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| 05.31.2008 |
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क्यों करे इंडिया को भारत
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आखिर आप
लट्ठ लेकर पीछे क्यों पड़े हैं कि इंडिया को यहाँ से भगाया जाये और सिंहासन
पर तुरन्त भारत को बैठाया जाये। यह तो हमारे उन शासकों का सरासर अपमान है
जिन्होंने वर्षों तक हम पर राज किया और इंडिया के रूप में हमें स्वतंत्र
स्वराज दिया। यह हमारी संविधान निर्माताओं के प्रति भी गद्दारी होगी
जिन्होंने संविधान का निर्माण करते समय लिखा था इंडिया दैट इज भारत,
तुम मानते हो कि भाषा विज्ञान पर उन्हें पूरी तरह से थी महारत। यदि वे
चाहते तो स्वयं भारत दैट इज इंडिया लिखवाते और भारत की चर्चा तक से साफ बच
जाते। परन्तु ऐसा नहीं हुआ क्योंकि संविधान में इंडिया को किसी ने नहीं
छूआ। इंडिया हमारे लिए एक विरासत है जो अंग्रेज हमारे लिए छोड़ गये और भारत
जैसे पिछड़े देश को समग्र विश्व के साथ जोड़ गए। अब यदि हमें भारत के युग
में जाना है तो भारत को सोने की चिड़िया के रूप में आना होगा और तब इंडिया
को उसकी औकात बताना होगा-विश्व भर के लुटेरों को फिर से ललचाना होगा। सोने
की चिड़िया बनेगी तभी तो बहेलिए इधर का मुख करेगें,
दूध की नदियाँ बहेंगीं तभी तो लोग डूब डूब कर मरेंगे। फिर से राजमहल और
रनिवासों को सजाना होगा,
सोमनाथ को सोने चाँदी से मड़वाना होगा। मेरा आशय बिल्कुल स्पष्ट है कि
लूटेरे फिर दूर दूर से आयेंगे,
और
गधों घोड़ों की पीठ पर हीरे जवाहर लाद लाद कर ले जायेंगे।
आज के युग
में फिर से कैसे होगा यह सब,
तुर्क,
तातार,
मंगोल और अंग्रेज कहाँ से और कैसे आयेंगे अब। अपने अपने घरों में स्वयं ही
फंसे हुए हैं,
इतिहास के पन्नों के भीतर कहीं धंसे हुए हैं। फ्रांस और पुर्तगाल तक ने
भारत को लूटा पर हमने घृणा का बीज नहीं बोया,
सोना तो हमारा था सो हमने ही खोया। अब आप फिर से समय का पहिया पीछे की ओर
घुमाना चाहते हैं,
इंडिया को फिर से भारत बनाना चाहते हैं। जानता हूँ कि इतिहास स्वयं को
दोहराता है पर गया युग लौट के कहाँ आता है। मानता हूँ कि भारत एक साँझी
संस्कृति का नाम है और इंडिया में संस्कृति का कहाँ कोई काम है। इंडिया में
सभ्यता का अपने तरीके से वास है परन्तु संस्कृति तो उसके लिए कोरी बकवास
है। अंग्रेजों की सभ्यता को पूरा विश्व ही सभ्यता मानता है,
भारत को पिछड़ा हुआ हर कोई जानता है। यदि भारत को इंडिया के नाम से जाना
जायेगा,
तभी तो उसे प्रगतिशील राष्ट्र और पाश्चात्य सभ्यता का प्रतिनिधि माना
जायेगा। इसीलिए तो हमने उनकी वेश भूथा तक को है अपनाया,
और
उनकी भाषा को अपनी राष्ट्रभाषा तक है बनाया। उनके तकनीकी ज्ञान के हम आज भी
पुजारी हैं,
क्योंकि विश्व ज्ञान के चौसर पर अब हम पिटे हुए जुआरी हैं।
आज यदि
इंडिया भारत की तरफ मुड़ जायेगा,
तो
निश्चित है कि पुराने रीति रिवाजों और परम्पराओं के साथ जुड़ जायेगा।
वैलेनटाइन डे कैसे मनायेगें,
जन्म दिनों पर दीपक थूक और फूँक से कैसे बुझायेगें। फिर से बुर्जुगों के
चरण छूना जरूरी होगा तो वृद्ध आश्रम कैसे पनप पायेगें। संयुक्त परिवार
होगें तो क्रैच कैसे चल पायेगें। भाई भाई से नहीं लड़ेगा तो न्यायाधीश और
वकील क्या कमायेगें। समय का पहिया उल्टा घूमा तो
21वीं
सदी में कैसे जायेगें। वैसे भी नाम में क्या रखा है- नाम बदलने का स्वाद
बहुतों ने चखा है। सीलोन श्री लंका हो गया तो जातीय संर्घष में खो गया।
बर्मा म्यांमार बन कर भले ही तन गया पर वह धान का कटोरा भीख का कटोरा बन
गया। कम्पूचिया ने कम्बोडिया हो कर क्या पाया,
नई
नई समस्यायों ने ही तो सिर उठाया। रोडेशिया जिम्बावे हो कर क्या कर रहा है,
आज
भी अंग्रेजियत का पानी भर रहा है। मलावी,
ज्येरे,
जाम्बिया और न जाने कितने ही देशों ने जड़ों से जुड़ने का रास्ता चुना,
पर
अपना सुनहरी भविष्य कहाँ बुना। भारत को भी उन्हीं के रास्ते पर जाना चाहिए
ऐसा आप का विश्वास है,
पर
इस रास्ते से उज्ज्वल भविष्य की मुझे कहाँ आस है। यदि ऐसा होता तो हमारे
विद्वान संविधान निर्माता संविधान की पहली लाईन को ही नकार जाते,
और
अंग्रेजों के साथ साथ इंडिया जैसे शब्द को भी मार भगाते। परन्तु उन्होंने
इंडिया को स्वीकारा है तो साफ है कि भारत और उसकी अस्मिता को दुत्कारा है।
अब आप उनके किए कराये पर पानी फेर रहे हैं और अपने आप ही भारत भारत टेर रहे
हैं। इंडिया के नाम पर पब्लिक स्कूलों की शिक्षा चल जाती है,
पश्चिम की उपभोक्ता क्रान्ति हमें छल जाती है। भारत की शिक्षा के लिए हमें
फिर से गुरुकुल बनान होगें और मैकाले पुत्रों की जगह नंग-धड़ंग ऋषि मुनि
बैठाने होगें।
मैं मानता
हूँ कि ऐसे ही चलता रहा तो जन पर तंत्र भारी होगा,
इंडिया हमारे मन की लाचारी होगा। आप का कहना हैं कि भारत में जन देवता बन
जायेगा जो तंत्र को अपनी बुद्धि से चलायेगा। एक अरब देवता भारत में अपनी
अहम भूमिका निभायेगें और अपनी क्षमताओं सहित विश्व में फैल जायेगें। इंडिया
में पैदा होने वालों को गर्भ में आने से पहले
ही रोक दिया जाता है,
जो
वहाँ नहीं मरता उसे पैदा होते ही अभिमन्यु की भान्ति घेर कर मार दिया जाता
है । इसलिए इंडिया आबादी पर नियंत्रण का हर उपाय अपनाया है,
और
बंध्याकरण के साथ नई सदी में आया है।
लगता है
कि स्वदेशी वाले आधुनिक युग में नहीं जाना चाहते,
इस
लिए इंडिया को नहीं अपनाना चाहते। वे चाहते हैं कि संविधान की पहली गलती को
पहले सुधारा जाये और भारत दैट इज इंडिया के नाम से इस देश को पुकारा जाये।
यदि ऐसा ही है तो यह हमारी मजबूरी है स्वदेशी को स्वीकारा तो वैश्वीकरण से
टूटना जरुरी है। आप कुएँ में मेंढक बन कर रहना चाहते हो तो रहो,
इंडिया के मजे छोड़ कर भारत के कष्ट और दु:ख सहो। समृद्धिशाली सौतेली माँ
को छोड कर निर्धन माँ की जय कहनी हो तो कहो। पर जान लो आज धन धान्य सर्वत्र
पर भारी है पैसे की सत्ता स्वीकारना लाचारी है। फिर भी इंडिया को भगाना हो
तो भगाओ पर पहले भारत को स्वदेश में मजबूत तो बनाओ। स्वदेशी का नाम ही न लो
व्यवहार में भी अपनाओ। स्वदेशी का थोथा नारा क्या करेगा बेचारा। उसे
व्यवहार में अपनाओ भारत को इंडिया के बराबर तो लाओ। तब किसे संकोच होगा
भारत दैट इज इंडिया कहने में,
आपत्ति क्यों कर होगी अपनी मातृभूमि पर रहने में। यह सपनों का भारत जाने कब
बन कर होगा तैयार,
फिर भी उस दिन का हमें है बेकरारी से इन्तज़ार।
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