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ISSN 2292-9754

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12.24.2015


रब दा पुत्तर

अचानक सर्वप्रिय को अल्ला के पास जाने को मजबूर कर ही दिया गया। अचानक इसलिए कि वे पिछले चालीस वर्षों से न जाने कितने ही बार बिस्तर पर पड़े ख़ैराती अस्पतालों की रूखी-सूखी रोटियाँ खा कर मौत को चकमा दे कर वापिस अपनी सीलन भरी कोठरी में लौट आते थे। सीलन भरी कोठरी में आते ही अपनी साहित्य साधना में लीन हो जाते थे। हस्पताल में मिलने वाली नक़ली दवाइयों का उन पर बहुत बढ़िया प्रभाव होता था। लगता है कि जैसे ज़हर को ज़हर मारता है वैसे ही उनकी बीमारी को नक़ली दवाइयाँ बहुत रास आतीं थीं। डॉक्टर उनकी तनिक भी परवाह नहीं करते थे और नर्सें तो जानती ही थीं कि इस फटीचर लेखक से कोई टिप-विप मिलने वाली नहीं है इसलिए उनकी ओर कम से कम ध्यान देती थीं। उनकी यह उपेक्षा सर्वप्रिय को इतनी अधिक रास आती कि उनकी सहन शक्ति में निरन्तर वृद्धि होती जाती और बीमारी से लड़ने का जज़्बा भी पैदा होता जाता। वह सोचते तुम लोग लाख प्रयास कर लो मैं आसानी से मरने वाला नहीं हूँ। बहुत सख्त जान हूँ मैं और मेरा रब के साथ सीधा रिश्ता है। जब-जब डॉक्टर उनके जीवन की आस की डोर को टूटता हुआ घोषित करते तब-तब वे चुस्ती-फुर्ती से उठ खड़े होते। उनकी देख भाल करने वाला तो कोई था नहीं इसलिए उनके ठीक होने पर हस्पताल का स्टाफ़ भी चैन की साँस लेता कि चलो जान छूटी। पर कुछ दिन बाद वे फिर उसी प्रकार हस्पताल में भर्ती होने के लिए आ जाते जैसे पेशेवर मुजरिम बार-बार जेल के चक्कर लगाते हैं। वे कहते भी थे कि भाई मैं तो पेशेवर मरीज़ हूँ। बीमार होने के बाद और जाऊँगा कहाँ। हस्पताल में ही तो आऊँगा। उनके जो दो चार दोस्त थे वे भी सोचते चलो कुछ दिन तो उनके रहने खाने का प्रबंध हो ही गया। हस्पताल के मैले-कुचेले बिस्तर पर लेटे-लेटे सर्वप्रिय सुन्दर-सुन्दर कहानियों की कल्पनाएँ किया करते। उनकी कल्पनाओं में नर्स, डॉक्टर और हस्पताल के लिए कोई स्थान नहीं होता था; वे तो परियों की कथाएँ लिखते थे। ऐसा लगता है कि हस्पताल में उन्हें नर्सें परियों के रूप में ही दिखाई देतीं थीं जो राक्षस रूपी डॉक्टरों के पंजों में फँसी छटपटाया करतीं और उनके लिए मरीज़ रूपी भोजन परोसती रहतीं। जब भी कोई डॉक्टरों का दल विशेष रूप से उनके वार्ड में आता उन्हें लगता कि अब किसी न किसी मरीज़ का बिस्तर खाली होने वाला है।

सर्वप्रिय के माता-पिता कौन थे, कोई नहीं जानता था। वह कहाँ पैदा हुए यह भी किसी को पता नहीं था। उनका मज़हब क्या है, जात क्या है, इसके विषय में भी उनका इतिहास मौन है। लोगों ने उन्हें एक मन्दिर के बाहर पड़ा हुआ पाया था इसलिए यह मान लिया गया कि वे हिन्दू ही होंगे। वैसे उस प्रसिद्ध मन्दिर से मस्जिद की दूरी भी कोई अधिक नहीं थी दो-दो ऐतिहासिक गुरुद्वारे भी पास में ही थे। एक चर्च की भव्य इमारत भी थी जो रविवार के अतिरिक्त प्रायः सुनसान पड़ी रहती थी परन्तु उसकी यह ख़ामोशी सर्वप्रिय को सबसे अधिक प्रभावित करती थी। कुछ बड़ा होने बाद अपने लिखने का अधिकतर कार्य वह इसी के लॉन में बैठ कर करते थे।

हो सकता है कि सर्वप्रिय मस्जिद अथवा गुरुद्वारे की सीढ़ियों के पास पड़े पाये गए हों और किसी ने अपनी जान छुड़ाने के लिए उन्हें मन्दिर की सीढ़ियों के पास डाल दिया हो। जैसे अक्सर मन्दिर के पास मरी हुई गाय और मस्जिद के पास सूअर के मांस के टुकड़े शहरों में दंगा होने से पहले दिखाई देते रहते हैं। ख़ैर जैसे-तैसे वे मन्दिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारों के चतुर्भुज में अटकते-भटकते बचपन की दहलीज़ लाँघ गए। उनका चेहरा-मोहरा बहुत सुन्दर था। रंग गोरा खिलता हुआ। आँखें किसी को भी अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम थी। किसी भी राजनेता की अपने मतदाताओं के सामने बोली जाने वाली वाणी के विपरीत उनकी बोली में भी बहुत मिठास थी। क्योंकि उसमें झूठे वायदों की चासनी नहीं सच्चाई की मिठास होती थी। लगता था कि उन्होंने यह वाणी झूठे राजनेताओं की अपेक्षा गुरुद्वारों के ग्रंथियों से ग्रहण की होगी। इसलिए वे सब के प्रिय थे। प्रिय होने के कारण लोग उन्हें सर्वप्रिय कहने लगे।

सभी धर्मों की पवित्र वाणी सुनते-सुनते उनका बचपन कटा था इसलिए इन धर्म स्थानों में उनकी अटूट आस्था थी। अध्यात्मिक कारण के साथ इसका एक भौतिक पक्ष भी था। क्योंकि इन्हीं के साथ उनके पेट भरने, कपड़े लत्ते और रहने-सोने का प्रबंध जुड़ा हुआ था। कभी मस्जिद की सीढ़ियों पर कोई जकात दे जाता तो कभी मन्दिर के बाहर बँटने वाले भोजन से उनका पेट भर जाता। कुछ काम न बनता तो गुरुद्वारे के लंगर पर तो कोई पाबन्दी थी ही नहीं जहाँ वे स्वयं ही चले जाया करते थे। जहाँ भी जाते अपनी सेवा से लोगों का मन मोह लेते। इसी क्षेत्र में अँग्रेज़ों के ज़माने में बने एक बैरक की टूटी-फूटी कोठरी पर उन्होंने कब्ज़ा जमा लिया था।

सर्वप्रिय की इन धर्म स्थानों से अच्छी जान-पहचान थी। निरन्तर इन स्थानों पर विचरने के कारण सब उन्हें रब का पुत्तर कहते थे। भले ही उन्हें कोई आगे बढ़ कर गले से न लगता हो परन्तु कोई भी दुत्कारता नहीं था। उनकी पूरी दुनिया इस छोटे से क्षेत्र में सिमट कर रह गई थी। यहीं पर उन्होंने हिन्दी, उर्दू, अंग्रेज़ी और गुरमुखी लिखना पढ़ना सीख लिया था। वह किसी स्कूल में नहीं गए थे परन्तु जीवन की पाठशाला में उन्होंने एक-एक पाठ बहुत ही मनोयोग से पढ़ा और समझा था। बचपन से वे दिन भर इन भाषाओं को लिखने पढ़ने का अभ्यास करते रहते थे। धर्म ग्रन्थों की कितनी ही वाणी उन्हें कंठस्थ थी इसलिए उनकी चारों भाषाओं पर अच्छी-ख़ासी पकड़ बन गई थी। सर्वप्रिय दिन भर लिखते-पढ़ते रहते थे। इसी क्षेत्र में रहते-रहते उन्होंने कूडे में फेंकी गई पत्रिकाओं और रद्दी अखबारों को पढ़-पढ़ कर इतना ज्ञान अर्जित कर लिया कि उनसे किसी भी विषय पर वाद-विवाद करने में बड़े-बड़े ज्ञानी भी घबराते थे। जब कोई किसी जटिल धार्मिक मसले पर किसी से बातचीत करता हुआ उलझ जाता तो वह सर्वप्रिय से उनको भिड़ा देता। सर्वप्रिय से धर्मचर्चा में जीतना बहुत कठिन था। उन्होंने धर्म को केवल पढ़ा और सुना ही नहीं बल्कि गुना था।

सर्वप्रिय दिनभर विभिन्न-विभिन्न विषयों पर अख़बारों को पत्र लिखा करते थे। कभी किसी विषय पर लेख भी लिख देते। प्रायः वे अपने पत्र एवं लेख स्वयं ही अख़बारों के दफ़्तर में जा कर दे आया करते थे। कई बार वे बहुत प्रमुखता से छप जाते थे। वे प्रकाशित हुए अथवा नहीं इसकी उन्हें कोई चिन्ता नहीं रहती थी। वे मात्र कर्म करते थे वह भी किसी फल के लिए नहीं। कई बार वह सुन्दर सुन्दर कहानियाँ लिखते। उनकी कविताएँ जीवन के मार्मिक रंग प्रस्तुत करने वाली होतीं और उनके भजनों का तो कोई जवाब ही नहीं था। प्रायः एक ही भाव के भजन वह चारों भाषाओं में बहुत सहजता से लिख डालते और कोई भी उन्हें गाने पर एतराज़ नहीं करता था। हर कोई उन्हें अपना मानता था और वे सबको अपना मानते थे। उनकी रचनाओं से यह ज्ञात ही नहीं होता था कि वे किसी विशेष धर्म को ध्यान में रख कर लिखी गई हैं। जिस रंग में उसे लोग देखते वे उसी रंग में रँगी दिखाई देती थी। इस प्रकार सर्वप्रिय अपने आस-पास के लोगों में एक लेखक के रूप में स्थापित हो चुके थे।

कभी-कभी कोई पत्र पत्रिका उनके नाम से छोटी-मोटी राशि का मानदेय के रूप चैक भिजवा देता तो वे हर एक को बडे चाव से दिखाते और उसे अपने हाथ से बनाई गई एक डायरी में चिपका कर सहेज लेते। कोई कहता कि तुम्हें पैसे की इतनी तंगी रहती है तो तुम इनका भुगतान क्यों नहीं लेते तो उसका सहज उतर होता कि मेरा तो बैंक में खाता ही नहीं है और मुझे किसी खाते की ज़रूरत भी नहीं है। मेरा खाता भगवान के बैंक में खुला हुआ है। वह मुझे उतना दे देता है जितने में मेरी आवश्कताएँ पूरी हो जाती हैं। फिर मेरा कोई खर्चा नहीं तो मै इस छोटी-मोटी राशि का करूँगा भी क्या। मुझे जो जब चाहिए होता है मिल जाता है। शायद रब ने एक बात में मेरा ध्यान नहीं रखा। उन्हें कुछ ऐसा प्रबंध करना चाहिए था कि मैं कभी बीमार ही नहीं होता परन्तु वह भी क्या करे उसने मानव देह दी है तो देह धर्म का पालन करना ही पड़ता है।

अचानक एक दिन शहर में ऐसा दंगा हुआ कि नगर का पूरा जन जीवन ही उथल पुथल हो गया। सर्वप्रिय उसी क्षेत्र में रहता था जहाँ से दंगा प्रारम्भ हुआ था। जल्दी ही घृणा की इस आग ने पूरे शहर को अपनी चपेट में ले लिया। अनेक स्थानों पर स्थिति इतनी चिन्ताजनक हो गई कि वहाँ कर्फ़्यू लगाना अनिवार्य हो गया चारों ओर मार-काट मची थी। सर्वप्रिय इन सब बातों से उदासीन एक-एक की जान बचाने में जुटा रहा। जहा भी संभव हुआ उसने वहाँ की आग बुझाने का प्रयास किया। कोई उसे समझाता कि यह धर्मान्धता की आग है इसमें अपने आपको क्यों झुलसा रहे हो। तुम तो किसी एक धर्म के नहीं हो। ऐसे समय में उसे एक स्थान पर छिप कर आराम से बैठ जाना चाहिए तो वह तपाक से उतर देता यह लड़ाई धर्म की लड़ाई नहीं है। कोई भी धर्म आपस में लडने मरने की बात नहीं करता। फिर दंगाइयों का कोई धर्म नहीं होता। यदि कोई होगा भी तो मार-काट और लूट-पाट का ही होगा। ऐसे आपात काल में मैं चुप कैसे बैठ सकता हूँ। किसी के एक-आध घर में आग लगती है तो वह सारा आसमान सिर पर उठा लेता है मेरा तो हर घर घृणा की अग्नि में झुलस रहा है। इतना कह कर वह उस दिशा में भाग निकलता जिस तरफ से दंगाइयों की आवाज़ें आ रही होतीं और वहाँ से अपने हाथ झुलसावा कर ही वापिस आता। कोई भी तो उसे अपना मानने को तैयार नहीं होता था। वह बाहर के साथ-साथ भीतर तक घायल होता जा रहा था। एक दिन वह ऐसे स्थान पर पहुँचा जहाँ सभी धर्मों के लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे थे। उन्हें रोकने के लिए वह रब का पुतर उनके सामने तन कर खड़ा हो गया। इसलिए सभी ने पहले उसी को निपटने का मन बना लिया ताकि वह उनके मामले में कोई हस्तक्षेप न कर सके। जितना वह उनको समझाता उतनी लाठियाँ उस पर बरस पड़तीं। वह अपने आपको उनके हाथों में सौंप कर किसी तरह से शान्त करने का प्रयास करता हुआ धरती पर गिर पडा। उसके गिरते ही चारों ओर सन्नटा छा गया। सब लोगों ने मिल कर उन्हें एक पाँच सितारा क़िस्म के हस्पताल में भर्ती करवा दिया। हर प्रकार की डॉक्टरी सहायता और चिकित्सा की सुविधा उन्हें उपलब्ध करवाई गई परन्तु कुछ घाव इतने गहरे थे जो उनके लिए जानलेवा सिद्ध हुए। सारे शहर में किसी अफ़वाह की तरह शायद पहली बार यह सच्ची ख़बर फैल गई कि रब का पुतर मर गया। रब का पुतर कौन था शायद ही कुछ लोग जानते थे परन्तु पूरे नगर में मातम छा गया। समाचार पत्रों ने मोटी मोटी सुर्ख़ियों में उसकी शहादत की चर्चा की। समाचार पत्र, रेडियो और टी.वी. बड़े-बड़े लोगों के शोक सन्देश प्रचारित और प्रसारित करने में जुट उनकी गए मृत देह पर अधिकार जमाने के लिए सभी धर्मों के नेता हस्पताल के प्रांगण में ताल ठोक कर खड़े हो गये।


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