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02.18.2014


मधु मक्खियों के छत्ते

अपनी बुद्धि, ज्ञान, सद्व्यवहार और बहादुरी के कारण गोविन्दा निर्धन होते हुए भी गाँव भर का चहेता था। सब लोग उससे प्यार करते थे और हर कठिन समस्या के समाधान के लिए उसके पास आते थे। उसकी दयालुता और बुद्धिमत्ता की चर्चा दूर दूर तक सुनाई देती थी।

एक रात जब वह गहरी नींद में सो रहा था तो एक आदमी ने उसे जोर जोर से झिंझोड़ कर जगाया। गोविन्दा नींद से जागा और अपने सामने एक अजनबी को खड़ा देख कर बोला, “तुम कौन हो और कहाँ से आये हो? मुझ से क्या चाहते हो?”

उस अजनबी ने कहा, “मेरी मालकिन आप से मिलना चाहती हैं। इसीलिए मैं आपको लेने आया हूँ।”

“तुम्हारी मालकिन कौन है? वह मुझ क्यों मिलना चाहती है?” गोविन्दा ने पूछा।

“हम यहाँ से दूर नहीं रहते। आप मेरे साथ चलो तो आपको सब कुछ ज्ञात हो जायेगा। इस समय मैं आपको कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं हूँ।”

गोविन्दा उसके साथ चल पड़ा। उसे लगा कि वह अपने ही घर के आस पास घूम रहा है। अचानक उसे कई मकान दिखाई दिये जो उसने पहले वहाँ नहीं देखे थे। घर अपने आप में विचित्र प्रकार के थे। उनमें अनेक दरवाजे थे। वे आपस में जुड़े हुए भी थे। वहाँ पर आदमियों और औरतों का झुंड एकत्र था जो बदहवास हो कर इधर उधर भाग रहे थे। लगता था कि हर एक किसी सुरक्षित स्थान की तलाश था। जो भी व्यक्ति उस अजनबी के पास से निकलता वह एक ही प्रश्न करता, “क्या गोविन्दा आ गये?” चारों ओर से उसे यही एक वाक्य सुनाई दे रहा था क्या गोविन्दा आ गये। यह स्वर सुनने के बाद गोविन्दा की उत्सुकता और भी बढ़ गई।

“आखिर वे लोग उससे क्या चाहते हैं और उसे कैसे जानते हैं,” गोविन्दा ने अपने आप से प्रश्न किया।

गोविन्दा को सारी स्थिति बहुत ही रहस्यमय लग रही थी। उसने अजनबी से पूछा, “मैं पहले कभी तुम से मिला नहीं। यह लोग भी कुछ अजीब से ही हैं। इनकी आवाज में एक अलग तरह की भिनभिनाहट है। ऐसी नगरी भी मैंने पहले कभी नहीं देखी। मैं यह भी नहीं जानता कि तुम्हारी मालकिन कौन है और मुझ से क्या चाहती है। यहाँ पर सारे लोग मेरे बारे में न केवल जानते हैं बल्कि मेरी प्रतीक्षा भी कर रहे हैं। तुम मुझे यह भी नहीं बता पा रहे कि मुझे यहाँ क्यों लाया गया है और मुझे कहाँ ले जाया जा रहा है।”

“मेरी मालकिन जानती है कि आप बहुत ही साहसी और बुद्धिमान हैं। जल्दी आप उनसे मिलेगें।” अजनबी ने उत्तर दिया। तभी वहाँ पर दो सुन्दर युवतियाँ प्रकट हुईं। उन्होंने अपने हाथों में बड़े बड़े रेशमी झंडें उठाये हुए थे। उन्होंने बहुत आदरपूर्वक गोविन्दा का स्वागत किया और दोनों उसकी बगल में चलती हुई उसे राह दिखाने लगीं। एक कक्ष के अन्दर पहुँचते ही गोविन्दा ने देखा कि सामने मंच पर एक अत्यन्त रूपवान महिला बैठी हुई है। गोविन्दा को भीतर आते देख कर उसने बहत ही आदरपूर्वक अपने मेहमान का स्वागत किया। सबसे पहले उसे अत्यन्त मधुर और मीठा पेय पदार्थ पीने को दिया गया। गोविन्दा ने ऐसा पेय पहले कभी नहीं पीया था। अपनी बात प्रारम्भ करते हुए उस महिला ने कहा, “मेरी एक बहुत ही सुन्दर बेटी है। उसका नाम मधु है। मैं चाहती हूँ कि आप उससे मिलें।” इतना कह कर उसने सेविकाओं को आदेश दिया कि वह जल्दी ही मधु को उस कक्ष में ले आयें।

कुछ देर बात मधु ने उस कक्ष में प्रवेश किया। उसकी वेश भूषा और चाल ढाल के सलीके से लग रहा था कि वह यहाँ की राजकुमारी है। अभी वह लोग बात करना शुरू कर ही रहे थे कि एक सेविका चिल्लाती हुई भीतर पहुँची और उस महिला को एक कागज थमाते हुए बोली, “राक्षस आ गया, राक्षस आ गया।”

गोविन्दा को कुछ समझ में नहीं आया। परन्तु वह हर आने वाले संकट का सामना करने के लिए अपने आप को तैयार करने लगा। उसने सामने दीवार पर टंगी हई तलवार उतार कर अपने हाथ में ले ली। इस बीच उस स्त्री ने गोविन्दा का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा, “हमारी सहायता करो। अब आप ही हमारी आशा की अन्तिम किरणा हैं। आप कृपया कागज में लिखे इस सन्देश को पढ़ लें। वह कागज एक मंत्री ने भेजा था। उसमें लिखा था कि आप कृपया अपना महल जल्दी से जल्दी खाली करके राजपरिवार के साथ यहाँ से बाहर किसी सुरक्षित स्थान के लिए चलें जायें। एक राक्षस ने हमारे राज्य पर आक्रमण कर दिया है। अब तक वह हजारों लोगों को खा चुका है। हमारे कई गाँव वीरान हो गये हैं। इस समय वह राजधानी की बाहरी प्राचीर तक पहुँच गया है।

सन्देश पढ़ कर गोविन्दा गहरी सोच में पड़ गया।

तभी रानी ने कहा कि अब आप जान गये होगें कि मैंने आपको क्यों बुलाया है।

“हाँ परन्तु क्या अब तक बहुत देर नहीं हो चुकी।” गोविन्दा ने कहा।

“जो भी हो। कम से कम मेरी बेटी को तो बचाओ ताकि हमारा वंश आगे चलता रहे।”

गोविन्दा ने राजकुमारी का हाथ पकड़ कर उसे अपने साथ चलने के लिए कहा।

राजकुमारी की आँखों में आँसू भरे हुए थे। वह भरी हुई आवाज में बोली, “आप मुझे कहाँ ले जा रहे हैं।”

गोविन्दा ने कहा, “मैं एक निर्धन युवक हूँ। मेरा घर इतना सुन्दर और आरामदायक नहीं है। परन्तु वहाँ तुम पूरी तरह से सुरक्षित रहोगी। इतना कह कर उसने राजकुमारी से पूछा कि क्या वह उसके साथ रहना पसन्द करेंगी।”

राजकुमारी ने कहा, “अब और कोई रास्ता भी तो नहीं है। मुझे लगता है हमें यहाँ से जल्दी निकल चलना चाहिए।” वह वहाँ से भागते हुए अपने गाँव में पहुँच गये।

गोविन्दा के घर को देख कर राजकुमारी ने कहा, “निश्चय ही यह स्थान बहुत सुरक्षित और शान्त है। पर क्या तुम मेरी एक प्रार्थना स्वीकार करोगे।”

गोविन्दा ने कहा, “कहो क्या कहना चाहती हो।”

राजकुमारी ने कहा, “तुम हमारे लिए एक नई राजधानी और महल बना दो ताकि मेरे परिवार के लोग भी अपनी प्रजा सहित उसमें सुख शान्ति से रह सकें।”

“परन्तु मेरे पास इतने साधन नहीं हैं,” गोविन्दा ने उत्तर दिया।

राजकुमारी की आँखों में आँसू भर गये। बोली,” फिर लोग आपकी इतनी प्रशंसा क्यों करते हैं कि आप कुछ भी कर सकते हैं। मैं आपको इतना विश्वास दिलाती हूँ कि यदि आप हमारी नगरी को दोबारा बसा देगें तो आपके पास धन की कोई कमी नहीं रहेगी।”

गोविन्दा को कोई उत्तर नहीं सूझ रहा था। राजकुमारी निरन्तर रोती जा रही थी और गोविन्दा उसे चुप करवाने का असफल प्रयास कर रहा था।

अचानक उसकी नींद खुल गई। वह घबरा कर उठ गया। सोचा अरे यह सब तो केवल एक सपना था। उसने देखा कि उसकी चारपाई के चारों और लाखों की संख्या में मधुमक्खियाँ भिनभिना रहीं थीं। उनकी तेज भिनभिनाहट से ही उसकी नींद खुली थी। उसने मक्खियों को अपने से दूर भगाने का प्रयास किया परन्तु वे वहाँ से हटना ही नहीं चाहती थी। तभी उसने देखा कि सामने के कुछ छत्तों को एक अजगर अपना भोजन बनाने ही जा रहा था। वह पहले भी शायद कुछ छत्ते चट कर चुका था। उसने जल्दी से अपने पास पड़ी तलवार को उठाया और एक ही वार से उस भयानक अजगर का काम तमाम कर दिया। शायद यही उसके सपने का रहस्य था।

अब उसने अपने गाँव में जगह जगह मधु मक्खियों के लिए ऐसे स्थान सुरक्षित कर दिए जहाँ मधुमक्खियाँ अपने अपने छत्ते बना कर रहने लगीं। उनके महल फिर से बन गये और उन्होंने उस गाँव में एक सुन्दर नगरी का निर्माण कर लिया। गाँव के अधिकांश लोग शहद का व्यापार करने लगे। गाँव में मधुमक्खियों के कारण भरपूर फसल होने लगी। गाँव के किसानों में खुशहाली आ गई। गोविन्दा शहद का बहुत बड़ा व्यापारी बन गया


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