का नाम बताया। इस बीच उसने वह कार्ड मंत्री जी के सामने कर दिया पर तब तक वह पीछे मुड़ चुके थे और पी.ए. से बात करते हुए जा रहे थे। वह भी पीछे पीछे उनके कमरे में जा पहुँचा। सामने ही दीवार पर एक बहुमूल्य फ्रेम ं उसका बनाया हुआ वह खिलौना उकी दी हुई ईंट के ऊपर सुशोभित था। उसे अपने उस खिलौने से बहुत ईर्ष्या हुई परन्तु आज भी वह उसे नजर भर कर देख नहीं सका।

एक ही साँस में उसने अपनी आपबीती- मंत्री जी से उसकी भेंट-उसके द्वार पर दोनों के मध्य हुआ वार्तालाप-मंत्री जी का स्नेह स्पर्श-खिलौने के रूप में दिया गया उपहार और भूकम्प से हुई तबाही की सारी दास्तान कह सुनाई। उसने यह भी याद दिलाने का प्रयास किया कि मंत्री जी ने उसे राजधानी आने के लिए कहा था और भवन निर्माण सामग्री के सम्बन्ध में विशेषज्ञों से बातचीत करने का सुझाव दिया था। उसने कहा कि आपने कहा था और आपके कहने पर बहुत आशा ले कर मैं आप के पास चला आया। उसे लगा मंत्री जी का ध्यान फिर किसी दूसरी तरफ चला गया है- फिर उसकी ओर देख कर बोले, “अच्छा! यूँ ही कह दिया होगा।” और वह अपने अन्त:पुर में अन्तर्धान हो गए।


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