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ISSN 2292-9754

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09.07.2016


क्या हो विकल्प?

दीपक के सामने एक निर्धन महिला हाथ जोड़े गिड़गिड़ा रही थी, "साहब! जैसे भी संभव हो आप मेरे निर्दोष बेटे के साथ अन्याय न होने दें। मेरा एक ही बेटा है। मैं उसे बचाने के लिए अपना सब कुछ बेचने के लिए तैयार हूँ।"

दीपक जानता था कि उसके पास बेचने के लिए कुछ विशेष नहीं था। ले दे कर पच्चीस गज की एक कोठरी जिसमें माँ बेटे वर्षों से रह रहे थे। माँ दिन रात परिश्रम करके इस प्रयास में लगी रहती थी कि किसी न किसी प्रकार उसका बेटा अपनी पढ़ाई पूरी कर ले ताकि दोनों का भविष्य सुधर जाये। अचानक यह विपदा टूट पड़़ी। पड़़ोस के कुछ लड़कों ने जुआ खेलते हुए मारपीट की जिसमें उसे नाहक़ ही घसीट लिया गया था। उसका दोष मात्र इतना था कि घर के एक दम सामने झगड़ा होने के कारण वह घटना स्थल पर उपस्थित था।

नया-नया वकील बना दीपक उसे बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा था परन्तु अभी तक उसके हाथ कोई ऐसा ठोस सूत्र नहीं आया था जिससे वह न्यायालय में यह सिद्ध कर पाता कि वह इस लड़ाई में सम्मिलित नहीं था। अधिक से अधिक उसे तमाशबीन माना जा सकता था जो अपने घर के सामने होने वाले झगड़े को जिज्ञासा भरी नज़रों से देख रहा था। अन्य अनेक लोग भी वहाँ उपस्थित थे जो पुलिस को आता जान कर वहाँ से तितर-बितर हो गये थे। जब पुलिस वहाँ पहुँची उस समय भी वह वहीं खड़ा था।

न जाने क्यों उस महिला की आँखों की कातरता और उसके बेटे के मुख पर झलकने वाला आत्मविश्वास उसे यह मानने के लिए बाध्य कर रहे थे कि हो न हो इस लड़के ने कोई अपराध नहीं किया। उसने महिला को आश्वस्त करते हुए कहा, "माँ जी आप निश्चिंत हो कर घर जायें मैं देखता हूँ कि क्या किया जा सकता है। हाँ! आप मेरी फ़ीस की बिल्कुल चिन्ता न करें। मैं अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ूँगा।" महिला उसे दुआयें देते हुए उठ कर चली गई थी।

उसके जाने के बाद दीपक ने "बार रूम"में एक कप कॉफी मँगवाई और विचारों में निमग्न हो गया। कितने टेढ़े-मेढ़े रास्तों को पार करके आज वह यहाँ पहुँचा है। क्या-क्या नहीं सहना पड़ा उसे इसके लिए! दीपक एक अत्यंत सामान्य परिवार का सदस्य था। पिता की मृत्यु के पश्चात उसकी माँ ने दीपक और उसकी छोटी बहिन का बहुत लाड़-प्यार से लालन-पालन किया था। उसकी माँ एक कार्यालय में साधारण क्लर्क के पद पर काम करती थी।

स्कूली शिक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण करने के पश्चात जब दीपक ने कॉलेज में प्रवेश लिया तो उसे लगा कि वहाँ पर होने वाले अतिरिक्त व्यय के लिए उसे अपनी माँ पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। इसलिए उसने ट्यूशन करने का निर्णय किया। कॉलेज के पास की एक पॉश कॉलोनी के समृद्ध परिवार में उसे एक किशोरी नम्रता को पढ़ाने का अवसर मिल गया। सेठ धूमी मल और उनकी पत्नी को दीपक में कोई दोष दिखाई नहीं दिया था। फिर नम्रता को पढ़ाने के लिए वह उसके घर पर ही आने वाला था। इसके अतिरिक्त दीपक की माँ उन्हीं के एक मित्र के कार्यालय में वर्षां से नौकरी कर रही थी। अपनी पढ़ाई के साथ-साथ दीपक उसे बहुत ही मनोयोग से पढ़ाने लगा। उसके मृदल व्यवहार से नम्रता के माता-पिता उस पर पूरी तरह से विश्वास करने लगे। दीपक ने भी कभी उन्हें शिकायत का अवसर नहीं दिया। जब तक नम्रता ने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की तब तक दीपक ने भी अच्छे अंकों से स्नातक की उपाधि प्राप्त कर ली। कुछ पुराने विचारों के होने के कारण नम्रता को कॉलेज में प्रवेश नहीं दिलवाया गया जबकि उसकी शिक्षा एक प्रसिद्ध सहशिक्षा वाले पब्लिक स्कूल में हुई थी। सेठ धूमी मल जल्दी से जल्दी नम्रता के विवाह के लिए योग्य वर की तलाश में जुट गये।

दीपक अपनी पढ़ाई आगे जारी रखते हुए एल.एल.बी. करना चाहता था। इसके लिए उसे नये सिरे से ट्यूशन अथवा अन्य किसी कार्य की तलाश करनी थी जिससे उसे अपने खर्चों में कटौती न करनी पड़े। उसकी बहिन के बड़े होने के कारण घर के व्यय में भी वृद्धि हो रही थी। अभी उसे कोई काम तो नहीं मिला था परन्तु उसने लॉ कॉलेज में प्रवेश ले लिया। अचानक एक दिन घर में पुलिस आई और दीपक को गिरफ़्तार करके अपने साथ ले गई। जब बार बार उसने अपने दोष के विषय में पूछा तो उसे बताया गया कि सेठ धूमी मल ने उसके विरुद्ध नम्रता के अपहरण का आरोप लगाया है। कुछ दिनों से नम्रता का कुछ अता-पता नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि नम्रता अपने साथ एक बड़ी धनराशि और गहने लेकर ग़ायब है। उसे कुछ छुट्टियाँ व्यतीत करने के लिए अपनी मौसी के पास असम भेजा गया था। उसके साथ घर के एक पुराने नौकर को भी भेजा गया था परन्तु वह रास्ते से ही उसे चकमा दे कर लापता हो गई। उन्हें सन्देह है कि इसमें तुम्हारा ही हाथ हो सकता है। क्योंकि कुछ वर्षों से तुम नम्रता के बहुत क़रीब थे इसलिए उनके सन्देह को एक सिरे से ख़ारिज नहीं किया जा सकता। सेठ धूमी मल के पुलिस और राजनेताओं के साथ बहुत ही अच्छे और घनिष्ठ संबंध हैं इसलिए उनकी किसी शिकायत को अनदेखा करना हमारे वश की बात नहीं है। दीपक ने लाख समझाने का प्रयास किया कि उसने ऐसा कुछ नहीं किया परन्तु कोई भी इसे मानने के लिए तैयार नहीं हुआ। अन्ततः उसके विरुद्ध नबालिग़ लडकी के अपहरण का आरोप पत्र अदालत में दाख़िल कर दिया गया।

पुलिस ने उसकी माँ और मोहल्ले में रहने वाले लोगों से भी दीपक के बारे में गहरी पूछताछ की परन्तु किसी ने भी उसके चरित्र पर उंगली नहीं उठाई, न ही उसे कभी किसी लड़की के साथ देखा गया था। पुलिस नम्रता को पूरे देश में तलाश कर रही थी परन्तु उसका कोई अता पता नहीं लगा। पुलिस के पास भी कोई ऐसा सबूत नहीं था जिससे वह दीपक को दोषी सिद्ध कर पाती। दीपक को जेल में डाल दिया गया और जैसा कि हमारे देश में आम तौर पर होता है एक के बाद एक तारीख दी जाती रही। दीपक का परिवार किसी बड़े और महँगे वकील की सेवाएँ लेने में असमर्थ था जबकि सेठ जी के पास वकीलों की कोई कमी नहीं थी।

बहुत भाग-दौड़ के बाद पुलिए नम्रता की एक सहेली को अदालत में पेश करने में सफल हो गई। उसने कहा कि यद्यपि नम्रता उसके साथ कभी कोई विशेष बात "शेयर" नहीं करती थी परन्तु एक बार उसने कहा था कि यदि उसके माता-पिता मुझे यूँ ही बाँध कर रखेंगे तो मैं एक दिन अपने दीपू के साथ छूमंतर हो जाऊँगी और सब देखते रह जायेंगे। उसकी सहेली ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि नम्रता बहुत ही चुपचाप रहने वाली संकोची लड़की थी और उससे इस प्रकार की बात की किसी को आशा हो ही नहीं सकती थी। उसके किसी लड़के साथ अंतरंग संबंध हो सकते हैं इसकी भी कल्पना नहीं की जा सकती थी। क्योंकि दीपक का उसके साथ प्रति दिन का मिलना था और उसके नाम के लघु रूप को दीपू मान कर उस पर सन्देह होना स्वाभाविक माना जा सकता था परन्तु इस गवाही के आधार पर किसी को सज़ा देना संभव नहीं था। नम्रता और उस धनराशि की भी चारों ओर खोज की जा रही थी परन्तु कोई भी सुराग़ हाथ नहीं लग रहा था। नम्रता की लाश की भी तलाश की जा रही थी और उन गहनों के लिए ऐसे सुनारों के यहाँ छापे मारे गये जो इस प्रकार के ज़ेवर इत्यादि ख़रीदते थे परन्तु यहाँ भी असफलता ही हाथ लगी थी। न तो नम्रता के मोबाइल फोन से और न ही उसके कम्प्यूटर से कोई ऐसा संकेत मिला जिससे लगता कि वह किसी अन्य लड़के साथ बातचीत किया करती थी।

सेठ धूमी मल किसी न किसी प्रकार दीपक को दोषी ठहराने में जुटे थे। उन्हें विश्वास था कि यदि पुलिस सख़्ती से पूछताछ करेगी तो दीपक अवश्य ही टूट जायेगा। उन्हें लगता था कि ग़रीब दीपक ने केवल पैसों के लिए ही नम्रता का अपहरण किया है और उसे कहीं छिपा कर रखा है परन्तु कहाँ इसका उत्तर किसी के पास नहीं था। इस दिशा में भी सोचा गया कि शायद उसे फिरौती के लिए उठा लिया गया हो परन्तु ऐसी कोई सूचना भी पुलिस को नहीं मिली। जैसे-तैसे पुलिस ने एक लचर "केस" दीपक के ख़िलाफ़ बना कर उसे दोषी सिद्ध कर दिया और उसे सात वर्ष की सज़ा काटने के लिए जेल भेज दिया गया। दीपक और उसकी माँ क़ानून का हर दरवाज़ा खटखटाते रहे परन्तु कोई भी द्वार उनके लिए नहीं खुला जबकि अधिकांश लोग उसे निर्दोष मानते थे। इस बीच सेठ धूमी मल का देहान्त हो गया। नम्रता की माँ ने भी यह मान लिया कि वह अब इस संसार में नहीं होगी।

थक हार कर दीपक ने इसे अपनी नियति मान कर स्वीकार कर लिया और जेल में क़ानून की पढ़ाई प्रारम्भ कर दी। जेल के अनेक अधिकारियों और क़ैदियों की उसके साथ पूरी सहानुभूति थी इसलिए उसे पढ़ाई करने में किसी प्रकार की बाधा नहीं आई। उसकी माँ और बहिन नियमित रूप से उसे जेल में मिलने आते और उसे घर परिवार की हालत से अवगत करवा देते। नियत समय पर उसे क़ानून की डिग्री भी मिल गई।

अचानक इस मामले में एक नया मोड़ आया जिसने सारे केस की दिशा ही बदल कर रख दी। एक दिन नम्रता अपने पति दीपेन्द्र वीर बहादुर सिंह और दो बच्चों के साथ अपने घर पहुँच गई। उसे देख कर माँ और आस-पड़ोस के लोग हैरान रह गये। जब नम्रता को पता लगा कि उसके अपहरण के मामले में दीपक जेल की सलाखों के पीछे है तो उसे बहुत ही पश्चाताप हुआ। वह आत्मग्लानि से भर उठी। उसे लगा कि कम से कम उसे एक पत्र तो घर वालों को लिखना ही चाहिए था। वैसे भी वह दीपक का बहुत आदर करती थी। वह तुरन्त अपने पति के साथ थाने पहुँच गई। वहाँ उसने पुलिस को सारी स्थिति से अवगत कराया। उसने बताया कि स्कूल के एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में उसकी भेंट दीपेन्द्र के साथ हुई थी। वे दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे थे। परन्तु उन्हें कभी एक साथ देखा नहीं गया क्योंकि कुछ ही दिनों बाद दीपेन्द्र अपनी पढ़ाई समाप्त करके घर लौट गया था। वैसे भी दीपेन्द्र के अंगरक्षक उस पर कड़ी नज़र रखते थे और उसके लिए इधर-उधर जाना संभव भी नहीं था। जाते-जाते एक आधुनिक परन्तु छोटा सा लैपटॉप दीपेन्द्र उसे उपहार में दे गया था। लैपटॉप वह सदैव अपने बस्ते में रखती थी और उसे अपने साथ ही ले गई थी। उस "लैपटॉप" पर भी वह केवल दीपेन्द्र से ही बात करती थी। उनकी आपस में "इन्टरनेट" पर घंटों "चैट" होती थी। घर में उसके साथ बात करने वाला भी कोई नहीं था। अनपढ़ माँ थी जिसे घर गृहस्थी और रिश्ते-नाते निभाने से ही फुर्सत नहीं मिलती थी और पिता दिन रात अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने में ही व्यस्त रहते थे।

उसने बताया कि दीपेन्द्र का नेपाल की एक छोटी सी रियासत के राजघराने से संबंध है और उसे सुरक्षा की दृष्टि से भारत में पढ़ाई करने के लिए भेजा गया था। नेपाल पहुँचते ही दीपेन्द्र ने उसे "प्रपोज़" कर दिया था परन्तु वे लोग नम्रता की शिक्षा पूरी होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। स्कूल की शिक्षा के बाद जब कॉलेज भेजने की अपेक्षा उसके लिए रिश्ते की तलाश की जाने लगी तो उसने दीपेन्द्र के पास नेपाल जाने का निर्णय कर लिया। जल्दी ही उन्हें यह सुनहरा अवसर मिल गया जब उसे असम भेजने का निर्णय किया गया। अपनी योजना के अनुसार वह जलपाई गुड्डी में ही रेल से उतर गई थी जहाँ पर दीपेन्द्र की कार पहले से ही उसके स्वागत के लिए खड़ी थी। जबकि नौकर आगे की यात्रा पूरी करने के लिए रेल में आराम से सोता रहा होगा। उसे अपनी मंज़िल पर पहुँच कर ही पता लगा होगा कि नम्रता रास्ते में ही कहीं उतर गई है। मेरे विचार में जब तक उसकी आँख खुली होगी हम लोग नेपाल की अपनी रियासत में पहुँच गये थे। यह सारी योजना मैंने ही बनाई थी और दीपेन्द्र का इसमें कोई योगदान नहीं था।

पुलिस ने सारी जानकारी मिलते ही दोबारा दीपक के मामले को न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत किया और अपनी ग़लती के लिए क्षमाप्रार्थना करते हुए दीपक को तुरन्त रिहा करने की माँग की। नम्रता और उसकी माँ को इसमें कोई अपत्ति थी ही नहीं। सेठ धूमी मल अब इस दुनिया में रहे नहीं थे। सारा मामला दर्पण की तरह साफ़ था। कोर्ट के सामने उसे बाइज़्ज़त रिहा करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था। अदालत में न्यायाधीश द्वारा स्वीकार किया गया कि दीपक के साथ बहुत बड़ा अन्याय हुआ है जिसकी आर्थिक रूप में अधिक से अधिक भरपाई की जानी चाहिए। जहाँ तक उसके जेल में व्यतीत किये गये वर्षों का प्रश्न था तो उसमें कुछ किया नहीं जा सकता था सिवा खेद व्यक्त करने के परन्तु दीपक इतने भर से सन्तुष्ट नहीं था। उसका कहना था कि अदालत उसे जीवन के वे वर्ष लौटाये जो निर्दोष होते हुए भी उसने जेल में व्यतीत किये थे। दीपक ने उच्च न्यायालय को यह विकल्प सुझाया कि उसकी जन्म तिथि को क़ानूनन पाँच वर्ष पीछे कर दिया जाये और उसी के अनुरूप उसके भावी जीवन का निर्धारण हो। अथवा उसकी सेवा निवृति को पाँच वर्ष आगे बढ़ा दिया जाये। अर्थात यदि कभी वह किसी पद पर आसीन हो तो उसे पाँच वर्ष बाद "रिटायर्ड" किया जाये। अदालत का कहना था कि ऐसा कोई भी उदाहरण क़ानून की किताबों में नहीं है इसलिए इस विषय में कुछ नहीं किया जा सकता।

दीपेन्द्र और नम्रता ने उसे परिवार सहित नेपाल ले जाने का प्रस्ताव रखा जिसे उसने अस्वीकार कर दिया क्योंकि जेल से रिहा होते ही उसने ऐसे लोगों के मुकदमे लड़ने का निर्णय किया था जिन में उसके अनुसार आरोपी को बिना ठोस सबूतों पर सज़ा दी जा रही हो।

उच्च न्यायालय के निर्णय के विरोध में उसने उच्चतम न्यायालय में इस बारे में अपील की। वहाँ भी जब निर्णय उसके पक्ष में नहीं सुनाया गया तो उसने उच्चतम न्यायालय के "फ़ुल बैंच" के सामने नये सिरे से सारा मामला उठाने का निर्णय किया। उसका कहना था कि यदि आज से पहले ऐसा कभी नहीं किया गया तो अब क्यों नहीं किया जा सकता। इस विकल्प को पहली बार क्यों नहीं अपनाया जा सकता। अथवा उच्चतम न्यायालय बताये कि इसका क्या विकल्प हो सकता है? इसी सन्दर्भ में वह तैयारी करने के लिए "बार रूम" की "लायब्रेरी" में बैठा था। उसे पता नहीं लगा कि वेटर कब उसके सामने कॉफी रख गया था जो अब तक ठंडी हो चुकी थी।


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