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| 05.31.2008 |
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जूठन ही सत्य है |
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न जाने
हमने कहाँ यह पढ़ा है,
अथवा यह जुमला हमने स्वयं ही गढ़ा है। "जूठन ही आदि है जूठन ही अन्त है।
जूठन सर्वत्र है,
जूठन दिग्दिगंत है।" इतना ही नहीं इससे भी अधिक का ध्यान हमें आ रहा है या
फिर यहाँ भी हमारा मन हमें भरमा रहा है- "जूठन अवशेष है,
शेष का भी शेष है। शेष में ही समाविष्ट सम्पूर्ण समावेश है। जूठन मानव की
सभ्यता और संस्कृति का परिवेश है। जिस सभ्यता की जितनी जूठन बचेगी वह उतनी
ही विकसित कहलायेगी,
जिसे जितनी जूठन मिलेगी उतनी ही उसकी औकात बढ़ती जायेगी।
भारत में
जूठन की अपनी शाश्वत परम्परा कड़ी दर कड़ी बनी है,
इसी के आधार पर हमारी जातिवादी व्यवस्था की ध्वजा तनी है। सभी जातियों का
जो बचा खुचा भोजन पाते हैं,
हम
वही स्वपच भगत के वंशज आज समाज में
’स्वपच‘
कहलाते हैं। भंगी,
डोम और चंडाल भी इसी जाति समूह में आते हैं। हम समाज की सबसे निचली सीढ़ी पर
खड़े हैं यह सब जानते हैं,
परन्तु हमें समाज की नींव कह मानते हैं। हम जूठा खाते हैं इसमें किसी को
क्या आपत्ति है,
सुच्चा तो वैसे भी उच्च वर्ग की ही सम्पति है। सुच्चा वे किसी को भी देते
नहीं हैं,
जूठन भी हम उन से लेते नहीं हैं। वे तो जूठन कूड़े के ढेर पर फिंकवाते हैं,
वहीं से हम लड़ झगड़ कर उसे उठाते हैं। भूखे रहने का स्वाद क्या कभी उन्होंने
चखा है,
खाली पतीली के उबलते पानी में क्या कभी भात पका है। यदि हम किसी भोज के
जूठे पत्तल उठाते हैं तो आपके प्राण क्यों निकले जाते हैं। जूठा भोजन तो आप
जान बूझ कर बचाते हैं,
इस
प्रकार से समाज में अपनी शान दिखाते हैं।
आप ठीक
समझते हैं कि यदि आप भोज में जूठन छोडने की रीत नहीं चलायेंगे,
तो
हम लोग भोजन कहाँ से पायेंगे। जानते हैं कि बचा खुचा देने में भी लोग बहुत
कतराते हैं,
इसीलिए तो आप जान बूझ कर हमारे लिए जूठन बचाते हैं। हम आपके अहसानमंद हैं
कि इससे हमें अच्छे अच्छे पकवान मिलते हैं खाने को,
नहीं तो हमारे पास कैसे होते नमकीन और मिष्ठान बच्चों तक के लिए दिखाने को।
आपक रीति
रिवाज भले ही पुराने हैं परन्तु इसके अर्थ बहुत सुहाने हैं। शव पर पड़े
कपड़ों को हम तुरन्त हैं उठाते,
तभी तो आप हमारी खातिर उन्हें नहीं जलाते। मरने वाले का चारपाई बिस्तर हमें
बहुत सुहाता है,
आपका तो मरने वाले की विरासत तक से ही नाता है। आप मरने से पहले ही उन्हें
मरा मान लेते हैं,
सम्पति का एक एक कागज तक छान लेते हैं। हमारा नम्बर तो बाद में आता है,
पहले तो परिवार ही मरने वाले की एक एक को चीज उठाता है। मरने के बाद आप
समाज को भोज पर बुलाते हैं,
वास्तव में आप दिवंगत शरीर की कितनी सेवा करते थे यह सब को दिखाते हैं।
वक्त पर जिसे आप एक - दो रोटी तक से तरसाते हैं,
उसके श्राद्ध पर माल पूए और हर पकवान पकाते हैं। यह बात आप ऊपरी समाज को ही
नहीं उसकी निचली सीढ़ी वालों को भी बताते हैं,
तभी तो जानबूझ कर जूठन दर जूठन बचाते हैं।
जूठन खाने
वालों की आपने अलग से जातियाँ तक हैं बनाई उन्हें स्वपच जैसी संज्ञा आपने
ही सौंपी है भाई। जानते हो जूठन के लालच में हम हर पत्तल को साफ कर डालेगें,
नहीं तो इतने कुत्ते आप कहाँ से पालेंगे। फिर आपके कुत्तों को भी तो जूठन
खाने का अभ्यास नहीं है,
वातानुकूलित घरों में रहने वालो कुत्तों को आप से ऐसी आस नहीं है।
आपकी
सुविधा के लिए ही तो हम डोम,
भंगी और चंडाल हैं,
नहीं तो दिल से तो आप हम से भी ज्यादा कंगाल हैं। हम आम की गुठलियाँ एकत्र
करके उनको सुखाते हैं,
आपका गेहूँ बचाने के लिए उनका आटा बनाते हैं। आपको रोटी और बिस्कुट तक नहीं
पचता,
हम
मक्के की लेई तक पचाते हैं। जो जूठन आप फेंकते हैं हम उसे आपकी ही खातिर
खाते हैं। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि अन्न का अनादर न हो इसलिए हम उसे
आदर के साथ जमीन से उठाते हैं और सिर माथे पर लगा कर अपनी झोंपड़ी में ले
जाते हैं। हम आपका लाख लाख धन्यवाद करते हैं कि आपने हमें झोंपड़ी बनाने को
जमीन तो दी है,
यह
दीगर बात है कि बदले में आपने हमारी जुबान तक सी है। पर यदि आप हमें अपने
गाँवों के बाहर न बसाते तो क्या अपने मुर्दों को अपने आप जलाते। वास्तव में
आप वसुधैव कुटुम्बकम के सच्चे हिमायती हैं,
इसीलिए आपके मुर्दों की बारात के हम ही बाराती हैं। जीवन यात्रा का अन्तिम
संस्कार आप हम पर छोड़ते हैं,
इस
प्रकार पूरे जीवन को हमारे साथ जोड़ते हैं।
आपके समाज
में जूठन के किस्से बड़े सुहाने हैं। कुछ नए तो कुछ पुराने हैं। एक बार की
बात है महात्मा गांधी और जमना दास बजाज एक पंगत में बैठ कर एक साथ भोजन पा
रहे थे। गांधी जी को पकवान बहुत लुभा रहे थे। जमना दास जी वैसे ही बहुत कम
खाते थे,
वास्तव में वह देश का आनाज बहुत बचाते थे। गांधी जी ने उनके मना करने पर भी
एक कचौड़ी उनके पत्तल में डाल दी,
जैसे अपनी कोई नई राजनीतिक गोट उछाल दी। वह कूटनीतिज्ञ की भान्ति चुपचाप
देखते रहे कुछ बोले नहीं,
जल्दी से मन के पत्ते खोले नहीं। उन्होंने जब उसे खाने का कोई उपक्रम नहीं
किया,
तो
गांधी जी को लगा कुछ अलग से है हुआ। उनकी दी हुई कचौड़ी को कोई क्यों
नकारेगा,
इससे तो वह अपना भविष्य ही सँवारेगा। बाहर जा कर दस लोगों को बतायेगा कि
मुझे बापू ने स्वयं परोसा था,
कितने स्नेह से भरा उनका न्यौता था।
पर जमना
दास उसे खा नहीं रहे थे। उसका कारण भी बता नहीं रहे थे। बहुत पूछने पर बोले,
"सोचता
हूँ कि अन्न का अनादर करके इसे कूड़े में डालूँ अथवा बीमार होने के लिए पेट
के कूड़ाघर में समा लूँ। मेरे लिए दोनों ही स्थितियाँ विकट हैं,
आप
तो सब जानते हैं क्योंकि आप सत्य के बहुत निकट हैं। जैसा देगें आदेश
मानूँगा,
अदना से कूड़े के लिए आप के साथ रार नहीं ठनूँगा। बापू जानते थे कि बाहर
जूठन खाने वालों की कतार है,
यहाँ पर भंडार में पकवानों की भरमार है। बापू ने तो जानबूझ कर जूठन को
बढ़ाया था,
जूठन खाने वाला हमारा वर्ग भी तो इसी समाज का हमसाया था।
जानते थे
कि हमारे देश में वर्षों से जानबूझ कर भोजन जबरदस्ती परोसा जाता है,
ऊपरी न न कहने पर भी मन से कहाँ रोका जाता है। प्रयास यही रहता है कि खाने
वाला खा नहीं पाये,
और
हम जैसे जूठन खाने वालों के लिए जूठन बचाये। कितना परोपकारी समाज था,
उसे हर एक की आवश्यकता का पूरा आभास था। बुरा हो इस आधुनिक समाज का जिसने न
जाने क्यों
’बूफे‘
से
नाता जोड़ लिया,
और
तरमाल वाले पकवानों से रिश्ता तोड़ लिया। पत्तलों पर तो खाना ही छोड़ दिया,अपना
रूझान जूठी प्लेटों में खाने की ओर मॊड़ दिया। शायद इसी प्रकार आप भी कुछ
जूठन ा लेते हैं और हमसे समरसता का ोई नाता निभा लेते हैं।
’स्लिम‘
होने के चक्कर में आप लोग थोड़ा बहुत सलाद मुँह को छुआते हैं और मिष्ठान के
नाम पर हवा भरी आईस क्रीम खाते हैं। फिर भी कुछ लोग तो हमारा भी रखते हैं
ध्यान,
और
बिना देखें प्लेटों में भर लेते हैं सब सामान। इस प्रकार हमें भी थोड़ा बहुत
मिल जाता है सहारा,
हमारे वर्ग का भी हो ही जाता है गुजारा।
एक बार
किसी ने हमारी स्वपच जाति के लोगों से पूछा,
"आखिर
तुम जूठा खाते क्यों हो,
जूठन देने वालों के गीत गाते क्यों हो।"
हमन सगर्व
निस्संकोच बताया,
"जूठन
हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है,
हमें हर तरह की जूठन स्वीकार है।" शास्त्र प्रदत्त हम अपना यह अधिकार नहीं
छोड़ेगें,
इससे वंचित किया तो भेद भाव करने का ठीकरा आपके सिर फोड़ेगें। हम जब कूड़े के
ढेर पर कुत्तों के साथ झगड़ते हैं तो आपका भी तो होता ही है मनोरंजन,
इस
छीना झपटी का कारण भी तो होता है आप का एक एक व्यजंन।"
"आप क्या
जानते नहीं कि आपके समाज का यह पुराना चलन था कि जिस के भोज के बाद जितनी
अधिक जूठन कूड़े के ढेर पर आती थी,
उसी के अनुपात में उसकी बिरादरी में औकात नापी जाती थी। जैसे आज कल अमरीका
में चुनाव प्रचार के दौरान किसी भी प्रत्याशी की प्रसिद्धि इस बात से नापी
जाती है कि उसके समर्थन में निकलने वाले जुलूस में कितना कचरा सड़कों पर
फैला,
आस
पास का वातावरण कितना हुआ मैला। इसी तर्ज पर भोजों का हुआ था चलन,
अधिक जूठन से ही बिरादरी वालों को होती थी जलन। लोग जानबूझ कर भोज देने के
तलाशते थे बहाने,
हमें मिल जाते थे जूठन के नए नए ठिकाने। आपका शादी सगाई से मन नहीं भरा तो
मृत्यु भोज का प्रचलन करवाया,
पर
इतने पर भी आपका दिल कहाँ भर पाया। छोटी छोटी बातों पर आप लोग दावतें
खिलाने लगे और बड़ी बड़ी पंगतें बिठाने लगे। एक वक्त था कि भोज की जूठन ही वह
तराजू थी जिस पर आप लोगों की औकात तौली जाती थी,
वह
तराजू तब भी हमारी ही जाति उठाती थी। आज भी उठाती ह तो उसी परम्परा को आगे
बढ़ाती है।"
जूठन का
अपना अर्थतंत्र है,
जूठन बाजारवाद से कहाँ स्वतंत्र है। जूठन हमें महँगाई की मार से बचाती है,
रसोई के झंझटों के बदले जूठन की परम्परा हमें इसी लिए सुहाती है। आप
प्रदर्शन और धरने करके महँगाई भत्ता पाते हैं,
उससे अपने रहन सहन और भोजन का स्तर बढ़ाते हैं। हमारा महँगाई भत्ता स्वयं ही
बढ़ जाता है,
जब
महँगे पूरी साग की जूठन का भरा पत्तल हमारे सामने आता है। इसलिए हमें जूठन
खाने से कहाँ कोई परहेज है,
यह
तो हमें निरन्तर मिलने वाला दहेज है। दहेज से आपके वर्ग को भी कहाँ कोई
परहेज है। आप तो दहेज के लिए जूठी बहू तक घर ले आते हैं और दहेज न मिले तो
रसोई घर में उसे जलाते हैं। आपके परिवारों की जूठन गाहे बगाहे जिन्दा ही
हमें कूडों के ढेर पर मिल जाती है,जब
क्वारी माँ से पूरे समाज की अस्मत हिल जाती है। ऐसी जूठन को भी हमने बार
बार अपनी छाती से लगाया है,
झूठी शान के लिए जिसे आपने ठुकराया उसे हमने बार बार अपनाया है।"
हमारी
जाति का क्या आज तो पूरा देश ही जूठन पर पल रहा है,
रहन-सहन,
खान-पान,
रीति-रिवाज,
बोल-चाल और भाषा का सारा व्यवहार जूठन पर ही तो चल रहा है। अमरीकी
पी.एल.४८० के सड़े गेहूँ भारत में आते रहे,
रूसी जंग लगे हथियार जूठन के रूप में हमें थमाते रहे। आज भी आप अंग्रेजों
की जूठी शिक्षा के दास हैं,
जरा सी शिक्षा में परिवर्तन की हवा से मैकाले पुत्र कितने उदास हैं। आज भी
कैंटकी का बासी चिकन भारत में आता है और मैकडोनल्ड्स का फास्ट फूड आपके
बच्चों को बहुत भाता है। आपने देसी घी के बने पकवानों को छोड़ दिया है,
पशुओं की चर्बी से नाता जोड़ लिया है।"
इधर कुछ
होटलों ने हमारे वर्ग की जरूरतों पर दिया है ध्यान,
जैसे पहले प्याऊ बनाया करते थे धनवान। जानते थे कि लोगों को बाहर पानी नहीं
मिला तो घरों में घुस आयेंगे,
और
कुएँ तो क्या बर्तनों तक को भ्रष्ट कर जायेगें। इसीलिए सराय और प्याऊ बनाना
उन्हें बाहर से भगाने का उपचार था,
देखने में बहुत धार्मिक और सामाजिक व्यवहार था। होटल वालों ने देखा कि रोज
उनके पंचसितारा जूठन पर मक्खियों की तरह से जूठन खाने वाले लोग भिनभिनाते
हैं,
और
ग्राहकों को कुत्तों की तरह से लड़ कर दिखाते हैं। इस स्थिति से बचने के लिए
अब वे सारे जूठन का भंडार बना रहे हैं,
और
हर तरह के जूठन को पकवान मान कर अलग अलग बर्तनों में सजा रहे हैं। अब हम
कूड़ा बीनने वालों को भी पंच सितारा भोजन का स्वाद मिल जाता है,
तो
आपके वर्ग के परिश्रम करने वालों का यह देख कर कलेजा हिल जाता है। जहाँ दिन
भर जी तोड़ परिश्रम करने पर भी उन्हें नहीं मिलती एक सूखी रोटी,
वहीं जूठन खाने वालों को मिल जाती है चिकन बिरयानी और गोश्त की बोटी।"
अपनी इस
भूमिका के लिए हमने आपके समाज को समझा दिया है कि चील और गिद्ध ही हमारे
आदर्श हैं,
वे
वातावरण को साफ करने वाले हैं तो हम भी समाज में सफाई कर्मचारियों के सदृश
हैं। जैसे वे सड़े गले शव खा कर प्राकृतिक पर्यावरण को बचाते हैं,
वैसे ही हम जूठन खा कर आपके कूड़े के ढेर पचाते हैं। कल्पना करें कि हम जूठन
खा कर यदि प्रति दिन हजारों टन जूठा भोजन अपने पेट की भट्टी में भस्म न
करें तो चारों ओर कितनी गन्दगी फैल जायेगी,
और
वह कितनी भंयकर बीमारियाँ साथ ले कर आयेगी। पहले ही कूड़ा उठाने के लिए
निगमों के पास गाड़ियों का अभाव है,
इसीलिए उनकी साख बचाने के लिए,
मैला सिर पर ढोते समय हम विनम्रता से कह देते हैं कि यह हमारा स्वभाव है।
यदि आपकी जूठन यहाँ वहाँ फैलेगी तो बस्ती को सड़ांध से भर देगी,
आपकी पवित्र आत्मा को आपके सामने नंगा करके धर देगी। पर्यटन स्थलों ही नहीं
मन्दिरों और तीर्थ स्थानों तक की गंदगी तो आपसे संभलती नहीं है,
जूठन की क्या संभालेगें। गंगा तक मैली होती जा रही है,
सागर तट कैसे साफ सुथरे बना लेगें।
इसमें भी
आपको सन्देह नहीं होना चाहिए कि युगों युगों से यह दुनिया जूठन के आधार पर
ही बिकी है,
जूठन के वर्त्तमान पर जूठन के भविष्य की नींव टिकी है। क्या जानते नहीं कि
जूठी गुठली ही नया पेड़ उगाती है,
नयाँ अंकुरित पेड़ उसी गुठली की ही थाती है। प्रकृति का यह शाश्वत नियम है
कि एक की जूठन दूसरा खाता है,जो
हमें नहीं पचता कोई और पचाता है। आपका जूठा हम खाते हैं,
हमारे जूठन को पशु और जानवर पचाते हैं। जानवरों के जूठे का भोज पक्षी उड़ाते
हैं,उनके
अवशेष कीड़े मकौड़े चट कर जाते हैं। राजा की जूठन मंत्री खाता आया है,
मंत्री की जूठन को सदैव सतंरी ने पाया है। जूठन का प्रवाह सदैव ऊपर से नीचे
की ओर निरन्तर और अविरल बहता है,
इसीलिए नीचे वाला ऊपर वाले की जूठन को सहर्ष सहता है। दिवाली और होली के
त्यौहार इसी जूठन के बल पर मनाये जाते हैं,
महलों में आये मिठाई के डिब्बे एक एक झोंपड़ी तक पहुँचाये जाते हैं। होली के
केसर,
टेसू और गुलाल की जूठन जब हमारे तक आती है,वह
कीचड़ के नाम से जानी जाती है। हम अपने कपड़े फाड़ कर तार तार कर देते हैं,
तभी तो आपके रंगीन कपड़ों की जूठन लेते हैं। व्रत उपवास और मेले इसीलिए बने
हैं ताकि अधिक से अधिक परस्पर जूठन का व्यवहार चले,
अर्थव्यवस्था के रथ का पहिया बिना रूके बार बार चले।
जूठन का अन्तर्राष्ट्रीय महत्व है - जो देश अपना पैदा किया हुआ स्वयं पचा नहीं पाते, वही तो जूठन का अर्थतंत्र हैं चलाते। सोचो यदि आप जितना पकायें उतना ही खायें तो हम स्वपच कहाँ जायें। ऐसे ही विकसित देश जरूरत से ज्यादा पकाते हैं और जूठन विकासशील देशों को थमाते हैं। जूठन कोई खाद्य पदार्थों तक ही सीमित नहीं उसके क्षेत्र की सीमा असीम है, तकनीकी जूठन तो वैसे भी सीमा विहीन है। जूठन की महिमा अपरम्पार है, ऐसे जूठन भरे तंत्र को मेरा बार बार नमस्कार है। |
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