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ISSN 2292-9754

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10.06.2017


एक पैर पर खड़ा स्वाभिमान

अपने गृहस्थ जीवन की शुरूआत भी ठीक तरह से नहीं कर पाया था अरुण कि अचानक एक बिजली सी गिर पड़ी थी उस पर। एकाएक उसके दायें पैर की एड़ी में दर्द सा रहने लगा। कभी-कभी दर्द की ऐसी तेज़ लहर उठती कि उसे पूरी पृथ्वी घूमती हुई दिखाई देने लगती। एक क्षण के लिए वह दर्द से बेहाल हो जाता। अगले ही पल दर्द थम जाता तो लगता जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। सब कुछ सामान्य। सब कुछ यथावत। जवानी के जोश में उसने इस दर्द की विशेष परवाह भी नहीं की थी। धीरे-धीरे दर्द की लहरों का अन्तराल घटने लगा। साथ ही जानलेवा दर्द की अवधि भी अधिक होने लगी। रात में सोते-सोते जब वह अचानक दर्द से बेहाल हो कर उठ बैठता तो उसकी पत्नी सरोज यह तय नहीं कर पाती कि वह किस प्रकार उसके दर्द को कम करने का कोई उपाय करे। कसमसा कर रह जाती थी वह। न तो कुछ कहते बनता था न ही करते।

जब वह प्रातः सो कर उठता तो पैर को धरती पर रखना बहुत कष्टदायक लगने लगा था उसे। फिर भी उठना तो होता ही था। जैसे तैसे दो चार क़दम उठा कर बाथरूम की ओर जाता। ये दो चार क़दम उसे असहनीय मरणांतक पीड़ा पहुँचाते थे। बाद में सब ठीक-ठाक हो जाता। दिन भर वह घर और कार्यालय में पूरी तरह चुस्ती से कार्य करता रहता था। वह यह समझने में असमर्थ था कि आख़िर यह कैसी बीमारी है। इस विषय में वह जिस किसी से भी बात करता वह तुरन्त कोई न कोई इलाज बता देता। कोई किसी ऐसी दवा का नाम बताता जिसका प्रयोग करके उसकी चाची का कोई मामा ठीक हुआ होता था। कोई किसी दूसरी जड़ी बूटी का नाम बताता तो कोई किसी गुनी अथवा ओझे का। गोया कि जितने मुँह उतने ही इलाज।

अरुण एक छोटे से व्यापारिक संस्थान में क्लर्क था। दसवीं पास करने के बाद बहुत कठिनाई से वह इस नौकरी का जुगाड़ कर पाया था। सरकारी नौकरी पाने के लिए उसके पास न तो कोई सिफ़ारिश थी और न ही उसके माता-पिता के पास इतना धन था कि वह कुछ सुविधाशुल्क दे कर उसे किसी अच्छी जगह व्यवस्थित कर देते। अरुण के पिता स्वयं सारा जीवन मामूली क्लर्की के बल पर गृहस्थी की गाड़ी खींचते-खींचते समय से पहले ही बूढ़े हो कर खाट पर पड़ गए थे। गृहस्थी का सारा बोझ उसी के कंधों पर ही था। माता-पिता की इच्छा का ध्यान करते हुए उसने न चाहते हुए भी विवाह के लिए अपनी सहमति दे दी थी। उसे लगा शायद इससे ही माँ को कुछ आराम मिल जाए। खटती ही रही थी सारा जीवन। फिर यदि लड़की नौकरी करने वाली हुई तो दोनों मिल कर आसानी से ढो सकेंगे गृहस्थी के इस बोझ को। निर्धन होते हुए भी वह दहेज़ के पूरी तरह से विरुद्ध था। वह इसे समृद्ध लोगों की विलासता और दिखावे का एक भौंड़ा रूप ही मानता था। इसके बावजूद उसके मन के किसी कोने में यह विचार कुंडली मारे साँप की तरह पड़ा था कि लाख ना-नुकर के बाद जो दो चार बर्तन और कपड़े इत्यादि मिलेंगे उनसे कुछ तो राहत मिलेगी ही। जब भी दहेज़ का साँप फन फैलाता तो वह अपनी एक इच्छा पूर्ति का सपना देखने लगता।

उसकी बहुत इच्छा थी कि कभी उसके पास एक अपनी साइकिल हो ताकि प्रतिदिन पाँच किलोमीटर दूर कार्यालय पैदल जाना और पाँच किलोमीटर वापिस आने के कष्ट से मुक्ति मिल जाए। यहाँ भी भाग्य ने उसका साथ नहीं दिया। बहुत प्रयत्न करने के बावजूद उसके माता-पिता कोई ऐसा घर नहीं खोज पाये जहाँ से उसे कुछ दहेज़ मिलने की आशा होती। वास्तव में उस जैसे साधारण रंग-रूप और छोटी सी नौकरी वाले युवक की विवाह के बाज़ार में क़ीमत ही कितनी हो सकती थी। वह जानता था कि दहेज़ भी उसे ही मिलता है जिसका घर पहले से ही भरा पूरा हो। फिर उसके तो पिता के पास भी कुछ नहीं था।

जैसे-तैसे अपनी ही बिरादरी में उसका सरोज के साथ रिश्ता तय हो गया। सरोज भी उसी की तरह से साधारण रंग रूप वाली लड़की थी। इस दृष्टि से दोनों की जोड़ी को एक आदर्श जोड़ी कहा जा सकता था। सरोज के माता पिता ने जहाँ-तहाँ से बटोर कर किसी तरह से छोटी सी बरात का स्वागत करके अपनी इज़्ज़त की रक्षा कर ली थी। सरोज को ससुराल और मायके में कोई अन्तर ही दिखाई नहीं दिया। निर्धन परिवार में पली लड़की के लिए निर्धनता से समझौता करने में किसी प्रकार की कठिनाई आने का प्रश्न ही नहीं था। अपने नये जीवन से अधिक वह इस बात पर प्रसन्न थी कि अब कम से कम उसके माता-पिता दिन-रात उसके विवाह की चिन्ता में घुलते तो नहीं रहेंगे। दहेज़ देने की क्षमता न होने के कारण उसका विवाह किसी खाते-पीते परिवार में होगा इसकी तो उसने कल्पना की ही नहीं थी।

विवाह के तुरन्त बाद उसने अपने ढंग से गृहस्थी को सँजोना प्रारम्भ कर दिया था। सास-ससुर की सेवा का धर्म निभाते हुए वह सीमित साधनों में सन्तुष्ट रहने लगी थी। उसके पति की नौकरी में उन्नति के कोई विशेष अवसर थे भी नहीं। अरुण भी घर से कार्यालय और दफ़्तर से घर के चक्कर कोल्हू के बैल की तरह से लगाने को अपनी नियति मान चुका था। वह भी इस बात से प्रसन्न था कि सरोज ने इतनी जल्दी अपने आपको उसके घर वालों के रंग-रूप में ढाल लिया था। घर के सदस्यों के मध्य रिश्तों को लेकर कहीं कोई तनाव नहीं था। यदि घर के सदस्यों में परस्पर सद्भाव विकसित हो जाए तो सीमित साधनों में भी गृहस्थी की गाड़ी को भली-भाँति चलाया जा सकता है, यह बात अब उसके सामने शीशे की तरह से साफ़ थी।

ऐसे समय में जब सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। उसकी गृहस्थी की गाड़ी अपनी रफ़्तार से पटरी पर आ रही थी इस बीमारी ने उसके पूरे अस्तित्व को झकझोर कर रख दिया था। दर्द के निवारण के लिए पहले घरेलू उपचारों का दौर चला। गर्म पानी में नमक मिला कर पैर की सिकाई करने से उसे आराम तो मिलता था परन्तु यह कोई स्थायी इलाज तो था नहीं। किसी ने पैर को बारी-बारी से ठंडे और गर्म पानी में डालने का सुझाव दिया। परिणाम ठीक ही निकला। कुछ दिन बाद इसका प्रभाव भी कम होने लगा। किसी ने किसी न किसी तेल की मालिश की बात की तो किसी ने महायोगराज गुग्गल खाने की सलाह दी। किसी ने टखने पर दिया बँधवा कर टाँग का सारा पानी बाहर निकलवा डाला तो किसी ने जोंक से गन्दा खून बाहर निकलवाने का सुझाव दिया। अरुण किसी की बात को नकारता नहीं था। आख़िर सभी तो उसके हितैषी थे। सोचता न जाने कब कोई दवा अथवा दुआ काम कर जाये। हाँ, इस बात के लिए वह पूरी तरह से सचेत रहता कि कोई महँगी दवा खाने का सुझाव तो नहीं दे रहा।

जब इन सब बातों का कोई ठोस परिणाम नहीं निकला तो मोहल्ले की डिस्पेंसरी में दिखाना शुरू किया। डाक्टर ने दर्द निवारक गोलियाँ थमा दीं। जब कभी दर्द बढ़ता तो वह एक गोली निगल जाता- रात्रि ठीक से कट जाती। थोड़े ही दिनों बाद दर्द निवारक गोलियों की संख्या बढ़ने लगी। शनैः शनैः वे प्रभावहीन सिद्ध होने लगीं। सरकारी हस्पताल के नाम से ही उसे कुछ-कुछ होने लगता था। हस्पताल में पैसा तो अधिक नहीं लगता था परन्तु उसे कार्यालय से अवकाश तो लेना ही पड़ता था। उसके साथ साथ सरोज को भी हस्पताल के चक्कर लगाने पड़ते थे। बिना सिफ़ारिश के वहाँ पर भी कोई काम नहीं होता था, इस बात की अलग से कोफ़्त होती थी। हर बार जब वे हस्पताल जाते तो डाक्टर कोई न कोई नया परीक्षण करवाने का परामर्श दे डालता। हस्पताल की मशीनें तो प्रायः निष्क्रिय ही होतीं इसलिए टेस्ट बाहर से ही करवाने पड़ते। इस मद में एक अच्छी ख़ासी रक़म व्यय होने लगी। कार्यालय से अधिक छुट्टियाँ होने लगीं तो वहाँ भी वेतन कटने की नौबत आ गई। लाख प्रयासों के बाद भी घर का सारा बजट गड़बड़ाने लगा। उसके स्वभाव में चिड़चिड़ापन बढ़ने लगा। सरोज का मृदु स्वभाव भी उसे संयत रखने में असमर्थ रहने लगा। माता पिता उसकी बीमारी से चिन्तित रहने लगे परन्तु वे कर ही क्या सकते थे। पिता का सारा जीवन किसी तरह से दो जून की रोटी का प्रबंध करने में ही गुज़र गया था। इसलिए उनके पास कोई जमा पूँजी तो थी नहीं। वे अपने एक मात्र पुत्र को दर्द से तड़पते हुए देखने के लिए अभिशप्त हो चुके थे जैसे।

इन्हीं दिनों उसे ज्ञात हुआ कि एक प्रसिद्ध जूता निर्मात्ता कम्पनी ने एक ऐसा जूता बनाया है जिसे पहनने पर ऐसा दर्द धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। यह जूता चीन में प्रचलित एक्यूप्रेशर पद्धति के आधार पर तैयार किया गया था। इसके पहनने से पैर के कुछ ऐसे बिन्दुओं पर निरन्तर दबाव पड़ता था जिससे दर्द का कारण बनने वाली धमनियाँ सुचारु रूप से कार्य करने लगतीं थीं और रोगी को पूरी तरह दर्द से छुटकारा मिल जाता था।

उसे यह जानकर आश्चर्य हुआ था कि ऐसे जूते का मूल्य ढाई हज़ार रुपये रखा गया था। पूरी तरह से निराश हो गया था वह इतनी भारी राशि सुन कर। उसे कम्पनी पर क्रोध भी आया था। इतनी बड़ी कम्पनी कम से कम ऐसे जूते का मूल्य तो कम रख ही सकती थी। क्या आवश्यक है कि हर उत्पाद पर भारी लाभ कमाया ही जाये। परन्तु यह उसकी अपनी सोच थी, कम्पनी के मालिकों की नहीं। वे तो पूरी तरह से बाज़ार से संचालित थे। और बाज़ार माँग और आपूर्ति से चलता है भावनाओं से नहीं।

एक दिन वह बहुत साहस करके पहुँच गया था जूता कम्पनी के प्रधान कार्यालय में। अनेकानेक प्रयास करने के बाद वह किसी तरह कम्पनी के स्वामी के कक्ष में पहुँच पाया था। वहाँ की भव्यता देख कर दंग रह गया था अरुण। साथ ही उसका साहस भी जबाव दे गया था। उसे लगा कि कार्यालय में रखे फ़र्नीचर का मूल्य उससे कहीं अधिक था जितना पैसा उसने अब तक अपने जीवन में कमाया था। उसे कुछ आशा बँधी। सोचा इतने धनाढ्य व्यक्ति के लिए दो ढाई हज़ार रुपये क्या अर्थ रखते होगें। फिर यह कम्पनी तो स्वयं जूता बनाती है। एक आध जूता किसी को यूँ ही दे देने में क्या अन्तर पड़ेगा। नदी के जल से ज्यों चिड़िया की चोंच भरने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कुछ ऐसा ही।

बहुत देर तक वह चुपचाप वहाँ अपराधी की तरह से खड़ा रहा। मालिक ने नज़र उठा कर उसे देखा तक नहीं। बहुत असमंजस की स्थिति में था अरुण। कितनी कठिनाई के बाद तो यहाँ तक पहुँचा था, फिर कभी आ भी पायेगा अथवा नहीं इसका अनुमान तक करने में वह स्वयं को असमर्थ पा रहा था। आख़िर इस तरह से कब तक खड़ा रहे।

तभी स्वामी ने फाइल बंद की और घंटी बजा कर चपरासी को भीतर बुलाया। उसे ब्रीफ़ केस उठाने का संकेत करते हुए उस पर एक गहरी दृष्टि डाली। भीतर तक काँप गया था अरुण। तभी उसके कानों में एक भारी आवाज़ टकरायी। “कहो कैसे आये हो? किस विभाग में काम करते हो? मेरे पास क्यों आये हो?”

अरुण के गले में कुछ अटक सा गया था जैसे। थूक निगलते हुए बोला, “सर मैं एक छोटी सी फ़र्म में काम करता हूँ। मेरी टाँग में बहुत दर्द रहता है। आपकी कम्पनी द्वारा बनाये गए जूते को पहनने से वह ठीक हो सकता है।”

“तो इसमें मैं क्या कर सकता हूँ। अच्छी बात है हमारे बनाये जूते से यदि तुम्हारा दर्द ठीक हो सकता है तो ख़रीद लो। इसी के लिए तो बनाया ही गया है उसे,” स्वामी ने कहा।

“परन्तु वह बहुत महँगे हैं। मेरे पास उन्हें ख़रीदने के लिए पैसे नहीं हैं,” बहुत कठिनाई से वह इतने शब्द बोल पाया।

“ओह तो भीख माँगने आये हो। तुम्हें अन्दर किस ने आने दिया। जूते भीख में नहीं मिलते। न जाने क्या हो गया है लोगों के स्वाभिमान को। शक़्ल सूरत से तो भिखारी नहीं लगते।” इतना कह कर वह बाहर निकल गये। अरुण ठगा सा देखता ही रह गया। क्या सोच कर आया था और क्या हो गया। उसे लगा जैसे वह अभी गश खा कर गिर पडे़गा।

तभी वह चपरासी भीतर आ गया। उसने अरुण को बाहर चलने का संकेत किया। उसकी बिगड़ती हालत को देख कर उसने उसे अपनी बाँहों में थाम लिया और सहारा दे कर बाहर ले आया। उसे अपनी बैंच पर बिठाया। पानी का गिलास उसके हाथ में थमाया। दो घूँट पानी पी कर अरुण कुछ चैतन्य हुआ।

चपरासी बोला, ”भैया पत्थर में भी क्या कभी जोंक लगती है। यदि मुझे पहले ही बता दिया होता कि तुम इस काम के लिए अन्दर जाना चाहते हो तो मैं तुम्हें भीतर जाने की सलाह ही नहीं देता। अब तुमने मेरी स्थिति भी ख़राब कर दी है। न जाने कल क्या क्या सुनना पड़े। ख़ैर मन छोटा न करो भगवान सब ठीक कर देगें,” उसने सांत्वना देते हुए कहा।

घिसटते हुए पाँवों से लौट पड़ा था अरुण। पहले से ही उसे आत्मग्लानि हो रही थी। अब तो उसे अपने आप पर क्रोध भी आ रहा था। आख़िर क्या सोच कर उसने इतनी बड़ी मूर्खता कर डाली। रह-रह कर उसके मन में आत्महत्या करने के विचार आने लगे। साथ ही उसके सामने सरोज और अपने माता-पिता तीनों के चेहरे घूमने लगे। उसके सिवा उनका था ही कौन। क्या होगा उनका उसके बिना? उसे लगा सब कुछ गडमड़ हो रहा है।

ख़ैराती हस्पतालों के चक्कर लगा लगा कर उसकी चप्पलें घिस गईं। जितना इलाज किया मर्ज़ बढ़ता ही गया। धीरे-धीरे स्थिति हाथ से निकलती गई और अन्त में डाक्टरों ने यह कह कर मुक्ति पा ली कि यदि इस दर्द से छुटकारा पाना है तो ताँग को काटना पड़ेगा। नहीं तो इन्फैक्शन बढ़ने से जान भी जा सकती है। उसे अपनी सारी दुनिया एक गहन अन्धकार में डूबती दिखाई दी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अपंग हो कर वह किस प्रकार से गृहस्थी की गाड़ी खींच पायेगा।

एक दिन सब को निर्णय लेने के लिए विवश होना ही पड़ा कि इस दिन प्रति दिन के जानलेवा दर्द से छुटकारा पा ही लिया जाये।

महीनों हस्पताल में रहने के बाद वह बिना टाँग के बैसाखी के सहारे घर लौटा। अब तक वह अपनी नौकरी से भी हाथ धो चुका था। घर में एक पैसा शेष नहीं बचा था। न जाने कैसे इधर-उधर से उधार माँग कर अब तक वह परिवार ज़िन्दा रहा था।

घर लौटने के बाद एक फिर उसने अपने एक पैर पर खड़े होने के लिए साहस बटोरा। घर के छोटे-मोटे सामान को बेच कर, एक पड़ोसी की सहायता से अरुण ने उसकी ही दुकान के सामने पटरी पर पुस्तकें, समाचार पत्र और पत्रिकाएँ बेचने का कार्य प्रारम्भ किया। इस काम में सबसे बड़ा लाभ यह था कि माल उधार मिल जाता था और बिक्री नगद होती थी। जिससे रात को चूल्हा जलने में कठिनाई नहीं होती थी। धीरे-धीरे घर का काम-काज ठीक से चलने लगा। परिवार ने भगवान का धन्यवाद किया। लगने लगा कि जैसे सारी समस्या की जड़ वह टाँग ही थी। उसके कटने से जैसे पूरा दलिद्दर ही कट गया। अरुण ने एक टाँग से जीना सीख लिया। उसके मृदु व्यवहार से बाज़ार में उसकी साख जमने लगी और गुज़ारे लायक़ काम चलने लगा। हर आने जाने वाला व्यक्ति उसके साहस की प्रशंसा करता। यदि कोई तरस खा कर थोड़ी बहुत सहायता देने की बात भी करता तो वह बहुत ही विनम्रता से उसे अस्वीकार कर देता।

अभी तक अरुण के मन में यह चाह बनी हुई थी कि यदि किसी प्रकार से एक साइकिल का प्रंबध हो जाये तो उसे काम-काज करने में सुविधा हो परन्तु अब उसे दो नहीं तीन पहियों वाली गाड़ी की आवश्यकता थी। निकट भविष्य में ऐसा कोई प्रबंध हो पायेगा इसकी भी उसे कोई आशा नहीं थी। वह इतने से ही सन्तुष्ट था कि अब घर का गुज़ारा चल रहा था और वह किसी की नौकरी भी नहीं करता था। उसका छोटा ही सही अपना व्यवसाय था।

एक दिन एक युवक उसकी दुकान के सामने पटरी पर फिसल कर गिर पड़ा। उसने बहुत ही तत्परता से उसकी उठने में सहायता की। शायद उसकी रीढ़ की हड्डी में चोट लगी थी। अरुण ने पास के हलवाई से गरम दूध मँगवाया और उसमें हल्दी डाल कर उसे पिलाया। काफ़ी देर तक वह उसकी सेवा करता रहा। थोड़ा ठीक अनुभव करने के बाद युवक अपने घर चला गया परन्तु बाद में अक्सर पत्रिकाएँ और पुस्तकें ख़रीदने के लिए उसके पास आने लगा। युवक का नाम नरेन्द्र था। युवक के सौम्य व्यवहार से अरुण बहुत प्रभावित हुआ और उसके साहस भरे संघर्षमय जीवन ने नरेन्द्र के मन में अरुण के प्रति एक आदर का भाव भर दिया। दोनों की यह जान पहचान मित्रता का रूप लेने लगी।

एक दिन नरेन्द्र सवेरे-सवेरे अरुण के पास आया और उसे अपने साथ चलने का आग्रह किया। उसके बहुत पूछने पर भी नरेन्द्र ने कुछ नहीं बताया। केवल इतना कहा कि आज मेरा जन्मदिन है और मेरे परिवार वालों ने जन्मदिन मनाने के लिए एक बहुत बड़े समारोह का आयोजन किया है। उसने कहा कि मैं चाहता हूँ कि आप उसमें सम्मिलित हों। अब अरुण के पास न कहने का कोई कारण नहीं था। उसने अपनी दुकान बंद की और नरेन्द्र के साथ कार में बैठ गया। वह अपने जीवन में पहली बार कार में बैठा था। उसे रोमांच हो आया।

कुछ ही देर में वे लोग एक बड़े पंडाल के सामने पहुँच गये। मंच पर राज्य के मुख्यमंत्री सहित नगर के कई ऐसे गणमान्य व्यक्ति विराजमान थे जिनकी तस्वीरें अरुण अक्सर समाचार पत्रों में देखा करता था। मंच के पास जूता कम्पनी के स्वामी भी खड़े थे जिनसे अरुण की पहले मुलाक़ात हो चुकी थी। उन्हें देख कर अरुण असहज हो उठा। उसने नरेन्द्र को कहा कि वह वहाँ से तुरन्त वापिस जाना चाहता है। तब तक नरेन्द्र मंच पर पहुँच गया। वह मुख्यमंत्री को साथ ले कर अरुण के पास आया। नरेन्द्र ने पूरे सम्मान के साथ अरुण का परिचय नरेन्द्र से करवाया। उसके संघर्ष और साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की। तभी जूता कम्पनी के स्वामी एक छोटी कार के साथ आगे आये। उसे बताया गया कि यह कार विशेष रूप से विकलागों के लिए बनवाई गई है जिनकी दाईं टाँग नहीं है। इस गाड़ी में एक्सीलेटर और ब्रेक का प्रावधान इस प्रकार से किया गया था कि उन्हें हाथों के द्वारा संचालित किया जा सके।

तभी नरेन्द्र ने अरुण को सम्बोधित करते हुए कहा, ”यह कार मैंने आप के लिए विशेष रूप से बनवाई है। आप कृपया मेरी यह भेंट स्वीकार करें।”

अरुण यह सुन कर भौचक्का रहा गया। तभी मुख्यमंत्री जी ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा कि तुम्हें सेठ महेन्द्र नाथ जी का आभारी होना चाहिए जिन्होंने इतनी महँगी कार आपकी विकलांगता को दूर करने के लिए बनवाई है। इसमें बैठने के बाद आपको यह आभास ही नहीं होगा कि आपकी एक टाँग नहीं है।

इस बीच अरुण अपना मन बना चुका था। उसने नम्रतापूर्वक वह कार लेने से इंकार करते हुए सेठ जी को सम्बोधित करते हुए कहा, ”अब मैंने एक पैर पर खड़ा होना सीख लिया है। मैं स्वाभिमानपूर्वक सुख से जीवनयापन कर रहा हूँ। मैं किसी का उपहार इसलिए स्वीकार नहीं कर सकता कि मैं विकलांग हूँ।“

अरुण यह कहता हुआ पीछे की ओर मुड़ गया,”काश उस दिन आपने मुझे एक जूता दे दिया होता तो आज इस कार की आवश्यकता ही नहीं होती।“ नरेन्द्र आश्चर्यचकित उसे जाते हुए देखता रहा। वह गर्व से सिर ऊँचा उठाये पंडाल से बाहर चला गया।


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