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04.14.2014


कंघी और ब्रश की संधि

हिमालय की गोद में एक छोटी सी रियासत थी बनेसर। उसका राजा अचल सैन बहुत ही न्यायप्रिय शासक था। उसकी एक ही बेटी थी। उसका नाम चंचला था। वह अपने नाम के अनुरूप ही बहुत चंचल थी। दिन भर तितलियों की तरह कभी यहाँ और कभी वहाँ राजमहल में चौकड़ियाँ भरती रहती। उसकी माँ रस कुँवर जहाँ अपनी शोख और चंचल बेटी को देख-देख कर प्रसन्न होती वहीं उसे उसके भविष्य की चिन्ता भी सताती रहती। चंचला अब किशोरावस्था पार करके यौवन की दहलीज़ पर कदम रख रही थी। वह दिन भर आईने में अपने बेहद सुन्दर रूप को निहारती रहती। हमेशा ही उसके हाथ में कंघी रहती और वह थोड़ी-थोड़ी देर बाद अपने बालों को सँवारने लगती। राजकुमारी के सुनहरे, लंबे और घने बाल उसकी सुन्दरता को चार चाँद लगा देते थे। जो भी उसे देखता बस देखता ही रह जाता। राजकुमारी का कद सामान्य से कुछ अधिक ही था और उसके लंबे बाल निरन्तर उसकी एड़ियों को छूते रहते थे।

राजकुमारी की समस्या यह थी कि निरन्तर कंघी से बाल साफ करने में उसे बहुत खीज उत्पन्न होती। इसलिए महारानी ने कुछ दासियों को विशेष रूप से उसके बालों की देख-भाल करने का काम सौंप रखा था। जब भी राजकुमारी खेलती तो उसके लंबे बाल हवा में छितरा कर आपस में उलझ जाते। ज्यों ही राजकुमारी विश्राम के लिए बैठती दासियाँ उसके बालों में कंघी करना प्रारम्भ कर देतीं। हवा में निरन्तर उड़ने वाले धूल के कणों से कंघी जल्दी ही भर जाती। उसे साफ करने में बहुत ही देर लगती थी। इसके लिए परिश्रम भी करना पड़ता था। इसके लिए दासियों को कीकर के काँटों का प्रबंध करना पड़ता था। दो तीन दाँते साफ करने पर काँटा टूट जाता था। दासियाँ सफाई के काम को बीच में ही छोड़ कर दूसरे कामों में लग जातीं थीं। इससे कंघी को बहुत क्रोध आता था। परन्तु वह कुछ कर नहीं पाती थी। इसलिए मन मार कर तेल से लथपथ धूल कणों को अपने दाँतों में भरे हुए ही उसे समय काटना पड़ता। जब जब वह दासियों को अपनी सफाई करने के लिए कहती वे टाल जातीं। राजकुमारी को भी बालों में कंघी के फंसने के कारण दर्द होता था। कई बार उलझे बालों को सुलझाने में कुछ बाल टूट कर कंघी के साथ बाहर आ जाते थे। अपने टूटे हुए बालों को देख कर राजकुमारी की आँखों में आँसू आ जाते थे।

एक दिन राजा के दरबार में दूर देश से कोई सौदागर आया। वह राजा और रानी के लिए बहुत से उपहार लेकर आया था। राजकुमारी के विषय में उसे कुछ ज्ञात ही नहीं था। जब उसने राजकुमारी को देखा तो वह उसका सौन्दर्य देखता ही रह गया। राजकुमारी के बालों की लम्बाई ने तो उसे हैरत में ही डाल दिया। तभी उसे ध्यान आया कि उसके पास बालों की संभाल करने वाला एक ब्रश है। उसने वह ब्रश राजकुमारी को भेंट में दे दिया। राजकुमारी को वह ब्रश बहुत पसंद आया। ब्रश कोमल परन्तु छोटे-छोटे बालों वाला था। उससे सिर के बाल बहुत आसानी से साफ हो जाते थे। उसके कोमल स्पर्श के कारण राजकुमारी को कोई असुविधा भी नहीं होती थी। राजकुमारी को उसे सिर पर फेरना बहुत भाता था। अब कंघी का स्थान ब्रश ने ले लिया। कंघी उपेक्षित सी पड़ी रहती। केवल जब राजकुमारी अपने बाल धो कर सुखाती तब उनमें तेल लगाने के बाद दासियाँ कंघी का उपयोग करतीं। धोने के बाद बाल वैसे भी अधिक उलझे रहते। कंघी में भरे मैल के कारण राजकुमारी के बालों को सँवारने में दासियों को कठिनाई होती। कंघी को यह सब अच्छा नहीं लगता था। उसे ब्रश से थोड़ी ईर्ष्या भी होने लगी थी। पर उसे इस बात की प्रसन्नता भी थी कि ब्रश के कारण राजकुमारी के बाल पहले की अपेक्षा अधिक सजे सँवरे रहते थे।

एक दिन कंघी ने ब्रश से अनुरोध किया, "यदि तुम मेरी सफाई कर दोगे तो बाल धोने के बाद राजकुमारी के बाल ठीक से सँवर जाया करेंगे। इससे उन्हें पीड़ा भी नहीं होगी और बाद में तुम्हें भी कम काम करना पड़ेगा। आखिर तुम भी तो राजकुमारी के बालों को ही सँवारना चाहते हो। जब राजकुमारी स्नान करने के बाद बाल सँवारती हैं तो उन्हें बहुत कष्ट होता है।"

ब्रश ने बहुत हिकारत भरी नज़रों से कंघी को देखा और कहा, "तू इतनी निकम्मी है कि अपनी साफ सफाई भी स्वयं नहीं कर सकती। मुझे देखो मुझ पर यदि कोई प्यार से अपना हाथ फेर दे तो मैं साफ हो जाता हूँ। फिर मेरा तेरा क्या मुकाबला। मैं विदेश से आया हूँ जबकि तुम तो बिल्कुल यहाँ की स्थानीय कंघी हो। तुम्हारे दाँतें तक बराबर नहीं हैं। ऊपर नीचे होने के कारण ही वे राजकुमारी को कंघी करते समय घायल कर देते हैं। मेरे बाल देखो कितने कोमल और समतल हैं।"

कंघी को ब्रश की बातें सुन कर बहुत दुःख हुआ। परन्तु वह चुप रही। धीरे-धीरे ब्रश के भीतरी हिस्सों में भी मैल भरने लगा। मैल के कारण उसके बाल कड़े पड़ने लगे। निरन्तर बालों में फिराए जाने के कारण अधिक से अधिक मैल उसमें जमा होने लगा। अब ब्रश केवल हाथ फिराने से ही साफ नहीं होता था। गहराई से मैल निकालने के लिए दासियाँ कभी उसके बालों के इधर करती कभी उधर। इसके लिए वे किसी नुकीली वस्तु का प्रयोग करके मैल को खुरच कर बाहर निकालने का प्रयास करती। इससे ब्रश को कई बार खरोंच भी लग जाती थी। उसका सौन्दर्य धीरे-धीरे कम होने लगा। धोने पर उसकी पालिश खराब हो जाती। गीले होने पर उसके बाल भी टेढ़े-मेढ़े हो जाते। ठीक से साफ न होने के कारण ब्रश राजकुमारी के बालों को ठीक से साफ नहीं कर पाता था। अब ब्रश को कंघी की आवश्यकता का भान हुआ। उसे लगा कंघी ठीक ही कह रही थी। मामला तो एक दूसरे के सहयोग का था। तू मेरी पीठ सहला मैं तेरी पीठ सहलाऊँ की तर्ज पर दोनों का काम हो सकता था। मैंने नाहक ही छोटा समझ कर उसका अपमान किया। यदि कंघी मेरी सफाई कर दे तो मेरी मैल बहुत आसानी से निकल सकती है। इसी प्रकार मैं कंघी को साफ कर सकता हूँ। अब समस्या यह थी कि वह किस मुँह से कंघी के सामने अपनी बात रखे। जब कंघी ने यह प्रस्ताव किया था तब उसने बहुत बुरी तरह से उसे डपट दिया था और उसका अपमान भी किया था।

एक रात सोने से पूर्व राजकुमारी ने ब्रश कंघी के बिल्कुल पास ही रख दिया। इतना पास कि दोनों के बदन एक दूसरे को छू रहे थे। पहले तो कंघी को लगा कि ब्रश अपनी शान दिखाने के लिए उससे दूर हट जायेगा। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि ब्रश धीरे से उसके समीप आया और बोला,"थोड़ा सा मेरे बालों को साफ कर दो।" कंघी को लगा ब्रश ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया है तो उसे भी पीछे नहीं हटना चाहिए। वह भी धीरे से उसके नीचे सरक आई। कंघी ने देखा कि उसके स्पर्श से ब्रश के ऊपर जमे धूल कण साफ हो गए हैं। ब्रश भी बहुत उत्साहित हो कर बार-बार अपना शरीर कंघी के ऊपर रगड़ने लगा। कंघी को उसका कोमल स्पर्श बहुत अच्छा लगा।

कंघी तुरन्त उससे दूर हो गई। उसने कहा, "जब तक दोनों एक दूसरे से स्थायी रूप ये सहयोग नहीं करेंगे तब तक कोई लाभ होने वाला नहीं है। जैसे तुम्हारे ऊपर से थोड़ा मैल हट गया है वैसे ही मेरा शरीर भी ऊपर से साफ हो गया है। परन्तु उस मैल का क्या जो हम दोनों के भीतरी भागों में जमा हुआ है। हमारे मन में भी एक दूसरे के प्रति मैल भरा है। यदि तुम थोड़ा ठीक से मेरे बदन की सफाई कर दोगे तो वह सारी मैल बाहर निकल जायेगी। इसी प्रकार मैं तुम्हारे बालों में कंघी करके नीचे तह में फंसी गंदगी को भी बाहर निकाल दूँगी। इस प्रकार बारी-बारी से हम दोनों एक दूसरे की सफाई करने में सफल होंगे।"

"स्थायी रूप से तुम्हारा क्या मतलब है" ,ब्रश ने पूछा।

 "इसके लिए तुम्हें मेरे साथ पक्की दोस्ती करनी पड़ेगी। इतना ही नहीं, यह वायदा भी करना पड़ेगा कि भविष्य में जब भी मेरे दाँतों में मैल जमा होगा तुम उसे बाहर निकाल दोगे। इसी प्रकार मैं भी समय समय पर तुम्हारे बालों की सफाई करती रहूँगी। इससे दोनों की भलाई है। हमारे परस्पर सहयोग से राजकुमारी को भी कोई कष्ट नहीं होगा।" कंघी ने उत्तर दिया।

"मुझे मंजूर है।" इतना कह कर ब्रश ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। दोनों ने एक दूसरे के साथ सहमत होते हुए हाथ मिलाया। यह वायदा भी किया कि दोनों इस बात का ध्यान रखेंगे। तब से कंघी और ब्रश में हुई संधि के कारण दोनों एक दूसरे की सफाई का पूरा-पूरा ध्यान रखते हैं। सदियों पहले हुई उन दोनों की संधि के नियमों का पालन आज तक उनके वंशज भी कर रहे है। वे परस्पर सहयोग से प्रसन्नता पूर्वक एक ही स्थान पर रहते हैं। इसीलिए यह कहावत प्रचलित हुई - एक ब्रश था एक थी कंघी, दोनों में हुई पक्की संधि।


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