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02.18.2014


तूलिका

तूलिकाबहुत अचंम्भा हुआ था मुझे एक गोरी चमड़ी वाली बुढ़िया को भीख माँगते देख कर। अभी मैं आर्टिस्ट स्क्वेयर में दाखिल हुआ ही था कि उसकी आवाज मेरे कानों में पड़ी। वहाँ की फ्रेंच भाषा से नितान्त अनभिज्ञ था मैं, फिर भी उसकी आवाज में जो करुणा भरी थी, वह बरबस किसी का भी ध्यान अपनी ओर खींचने में समर्थ थी। कल्पना भी नहीं की थी मैंने कि यहाँ पर विश्वविख्यात चित्रकारों के दर्शनों से पूर्व ही इस प्रकार की एक बुढ़िया से आमना सामना हो जाएगा। विशुद्ध भारतीय ढंग से भीख माँग रही थी वह। मेरा बाजू थाम कर न जाने वह क्या क्या बड़बड़ाने लगी थी। ढेर सारी बातें एक ही साँस में कहती जा रही थी। जड़ सा हो गया था मैं। अपना हाथ छुड़ाने की कोई कोशिश भी नहीं की थी मैंने। झटका सा लगा था मुझे-फिर सोचा कहीं यह भी कोई कलाकार ही न हो। भारत में भी तो नित्य ऐसे भिखारियों से पाला पडता ही रहता है। मैंने ऐसे अनेक भिखारी देखें हैं, जो अपने आप को भिखारी कम और कलाकार ज्यादा मानते हैं। दिल्ली में ही मिल जाएँगे एक से एक बड़े कलाकार-मेकअप का जवाब नहीं और आवाज में ऐसा दर्द, ऐसी करुणा कि अनायास ही हाथ जेब में पहुँच जाएँ। जितने सिक्के जेब में हों दे डालने का मन करे। कुछ ऐसा ही हो रहा था मेरे साथ। फ्रांस के सिक्के मेरे पास बहुत कम थे, नोट भी बड़े बड़े थे। आज सुबह ही तो आया था मैं इस शहर में।

कम सिक्के उस बुढ़िया को देना मुझे अच्छा नहीं लगा-मन में कहीं कोई हीन भावना थी और किसी विदेशी को भीख देते समय मैं अपने आपको छोटा दिखाना नहीं चाहता था। बड़ा नोट देने की मेरी सामथ्र्य नहीं थी। सौ फ्रैंक का नोट देना शायद ही किसी पर्यटक के बस की बात हो वह भी भारतीय पर्यटक की- जिसकी मुद्रा का डॉलर और पौंड में विनिमय के बाद वहाँ कोई मूल्य ही नहीं रह जाता। लगता है कि सारा का सारा धन व्यर्थ ही लूटा जा रहा है। कहीं कहीं तो चाय का मात्र एक कप पीना भारी लगने लगता है। तीन चार फ्रैंक खर्च हो जाते है मात्र चाय पीने में।

धीरे धीरे सरका कर मैंने अपना हाथ जेब में डाला। मेरी हथेली पसीजने लगी थी। एकाएक मैंने सारे के सारे सिक्के मुट्ठी में बंद कर लिए। हालैण्ड, बैजिल्यम, इंग्लैण्ड और जर्मनी के सिक्के मेरे हाथ में गड़ने लगे थे। मुझे लगा देखने में तो काफी होगें ही। झट से सबके सब सिक्के उसके कटोरेनुमा बर्तन में फेंक कर मैं आगे बढ़ गया। डर रहा था कि कहीं मेरी चोरी पकड़ी न जाए। भीख देने में भी डर, मैं सहम गया था। चारों तरफ यूरोपीय लोग और मैं अकेला भारतीय। कैसे अनुभव था। मैं अपने आपको गौरवान्वित अनुभव कर रहा था। दादी नानी से सुनी कहानियों की मेम को मैंने भीख जो दी थी।

जब मैं सैंट पाल चर्च के मुख्य द्वार से इस ओर आया था तब कुछ ही चित्रकार दिखायी दिए थे। अब लगा इस बीच उनकी भीड़ बड़ी तेजी से बढ़ी है। वह स्थान अब भरा भरा सा लगने लगा था। हर एक चित्रकार अपने अपने ढंग से अपनी कलाकृतियों को सजाए हुए था और कैनवस पर किसी न किसी के चित्र के निर्माण में निमग्न था। कोई पलस्तर करने वाली करनी से चित्रकारी कर रहा था तो कोई लकड़ी के अनघड़ टुकड़े से, किसी के हाथ मैं पेंसिलनुमा कोई चीज थी तो कोई कपड़े की पोटली से ही रंगों का चमत्कार दिखा रहा था। शायद ही किसी के हाथ में तूलिका दिखायी दी हो मुझे।

मुझे ध्यान आया कि आर्ट के क्षेत्र में नित नए प्रयोगों की नगरी है - पेरिस आर्ट के क्षेत्र में अग्रणी और सर्वोपरि। शायद तूलिका यहाँ के लिए आउट-डेटेड हो गयी थी - भूतकाल की बात मात्र। आउट-डेटेड ठीक उस बुढ़िया की तरह। वह बुढ़िया भी कभी यहाँ आया करती थी अपनी तूलिका और कैनवस के साथ। बहुत माँग रहती थी उसके चित्रों की - वहाँ पर चाय का एक स्टाल चलाने वाले बूढ़े ने बहुत कुछ बताया था मुझे उसके संबंध में। तूलिका का ही युग था वह।

निहायत खूबसूरत चित्रकार थी अलफान्से। अपनी कलाकृतियों की तरह वह स्वयं भी बहुत सुन्दर थी। जो भी उस चौक में आता उसके स्टैंड के सामने ठिठक कर रह जाता। कलाकृति जितना ही दर्शक उसकी मोहिनी छवि को निहारा करता। वह निमग्न अपनी तूलिका से कागज पर रंगों की शायरी करती रहती। बीच बीच में जब कभी वह अपनी दृष्टि उठा कर दर्शक की ओर देखती तो वह उसकी गहरी नीली आँखों की उदासी में डूब जाने को बाध्य हो जाता। न जाने क्या बात थी उसकी आँखों में कि कोई भी उनमें एकटक देख नहीं पाता था। उसे तत्काल ही अपनी दृष्टि हटा लेने को विवश होना पड़ता। अपने आपको उसकी आँखों के सम्मोहन से बचाने के लिए दर्शक उसके संगमरमरी हाथों पर ध्यान केन्द्रित कर देता जो बड़े सहज ढंग से तूलिका थामे अपना कलाम लिखते जाते। न चाहते हुए भी बिना कुछ खरीदें ग्राहक के लिए वहाँ से हटना संभव नहीं था। पर इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि उसके चित्र बढ़िया स्तर के नहीं होते थे। उसके चित्र अपने आप में लाजवाब होते थे, ठीक उसकी आँखों की तरह आकर्षक। अपनी आँखों का कुछ न कुछ आकर्षण शायद वह अपने चित्रों में उडेंल देती थी। मुझे लगा निश्चय ही यह व्यक्ति उसकी आँखों से विशेष प्रभावित रहा होगा। वह अपनी ही धुन में कहता जा रहा था- उसकी आँखों का जो अंश चित्रों में होता वही तो बाँधे रखता था दर्शक को। कितनी खूबसूरत आँखें थी उसकी पर धीरे धीरे वह अपनी खूबसूरती खोने लगी। समय सम्राट की यात्रा उसके चहेरे पर झुर्रियों की सड़कें बनाती हुई जारी रही।

बूढ़ा पूरी तरह अतीत में डूब गया था - उसका स्वर मुझे कहीं दूर से आता हुआ सा लगा। वह कहता जा रहा था - जब भी वह चित्र बनाती एक टक दृष्टि गड़ाए रखती थी उसी पर। मैं बहुत ही ध्यान से देखा करता था उसे काम करते हुए। कई बार तो डाँट तक खानी पड़ी है मुझे उसके कारण। वह एकदम भूतकाल में पहुँच कर बोला- एक बार मेरे बाप ने मुझे उसके पास कई मास का बकाया पैसा वसूल करने को भेजा। मैं काफी देर उसके पास जा कर खड़ा रहा था। उसकी पीठ थी मेरी ओर। सुनहरी केश राशि उसके कंधों से उतरती हुई पीठ तक लहरा रही थी। हवा में बहुत ठंड थी परन्तु उसके वस्त्रों से ऐसा नहीं लग रहा था कि वह सर्दी से लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार होकर आयी हो। तनिक भी ध्यान नहीं दिया था उसने मेरी ओर। अपने चित्र को पूरा करने में ही निमग्न थी वह। मैं उसकी पीठ पर लहराते बालों को देखता मात्र रहा था। बहुत मन कर रहा था कि उन्हें छू कर देखूँ पर उसका ध्यान भंग न हो जो इस डर से चुपचाम खड़ा रहा था।

“पैसे लेने आए हो”,  उसने सीधा सपाट प्रश्न किया था - जब तक मैं कुछ समझ सकूँ या कहूँ वह फिर बोली थी, “नहीं हैं मेरे पास अभी।” तभी एक झटके में उसने स्टैण्ड पर से चित्र उतार कर मेरे हाथों में पकड़ाते हुए कहा, लो इसे ले जाओ हिसाब बराबर। अब तक मेरी दृष्टि उस चित्र पर नहीं पड़ी थी। वह मेरा ही चित्र था अपने बाप के साथ काम करते हुए - कितना निरीह लग रहा था मैं उस चित्र में। यही चित्र था जो पीछे लगा है, उसने दुकान के भीतरी भाग की ओर - संकेत करते हुए कहा। वहाँ एक चित्र टंगा था। तीस साल पुराना है उसने बताया पर मुझे वह तब भी बोलता सा लगा था।

मुझे चित्र में रुचि लेते देख कर उसका हौसला भी बढ़ा था - बोला न जाने क्यों मैं वह चित्र थामे चुपचाप लौट आया था - कई मास के बिल की राशि के बदले में यह चित्र मेरे बाप को बहुत ही घटिया लगा था। मुझे डाँट कर भगा दिया था उसने दुकान से और घर के एक अंधेरे कमरे में यह चित्र फेंक दिया गया था।

कई दिन तक गुस्से के मारे मैं दुकान पर आया ही नहीं था। बहुत अपमानित महसूस किया था मैंने। एक अर्से के बाद जब मैं दुकान पर आया तो देखा कि अल्फान्से की जगह कोई अधेड़ सा चित्रकार खड़ा सेन्ट पाल चर्च का चित्र बना रहा था। वह कलाकार मात्र इस चर्च का ही चित्र बनाता था। विभिन्न विभिन्न कोणों से मात्र इसी एक भवन के चित्र। अपने जीवन काल में उसने हजारों चित्र बनाए होंगें इस चर्च के। उसका कोई भी चित्र एक दूसरे के साथ मेल नहीं खाता था। इसी भवन का चित्र बनाते हुए ही एक दिन वह इस दुनिया से कूच कर गया। चर्च के पास ही दफना दिया गया था उसे। शायद यही उसकी अंतिम इच्छा भी थी।

बड़ा अजीब सा लगा था मुझे वह स्थान। हर एक चित्रकार अपने अन्दर कोई न कोई कहानी लिए हुए था। उस मंच पर सभी एक से बढ़ कर एक अभिनेता लगते थे पर सबके सब अलग अलग नाटक खेल रहे थे। एक आर्टिस्ट ने मुझे बहुत ही प्रभावित किया था। उस बूढ़े आर्टिस्ट के पास मात्र एक छोटी सी कैंची और कुछ अदद सफेद-काले कागज ही थे। कुछ ही क्षणों में वह अपनी कैंची द्वारा सामने खड़े व्यक्ति का स्केच बना कर दे देता था। काफी भीड़ थी उसके इस आर्ट को देखने वालों की। लोग धड़ाधड़ अपने स्केच बनवा रहे थे और वह अपनी जेब में नोट ठूँसता जा रहा था। हूबहू किसी की आकृति को मात्र कैंची से कागज काट कर बना देना जादू सा लग रहा था और वह जादूगर वहाँ पर खड़ा अपनी कला का कमाल दिखा रहा था। एक सम्मोहन सा था उसके चारों ओर। वहाँ से हट कर मैं चित्रकारों की उस टोली को देखने लगा जो अपने अपने ग्राहकों के पैंसिल से स्केच बनाने में तल्लीन थे। इनकी पैंसिलें इतनी तेज चलती थीं कि कुछ ही मिनटों में वे ग्राहक का चित्र तैयार कर उसे थमा देते परन्तु इन्हें ग्राहक खोजने को लिए प्रयत्न करना पड़ता था। कुछ ग्राहकों से तो ये मोल भाव भी करते दिखायी दिए। मुझे ये चित्रकार कम और सेल्समैन अधिक लगे थे। इनकी कला भी हर तरह से प्रशंसनीय थी परन्तु उनका व्यवहार पूरी तरह से व्यवसायिक था।

इस बीच रह रह कर मेरा ध्यान बुढ़िया की ओर चला जाता। एक के बाद एक सवाल मेरे मन में सिर उठाने लगा। अपनी जिज्ञासा को कुछ शान्त करने के लिए मैं पुन: उस छोटी सी चाय की दुकान पर जा पहुँचा, जहाँ से मुझे अलफान्से के संबंध में काफी जानकारी मिल चुकी थी। चाय वाले से कुछ परिचय हो जाने के कारण अब झिझक भी नहीं रही थी। उसका अंग्रेजी जानना भी मेरे लिए एक आकर्षण का कारण था। इन सबसे भी बढ़कर मुझे लगा था कि उसके मन में अजनबी व्यक्ति के लिए भी आत्मीयता का भाव था, जिसका साधारणत: मुझे पूरे यूरोप में अभाव सा लगा था।

मैंने कैंची वाले कलाकार के संबंध में बात की तो उसने बताया कि यही तो है वह वक्ति जिसके कारण अलफान्से ने अपना जीवन बर्बाद कर लिया। उसका स्वर पूरी तरह से वितृष्णा से भरा हुआ था। मुझे लगा कि शायद अलफान्से के साथ अपने भावनात्मक सम्बन्धों के कारण अथवा अन्य किसी दुराग्रह के वशीभूत उसे इस कलाकार से घृणा थी। अलफान्से उस भिखारिन का नाम था। मुझे काफी अंचभा हुआ था दोनों की स्थिति में इतना अंतर देख कर। चाय वाले ने बताया कि कैंची वाले आर्टिस्ट का नाम अलान्द्रे हैं। कैंची से ही अपना आर्ट दिखाने की धुन इसे प्रारम्भ से ही है। आज से तीस पैंतीस साल पहले उसकी इस सनक को कोई भी आर्ट मानने को तैयार नहीं था। मात्र एक अलफान्से ही उसके इस आर्ट की प्रशंसक थी। अपनी पूरी कमाई के द्वारा वह अलान्द्रे के आर्ट के साथ साथ उसके परिवार को भी जिन्दा रखे हुई थी। इसी कारण पर्याप्त चित्र बेचने के बाद भी उसके पास भविष्य के लिए बचाने योग्य कुछ नही बचता था। परन्तु अलफान्से को इस बात का दृढ़ विश्वास था कि एक न एक दिन लोग अलान्द्रे की कला को न केवल मान्यता देगें बल्कि उसी प्रशंसा भी करेगें।

अलान्द्रे ने उसकी भावनाओं का शोषण करते हुए उसे फुसलाया था कि पेरिस की अपेक्षा लंदन में उसके आर्ट की लोग अधिक प्रशंसा करेंगे तथा अलफान्से को भी दुनिया में अधिक नाम कमाने का अवसर मिलेगा। एक दिन बहुत आशाएँ लेकर दोनों लंदन चले गए। वहाँ दोनों में से किसी को भी अधिक सफलता नहीं मिली। दोनों वर्षों एक साथ रहे परन्तु शादी नहीं की। अलान्द्रे की यह जिद थी कि जब वह बड़ा कलाकार बन जाएगा तभी व्यवस्थित गृहस्थी बसाने की बात सोचेगा। वैसे भी यूरोप में उन दिनों बिना विवाह किए एक साथ रहने का नया नया रिवाज चला था। उस समय भले ही इस बात को समाज द्वारा उतनी मान्यता नहीं मिली थी जितनी आज मिली हुई है। आज तो शायद हर जोड़ा बिना विवाह किए ही एक साथ रहना अपेक्षाकृत अधिक सहज और सुविधाजनक समझता है परन्तु उस समय ऐसी बात नहीं थी।

इन दोनों की अनुपस्थिति में अलान्द्रे का परिवार मर खप गया। अलफान्से के घर परिवार की जानकारी तो कभी भी किसी को नहीं रही। अलान्द्रे के पिता की बीमारी पर तो मैं उन्हें लेने लंदन भी गया था। बहुत मनाने पर भी ये लोग लौटे नहीं थे। एक ही जिद थी कि अलान्द्रे को आर्ट के क्षेत्र में मान्यता मिल जाए। इस बात पर वे बहुत क्षुब्ध थे कि लोग ढेर सारी प्रशंसा के बाद भी उसकी कला को कला नहीं मानना चाहते थे। मैं निराश लौटा था और उसका बाप बेटे से मिले बिना ही मर गया था।

जो थोड़ा बहुत अलफान्से कमाती उससे दोनों का रहने और खाने भर का गुजारा हो जाता। धीरे धीरे उसके आर्ट का आकर्षण भी उसके शरीर के आकर्षण की ही तरह कम होने लगा था। अलफान्से ने एक बार अपनी सारी जमा पूँजी लगा कर अलान्द्रे की कलाकृतियों की प्रदर्शनी का आयोजन किया। इस प्रयत्न में कपड़े लत्ते तक बिक गए। चारों तरफ से मिलने वाली प्रशंसा के ढेर लग गए परन्तु उसकी कला के खरीददार अब भी नदारद थे। समाचार पत्रों ने काफी उत्साहपूर्वक समीक्षाएँ लिखीं और साथ ही यह परामर्श भी दिया कि इस प्रकार की प्रगतिशील कला का मूल्यांकन तो पेरिस में ही हो सकता है। यह नगरी अब तक कला के विश्व की राजधानी के रूप में प्रसिद्धि पा चुकी थी।

वे लोग पुन: यहाँ लौट आए और शीघ्र ही अलान्द्रे की कला की धूम विश्व भर में मच गयी। पर अब तक अलफान्से की कला ने ने प्रयोगों की दौड़ में बुरी तरह पिछड़ गयी थी। रोटी रोजी के चक्कर में पिछले दिनों उसने कोई नया प्रयोग नहीं किया था और पेरिस तूलिका के युग से कहीं आगे करनी और कैंची के युग में पहुँच गया था। अलान्द्रे के पास यश और धन हाथ बाँधे खड़े रहने लगे परन्तु अलफान्से अतीत की गहराईयों में जो खोई तो खोती चली गयी। अलान्द्रे ने कभी यह जानने का प्रयत्न ही नहीं किया कि अलफान्से पर क्या बीत रही है। भूतकाल और वर्तमान से निर्लिप्त वह केवल भविष्य में ही जीता रहा है।

अलफान्से यह स्थान छोड़ कर कहीं जाना नहीं चाहती क्योंकि उसका सारा जीवन यहीं व्यतीत हुआ है। अलान्द्रे का नया जीवन यहीं से शुरू हुआ फलत: यह स्थान उसे भी बहुत प्रिय है। अलफान्से से भी कहीं अधिक प्रिय। दोनों के बीच की दूरी इस स्थान की लम्बाई चौड़ाई से कहीं अधिक है यह बात शीघ्र ही सब को मालूम हो गयी थी।

कलाकारों के मन बड़े भावुक होते हैं और वे एक दूसरे के प्रति संवेदनशील होते हैं यह भावना सदा से मेरे मन में रही है परन्तु यहाँ तो कुछ और ही दिखायी दे रहा था। एकबार पुन: मैंने इस चौक का चक्कर लगाया परन्तु अनेकानेक विषयों पर बनायी गयी सैकड़ों कलाकृतियों के बीच एक भी चित्र मुझे अलफान्से से संबंधित नहीं मिला। बहुत घटिया विषय था शायद एकदम आउट डेटेड तूलिका की तरह ही उपेक्षित।


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