अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
02.18.2014


मातृ भाषा नहीं राष्ट्र भाषा है हिन्दी

शिक्षा संस्कृति और सभ्यता की संवाहिका है जो जीवन भर निरन्तर चलने वाली एक सतत प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया की निरन्तरता बनाये रखने में भाषा एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है। भाषा ही वह माध्यम है जो पिछली पीढ़यों का ज्ञान विज्ञान वर्तमान पीढ़ी को हस्तांतरित करके आने वाली पीढ़यों के लिए सुदृढ़ आधार प्रदान करती है। इसीलिए मानव का भाषा, विशेष रूप से मातृ भाषा के प्रति एक स्वाभाविक आकर्षण होता है। पैदा होते ही व्यक्ति अपनी मातृ भाषा से जुड़ने लगता है। इस सन्दर्भ में हिन्दी की स्थिति कुछ विश्ष्ठिता लिए हुए है।

वास्तव में स्वतंत्र भारत ने यदि किसी के साथ सर्वाधिक अन्याय किया है तो वह है हिन्दी। इसका मुख्य कारण है कि हिन्दी किसी की मातृ भाषा नहीं है। भले ही हम औपचारिक रूप से हिन्दी को अपनी मातृभाषा के रूप में जन गणना के समय लिखवा दें अथवा कहीं आवेदन करते समय लिख दें। इस समय चीनी और अंग्रेज़ी के पश्चात हिन्दी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली उन्नत एवं समृद्ध भाषा है। इसे करोड़ों लोग सम्पर्क  भाषा के रूप में प्रयोग में ला रहे हैं परन्तु यह करोड़ों लोगों की मातृ भाषा नहीं है। उन प्रदेशों के निवासियों की भी नहीं जो प्रान्त हिन्दी प्रदेशों के नाम से जाने जाते है। हिन्दी बोलने, लिखने, पढ़ने और समझने वाले ही नहीं हिन्दी की रोटी खाने वाले विद्वान भी इस तथ्य को नकार नहीं सकते।

मातृ भाषा वह भाषा होती है जिसे हम अपने परिवेश से अनायास ही स्वाभाविक और प्राकृतिक रूप से सीख लेते हैं। मातृ भाषा स्कूल में परिमार्जित तो की जा सकती है सीखी नहीं जा सकती। इस सन्दर्भ में हिन्दी प्रान्तों के लोग भी सहज ही स्वीकार करते हैं कि उन्होंने हिन्दी पाठशालाओं में सीखी है। घर पर तो उन्होंने बृज, मैथिली, संथाली, हिमाचली, अवधी, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी और मुंडारी ही सीखी है। इस प्रकार हिन्दी इन सब बोलियों के बोलने वालों के लिए दूसरी सीखी हुई भाषा है।

यह तथ्यपरक भूल इसलिए हुई क्योंकि भारत को जब भाषाओं के आधार पर प्रान्तों में विभाजित किया गया तो दक्षिणी राज्यों को यह समझा दिया गया कि उत्तरी भारतीयों की मातृभाषा हिन्दी है जिस कारण वे अपने आपको हिन्दी से दूर करने लगे। उन्हें यह बताया ही नहीं गया कि हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है।

भारत एक ऐसा महान देश है जिसकी समृद्ध सभ्यता और संस्कृति का मुकाबला विश्व का अन्य कोई देश नहीं कर सकता। यहाँ विविधताओं का अक्षय भंडार है। यहाँ हर पाँच कोस पर लोगों की बोली में अन्तर आ जाता है। इसके सम्बन्ध में कहा भी गया है कि – “तीन कोस पर पानी बदले, पाँच कोस पर बानी” इसलिए भाषा की तो बात ही क्या हमारे पास कोई ऐसी बोली तक नहीं है जो किसी प्रान्त में एक सिरे से दूसरे सिरे तक एक रूपता से बोली और समझी जाती हो।

फिर हिन्दी हमारी मातृ भाषा नहीं तो क्या है - - राष्ट्र भाषा, राज भाषा, सम्पर्क  भाषा, शिक्षा के माध्यम की भाषा, अनुवाद की भाषा या फिर कुछ और। इसी और को ढूँढने का प्रयास संभवतः हम हर हिन्दी दिवस पर करते हैं और फिर वर्ष भर के लिए हिन्दी के प्रति उदासीन हो जाते है। यहाँ इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि स्वतंत्रता से पूर्व हिन्दी जन-जन की भाषा थी। इस भाषा ने सम्पूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोया था। जन चेतना में राष्ट्रीयता का समावेश करने वाली भाषा थी हिन्दी। परन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरन्त बाद हिन्दी से उसका राष्ट्रवाद छीन लिया गया। स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले सेनानियों के मध्य हिन्दी सम्पर्क भाषा थी। सहज रूप से यह स्वीकार कर लिया गया था कि जब आजादी मिलेगी तो स्वतंत्र राष्ट्र को एक राष्ट्रभाषा की आवश्यकता होगी तो हिन्दी को उसके पद पर सुशोभित कर दिया जायेगा परन्तु ऐसा नहीं हुआ। हिन्दी अपने ही घर में दूसरी राजभाषा बन कर रह गई।

हमारे संविधान निर्माताओं ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा की अपेक्षा राज भाषा कहना अधिक जरूरी समझा। संविधान की पहली पंक्ति लिखते ही यह बात स्पष्ट कर दी गई कि हिन्दी अनुवाद की भाषा होगी। “इंडिया दैट इज भारत” इसी मनोवृत्ति को दर्शाता है। हमारे संविधान में हिन्दी का कहीं भी राष्ट्रभाषा के रूप में उल्लेख नहीं किया गया। लगता है कि स्वतंत्र होते ही हमने राष्ट्र को विस्मृत करके राज्य की अवधारणा को अपना लिया। जब राष्ट्र ही नहीं रहा तो राष्ट्र भाषा कैसी- वह भी राज भाषा हो कर रह गई।

  विडम्बना यह है कि स्वतंत्रता से पूर्व मद्रास में हिन्दी स्कूलों में अधिकृत रूप से पढ़ाई जाती थी। १९३८ में वहाँ हिन्दी उच्च कक्षाओं में ऐच्छिक विषय के रूप में पढ़ाई जाती थी। मद्रास का मुख्य मंत्री बनने के पश्चात राजा जी ने पहली कक्षा से हिन्दी पढ़ाने का नियम बनाया। विरोध का एक भी स्वर कहीं से सुनाई नहीं दिया। स्वतंत्रता के एक दशक बाद हिन्दी के विरोध ने वहाँ एक आन्दोलन का रूप ग्रहण कर लिया। तब से आज तक इस विवाद का अन्तहीन सिलसिला चल रहा है।
आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि देश के जो थोड़े से लोग प्रशासन पर अपनी पकड़ बनाये हुए थे उनका हित इसी बात में था कि अंग्रेज़ी का वर्चस्व बना रहे। इसलिए जिस अंग्रेज़ी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में भी नहीं रखा गया था वह सह राज भाषा बना दी गई। आज भी यही स्थिति है।

आज हिन्दी संविधान सम्मत केन्द्र की राजभाषा है। संविधान की धारा ३४३ में कहा गया है कि संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। इसमें एक शर्त जोड़ दी गई कि प्रारम्भ के पन्द्रह वर्ष की अवधि तक संघ के उन शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका ऐसी शुरूआत से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था। यह एक ऐसा घेरा है जिसके विस्तार को रोकना किसी राजनैतिक दल के वश की बात नहीं है। पन्द्रह वर्ष तो क्या ५०० वर्ष तक भी नहीं फिर आधी श्ताब्दि से ऊपर का समय तो बीत ही गया है। क्योंकि चालाकी से यहाँ सह राज भाषा को मुख्य राजभाषा बना दिया गया।

आज तक न्यायालयों में न्याय प्रक्रिया पर अंग्रेज़ी का ही वर्चस्व है। सरकार का सारा राजकाज अंग्रेज़ी में ही चल रहा है। विभिन्न प्रान्तों की सम्पर्क भाषा भी अंग्रेज़ी ही है। भले ही हिन्दी दिवस मनाने के लिए हिन्दी के पक्ष में कुछ नारे सरकारी दफतरों में लिखे हुए दिखाई दे जायें।

राजनेता हिन्दी के माध्यम से वोट तो माँगते हैं परन्तु इसके लिए कुछ ठोस करने के लिए वे तैयार नहीं है। सरकार द्वारा जानबूझ कर ऐसी नीतियाँ तैयार की गई हैं कि लोग अधिक से अधिक अंग्रेज़ी के मोह जाल में फँसते जायें। भारत विश्व में एक मात्र ऐसा देश है जहाँ दो राजभाषाएँ हैं। भारतीय समाज विश्व में एक मात्र ऐसा समाज है जो अपनी भाषा हिन्दी के प्रति सर्वाधिक उदासीन है। इसका एक बड़ा कारण है रोटी रोजी कमाने के लिए अंग्रेज़ी की अनिवार्यता। आज शिक्षा नौकरी प्राप्त करने का माध्यम मात्र है। नौकरी अंग्रेज़ी की संगिनी है। देश की ८०-९० प्रतिशत नौकरियाँ ५-६ प्रतिशत अंग्रेज़ी जानने वालों का वरण करती हैं।

पूरे देश को भारत बनाम इंडिया अथवा हिन्दी बनाम अंग्रेज़ी के खेमों में बाँट दिया गया है। यह मानसिकता दिन प्रति दिन विकृत होती जा रही है। इसके अनेकानेक कारण हैं परन्तु सबसे बड़ा कारण है देश में राजनैतिक इच्छा शक्ति का अभाव । इस अभाव के कारण हिन्दी तो उपेक्षित हो ही रही है अन्य क्षेत्रीय भाषाओं का भी बुरा हाल है। क्षेत्रीय भाषायें एवं बोलियाँ जिन्हें हम विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले भारतीयों की मातृभाषा कह सकते है तभी समृद्ध हो सकती हैं जब हिन्दी को उसका वास्तविक स्थान मिले। वह वास्तव में राज भाषा और सम्पर्क भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो। भारतीय समाज राष्ट्रीय भावनाओं से ओत प्रोत हो कर उसे राष्ट्र भाषा के रूप में अंगीकार करे।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें