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ISSN 2292-9754

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09.08.2016


मास्टर शंभुनाथ

दूर से देखनेपर एक पहलवान जैसे दिखाई देने वाले मास्टर शंभुनाथ वास्तव में अंग्रेज़ी के अध्यापक थे। वह दिल्ली के एक स्थापित स्कूल में गत 20 वर्ष से अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। छः फुट के ऊँचे क़द और चौड़े सीने वाले मास्टर जी स्कूल में अपने अनुशासन के लिये जितने प्रसिद्ध थे उससे अधिक संयमित जीवन वह स्वयं जीते थे। खादी का सफ़ेद छोटा कुर्ता, चूडीदार पजामा और कोल्हापुरी चप्पल उनके व्यक्तित्व को ग़ज़ब का निखार देते थे।

उनका पढ़ाने का अन्दाज़ इतना अच्छा था कि अंग्रेज़ी जैसा विषय छात्र तन्मयता से पढते थे। मास्टर साहब बहुत सरल और सादगी भर जीवन व्यतीत करते थे। एक छोटी सी कोठरी में रहते थे। उस साफ़ सुथरी कोठरी में कुछ बर्तन, खाना बनाने के सामान के अतिरिक्त ढेर सी किताबें थीं। केवल बाल कटवाने के अतिरिक्त वह अपना बाकी का काम स्वयं ही करते थे।

साल में दो बार नियमित रूप से किसी ऊँचे पर्वतीय स्थल पर घूमने जाते थे। दशहरे की छुट्टियाँ वह अपेक्षाकृत कम ऊँचे परन्तु किसी रमणीय स्थल पर जाते थे। एक बार उनके किसी सहयोगी ने पूछा, "आप अपनी लगभग सारी कमाई तो गाँव में लड़कियों की शिक्षा के लिये दान कर देते हैं फिर आप साल में दो बार छुट्टियाँ मनाने पर्वतीय स्थलों पर कैसे जाते हैं?"

उन्होंने सहजता से उत्तर दिया, "आसान कार्य है। प्रति वर्ष जहाँ जाना होता है वहाँ पर दो महीने अथवा 15 दिनों के लिये एक कमरा किसी छोटी बस्ती में किराये पर लेता हूँ। सुबह-सुबह सैर करने के लिये निकलता हूँ और देवदार के किसी वृक्ष से एक मन पसंद डाली काटता हूँ। उसे सारे रास्ते छीलता और तैयार करता आगे बढ़ता हूँ। एक घंटे की सैर में वह टहनी पूरी तरह से एक सादी छड़ी का रूप ले लेती है। वापिसी का घन्टा उस पर नक़्काशीदार डिज़ायन बना उसे मज़बूत और आकर्षक छड़ी का रूप देता हूँ। सैर के साथ शुद्ध वातावरण में मेरी कसरत भी हो जाती है। स्वास्थ्य अच्छा रहता है और आय भी हो जाती है।

कमरे पर पहुँच नहा धो कर नाश्ता तैयार करता हूँ। थोड़े विश्राम के पश्चात उस छड़ी को अच्छी तरह पालिश करके चमका देता हूँ। प्रति दिन एक छड़ी तैयार हो जाती है जिन्हें मैं दिल्ली ले जा कर अपने वृद्ध ग्राहकों को बाज़ार से आधे दामों पर बेच देता हूँ। अधिकांश के पैसे मेरे पास अग्रिम ही आ जाते हैं।

दोपहर बाद स्थानीय बच्चों को अंग्रेज़ी पढ़ाता हूँ। बिना पैसा लिये पढ़ाने के कारण कई छात्र मेरे पास आने लगते हैं। सायं काल कुछ बुज़ुर्गों के साथ कुछ सामाजिक समस्याओं पर विचार विमर्श करता हूँ। इस प्रकार स्थानीय समस्याओं की जानकारी भी हो जाती है। संभव हुआ तो उन्हें कुछ सुझाव भी दे देता हूँ। सोने से पहले कुछ पढ़ना-लिखना हो जाता है और इसी प्रकार दिन आराम से व्यतीत हो जाता है। पैसे की समस्या भी नहीं रहती और पर्वत के रमणीय स्थलों की सैर भी हो जाती है। वास्तव में जीवन सरल और सादा हो तो किसी को कोई उलझन होती ही नहीं है।


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