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| 05.31.2008 |
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यह ताजा पानी क्या है? |
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“तीनों
पुड़िया दिन में तीन बार ताज़े पानी के साथ लेना,
बासी पानी को छूने का तो नाम
भी मत लेना। हर तरह का उतर जायेगा बुखार,
जब
भीतर पड़ेगी ताज़े और ठंडे पानी की फुहार।”
वैद्यजी ने पूरे आत्मविश्वास के साथ फरमाया,
दूर बैठे
बैठे
हमारा मन
‘ताजा
पानी’
सरीखा शब्द सुन कर ही हर्षाया।
पहले मरीज
के उठते ही वैद्यजी ने दूसरे की नब्ज पर ऐसे रखा हाथ,
जैसे कभी भी जीवन में न छोड़ना हो साथ। उसे दो गोलियाँ थमाते हुए बोले,
“यदि
दोनों को एक साथ ताजे पानी के साथ निगल जाओगे,
तो
जल्दी ही पूरी तरह से आराम पाओगे। कब्ज़ की कभी भी नहीं होगी शिकायत,
यदि सुबह उठते ही ताजा पानी पीने की मानोगे हिदायत।”
तीसरे
मरीज को वैद्यराज ने एक भस्म की शीशी पकड़ाई,
कहा,
“
सुबह उठते ही एक चम्मच ताजा पानी के साथ खा लेना भाई। एक महीने तक रोज एक
चम्मच ताजे पानी के साथ फाँक लोगे तो शरीर पर होने वाले चर्म रोगों का
पंचवर्षीय योजनाओं की तरह से
विकास रुक जायेगा,
शरीर देश की जनता की तरह महँगाई को हँसते हुए पचायेगा।”
मैं कई
दिनों से अचानक छाती में उठने वाले दर्द से परेशान था,
यहाँ ताजे पानी की महिमा सुन सुन कर हैरान था। वैद्यराज की प्रसिद्धि सुन
कर यहाँ चला आया था,
जैसे हमारी बीमार अर्थव्यवस्था वर्ल्ड
बैंक के पास जाती है,
और
जैसी भी कड़वी मीठी गोली मिले उसे आँख बंद करके निगल जाती है। वैद्यजी
क्योंकि रात के बारह बजे ही मरीजों को देखने का काम प्रारम्भ करते थे इसलिए
मैं दिन छिपने के साथ ही यहाँ आ कर बैठ गया था,
वैद्यजी की विद्वता का सिक्का हमारे मन में अमरीका की साख सरीखा पैंठ गया
था। सूर्योदय होते ही वैद्यजी मरीजों को देखना कर देते थे बंद,
जैसे विकसित देशों का हाथ गरीब देश की हालत सुनते ही होने लगता है तंग। चार
बजे के करीब मेरा नम्बर गया बुलाया,
लगा जैसे भारत सुरक्षा परिषद की कुर्सी
के
पास सरक आया।
वैद्यजी
ने मेरी नीम आँखों पर झुकी पलकों को अचंभे से हिलाया,
लगा जैसे आँखें में से कोई तहलका निकल आया। जुबान दिखाने को कहा और
उँगलियों से छाती को दो तीन जगह पर ठोका,
बीच बीच में उनके कहने पर हमने अपने उखड़ते हुए साँस को रोका। एक चटनी की
बोतल हमारे हाथ में थमाते हुए बोले,
“सुबह
शाम एक एक चम्मच चाट कर गिलास भर ताजा पानी पी लोगे,
तो
साँझा सरकारों जैसा कुछ अर्सा
और जी
लोगे। ईश्वर ने चाहा तो दिल गठबंधन के घटकों सा आँख नहीं दिखायेगा,
कोई भी विपक्षी इसका बाल बाँका नहीं कर पायेगा।”
फिर से
ताजा पानी सुन कर मेरा पहले से ही कमजोर हुआ दिल थोड़ा और घबराया,
आज
के आधुनिक युग में ताजा पानी कहाँ मिलेगा यह सोच सोच कर सिर चकराया। मैंने
पूछा वैद्यजी आप कौन से ताजे पानी की कर रहे हैं बात,
दिल्ली वालों को तो केवल बदबूदार बासी और सड़े हुए पानी की ही मिलती है
सौगात। न जाने आप किस को कह रहे हैं ताजा पानी,
बिजली और पानी का नाम तक सुन कर हमारी तो मर जाती है नानी।”
“क्या
ताजा वह मटमैला पानी है जो सुबह सुबह दो चार मिनटों के लिए हमारे नलों में
आता है,
अथवा रास्ते में पड़ने वाले नाले का पानी जो दूधिया हमारे दूध में मिला कर
लाता है। उस गहरे नाले के पास पानी का एक चश्मा है उससे भी टैंकर भरते हैं
पानी,
पीना तो दूर उसे सूँघने से जानवरों को भी होती है परेशानी। उसमें पानी कम
मिट्टी ही होती ै ज्यादा,
क्या आप समझते हैं उससे किसी मरीज का होगा कोई फायदा। हाँ आपकी दुकान पर
अवश्य ही भीड़ बढ़ जायेगी,
आपके परामर्श पर वह भी ताजे पानी के लिए ललचायेगी। वैसे जोहड़ों और पोखरों
में वह पानी भी मिलता है जिससे दूधिया अपनी भैंस तक नहलाने से कतराता है,
आपका कौन सा शास्त्र उसे ताजा पानी बतलाता है। एक पानी साँसदों और अमीर
लोगों के बगीचों में पेड़ पौधों को सींचने के लिए आता है,
उसके पास खड़े होने वाले का जी मिचलाता है। ताजा पानी किसे कहते हैं मुझे
कुछ तो विस्तार से बतलाओ,
उसके रंग रूप और स्वाद के बारे में भी समझाओ। आप हर मरीज को दवा ताजे पानी
से लेने की सलाह दे रहे हैं जैसे बीमारी दवा से नहीं पानी से जायेगी,
हाँ इससे जल बोर्ड
वालों की कलई जरूर खुल जायेगी।
“क्या
कहते हो,
“
वैद्यजी चौंके,
“जल
बोर्ड
के
दम पर ही तो हमारा दवाखाना दिन रात उन्नति की सीढ़ियाँ चढ़ रहा है। जल बोर्ड
का
पानी हर घर की
टंकी
में भी पड़ा पड़ा सड़ रहा है। मैं जानता हूँ कि
हफ़्ते में जो एक आध दिन पानी आता है,
वह
अपने साथ महीने भर का बिल भी लाता है। उस बिल से दिल पर लगती है चोट,
वही चोट यहाँ पर बरसती है बन कर नोट।”
मैंने कहा,
“जल
बोर्ड
वाले भी ताजा पानी कहाँ से लायेंगे,
जब
नगर निगम वाले सारे नाले
नदियों में गिरायेंगे।”
मैं थोड़ा सा रुका और फिर बोला,
“वैद्यजी!
भूमि का जल स्तर भी गिरता जा रहा है,
विश्व जल के अभाव में तेल की राजनीति से घिरता जा रहा है। दिल्ली में ही हर
रोज
6520
लाख मी. टन का सीवेज होता है,
केवल
5120
लाख टन की सफाई का भार जल बोर्ड
धोता है।
1400
लाख टन का क्या करे कोई नहीं बताता,
इसलिए यह सारा का सारा नदियों में ही है जाता। आज तेलशोधकों की जगह जलशोधक
कारखाने होते जा रहें हैं जरूरी,
तेल पीना तो किसी की नहीं है मजबूरी। जब भी पिएगा जल ही पिएगा,
तेल पी कर बुश जैसा कब तक जिएगा। भारत की सरकारी मशीनरी की तरह से जल का
तंत्र भी सड़ गया है,
हमारी आर्थिक प्रगति का पहिया यहीं आ कर अड़ गया है।”
वैद्यजी
बोले,
“बेटा
तुमने जल के गुण को नहीं जाना,
जल
है तो ही है जमाना। जल है तो जीवन है नहीं तो यह धरती रेत है चून है,
रहीम चच्चा कह गए हैं पानी के बिना सब सून है। हमारा शरीर जिन पाँच तत्वों
से बना है,
उसका सारा ताना बाना जल से ही तना है। जल प्रकृति का अनुपम उपहार है,
दो
तिहाई जल से ही पृथ्वी का विस्तार है। पानी प्रकृति की देन है-साँझी
संपत्ति है मानता हूँ,
इस
पर आई घोर विपत्ति को भी जानता हूँ। समझ लो पानी सोने के मोल बिक कर करेगा
तंग,
पानी के लिए ही लड़ी जायेगी दुनिया की तीसरी जंग। जानते नहीं केवल तीन
प्रतिशत पानी का ही तो जीवन को सहारा है,
97
प्रतिशत समुद्रों में नेताओं की हमदर्दी
सा
खारा है। हर साल साफ पानी के अभाव में
41000
नवजात शिशु
मर
रहे हैं,
लाखों लोग अपनी धरती से पलायन कर रहे हैं। मेरी चिन्ता यह है कि यदि साफ
पानी के अभाव से ही इतने नवजात शिशु
मरेंगे,
तो
फिर हमारे हस्पताल क्या करेंगे। उनका तो अस्तित्व ही निपट जाएगा,
केवल पोस्टमार्टम तक सिमट जाएगा। अब तो वर्षा का पानी भी कहाँ संचित है,
दुनिया की आबादी का छठा भाग
साफ सुथरे जल से वंचित है। जानता हूँ गंगा यमुना में अब मछलियाँ तक मर रही
हैं,
पाप धोने वाली नदियाँ लोगों के शरीर चर्म रोगों से भर रही हैं। इसीलिए मैं
ताजे पानी की बार बार दे रहा हूँ दुहाई,
ताजे पानी के बिना कोई असर नहीं करेगी मेरी दवाई।”
“तो
क्या वैद्यजी ताजे पानी के लिए हर रोज गंगोत्री जाना होगा,
या
फिर पानी की खेती करके उगाना होगा। अब तो हिमनद भी अपने मूल से हट रहे हैं,
जैसे हमारे युवा अपनी संस्कृति से कट रहे हैं। दूध से महँगा बिकने लगा है
पानी,
बोतलों में बंद बास पानी पीने पर भी होती नहीं हैानी। जल्दी ही यह पानी
भी विदेशों से मँगवाना होगा,
इसके लिए किसी स्टडी टूर पर मंत्रीजी को भिजवाना होगा। इससे भी कैसे चलेगा
गुजारा,
जीवन अस्त व्यस्त हो जायेगा सारा। आयात निर्यात का संतुलन बिगड़ जाएगा,
हमारी जड़ी बूटियों के बदले अमरीका हमें पीने का पानी ही भिजवाएगा।” वैद्य जी बोले, “जानते हो पहले नदियों को पूजा जाता था, पानी का हर रूप मानव को लुभाता था। वरूण जल के देवता के रूप में पूजे जाते थे, मेघ हम पर अमृत बरसाते थे। एक बार फिर से जल के साथ भावनाओं को जोड़ना होगा, प्रकृति के साथ शोषक का नाता तोड़ना होगा। जब घर घर वृक्ष उगाये जायेंगे, जब हम वर्षा के ताजे पानी को अपने लिए बचायेंगे। जब गाँव गाँव की ताल तलैया पर बादल बरसेंगे,तो फिर हम ताजे पानी को क्यों तरसेंगे। जब मानव और प्रकृति के संबंधों की बन जायेगी ऐसी सूरत, तब दवा दारू की रहेगी ही नहीं जरूरत। इसलिए मैं ताजे पानी की याद हर एक को बार बार दिलाता हूँ, इस बहाने कुंभकर्णी नींद में सोई हुई सरकार को जगाता हूँ।” |
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