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02.19.2014


देवदूतों का मटका

रतन गढ के सेठ गिरधारी लाल का नाम एक दानवीर के रूप में दूर दूर तक प्रसिद्ध था। आज तक उनके दरवाजे से कोई खाली हाथ नहीं लौटा था। उनके पास जो भी व्यक्ति उचित माँग लेकर आता, सेठ जी उसे पूरा करने का भरसक प्रयास करते। धन के अभाव में तो वह किसी की इच्छा को अधूरी नहीं रहने देते थे। सेठ जी का हीरे का व्यापार विदेशों तक फैला हुआ था। सेठ गिरधारी लाल जितना दान-पुण्य करते उतना ही उनका खजाना भरता जाता। एक प्रकार से लक्ष्मी की उन पर असीम कृपा थी। सेठ जी के दो पुत्र थे । बड़े का नाम किरोड़ी मल और छोटे का नाम लाभ मल था। दोनों ही पिता के व्यापार में हाथ बटाया करते थे। किरोड़ी मल का विवाह हो चुका था। उसकी पत्नी रूपमती एक समृद्ध परिवार की कन्या थी। रूपमती के पिता ने किसानों का शोषण करके बहुत धन कमाया था। पैसे की कमी न होने के कारण रूपमती का विवाह उसके पिता ने बहुत धूम-धाम से किया था। रूपमती को भी बचपन से ही अपने पिता के धन का बहुत घंमड था।

लाभ मल भी विवाह के योग्य हो गया था। एक बार एक निर्धन ब्राह्मण सेठ गिरधारी लाल से मिलने आया। ब्राह्मण का नाम बुद्धि प्रिय था। वह बहुत विद्वान था परन्तु लक्ष्मी उसके यहाँ टिकती ही नहीं थी। वह किसी प्रकार से अपने परिवार का गुजारा भर चला पाता था। ब्राह्मण ने बताया कि धनाभाव के कारण मैं अपनी युवा कन्या का विवाह करने में असमर्थ हूँ। ब्राह्मण ने कहा, “मेरी पुत्री आभामती अत्यन्त रूपवती और सर्वगुण सम्पन्न है। गृह कार्य में भी बहुत दक्ष है परन्तु मेरी गरीबी का दंड उसे भोगना पड़ रहा है। कोई सुयोग्य वर उससे विवाह करने को तैयार नहीं होता।

सेठ जी ने कहा, “ठीक है मैं उसके विवाह के लिए आवश्यक आर्थिक सहायता करूँगा परन्तु वर का चयन तो आप को ही करना है।”

इन दिनों लाभ मल व्यापार के सिलसिले में रतन गढ़ से बाहर गया हुआ था। जब वह घर लौट रहा तब दैव योग से लाभ मल ने ब्राह्मण कन्या को एक सराय के बाहर बैठा हुआ देखा। उसका सौन्दर्य लाभ मल को आकर्षित कर गया। उसने सराय के स्वामी से लड़की के बारे में पूछताछ की तो ज्ञात हुआ कि वह एक गरीब ब्राह्मण कन्या है और इसके पिताजी इसके विवाह को लेकर बहुत चिन्तित हैं। ये लोग इसी संबंध में रतन गढ़ आये हुए हैं।

जब बुद्धि प्रिय सेठ जी से मिल कर वापिस लौटे तो लाभ मल उनकी प्रतीक्षा करते हुए मिला। लाभ मल ने बुद्धि प्रिय से अपने लिए आभामती का हाथ माँगा। उसने बताया कि उसका बहुत समृद्ध है इसलिए विवाह बहुत धूमधाम से न भी हो तो कम से कम ठीक ठाक तो हो ही। बुद्धि प्रिय के तो जैसे भाग्य ही खुल गए। आज ही सेठजी से आश्वासन पाने के बाद वह इस ओर से निश्चिंत हुआ था। उसने तुरन्त ही इस रिश्ते के लिए सहमति दे दी।

घर पहुँच कर लाभ मल ने इस विषय में अपने पिता से बात की। सेठ जी ने कहा यदि तुम्हें लड़की और परिवार पसन्द हे तो मुझे कोई अपत्ति नहीं क्यों कि धन का तो अपने यहाँ कोई अभाव है नहीं। वैसे भी मैं विवाह के मामले में लेन देन के सख्त खिलाफ हूँ। यदि उन लोगों के पास धन की कमी है तो भी इस घर से रिश्ता जुड़ने के बाद वह अपने आप दूर हो जायेगी। अगले दिन लाभ मल ने बुद्धि प्रिय से मिल कर सारा कुछ तय कर लिया। रात में ही बुद्धि प्रिय ने अपने बेटी आभामती से भी उसकी स्वीकृति ले ली थी। निश्चित समय पर दोनों का विवाह सम्पन्न हो गया।

किरोड़ी मल और उसकी पत्नी रूपमती को यह रिश्ता बिल्कुल ही पसन्द नहीं आया। सेठ गिरधारी लाल भी सारा मामला सुन कर पहले तो सोच में पड़ गए थे परन्तु ज्यों ही उन्हें आभामती के सर्वगुण सम्पन्न होने का पता लगा वह सहर्ष इसके लिए तैयार हो गए। किरोड़ी मल और उसकी पत्नी ने आभामती के प्रति मन में एक गाँठ बाँध ली।

अपने ससुर और पत्नी के परामर्श पर काम करते हुए धीरे धीरे किरोड़ी मल ने सारा व्यपार अपनी मुट्ठी में करना प्रारम्भ कर दिया। वैसे भी लाभ मल के पास रतन गढ़ के बाहर के व्यापारियों के साथ ही संबंध रखने का दायित्व था। नई-नई शादी के कारण उसका कुछ समय के लिए इधर से भी ध्यान हट गया था। बेटों को व्यापार में रूचि लेते देख कर सेठ गिरधारी लाल निश्चिंत हो कर धर्मकर्म के कामों में व्यस्त हो गए थे।

जबसे लाभ मल हनीमून से वापस लौटा था तब से उसकी भाभी का लाड़ प्यार देखते ही बनता था। आभामती ने इस ओर उसका ध्यान आकृष्ट करते हुए एक-दो बार कहा भी कि मुझे कहीं दाल में काला दिखाई देता है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि जब कोई आवश्यकता से अधिक प्यार दिखाने लगे तो सावधान हो जाना चाहिए। लाभ मल ने पत्नी को समझाते हुए कहा, “ऐसी कोई बात नहीं है। आखिर वह मेरे बड़े भाई भाभी हैं। मेरे सिवा उनके पास लाड़ करने को और है ही कौन। धीरे-धीरे किरोड़ी मल ने सारे व्यापार और रूपमती ने पूरी गृहस्थी पर अपना आधिपत्य जमा लिया। व्यापार इतना फैला हुआ था कि घर में और दान पुण्य में किसी प्रकार की कमी होती ही नहीं थी।

अचानक एक दुर्घटना में सेठ गिरधारी लाल का स्वर्गवास हो गया। कुछ समय तक तो सब ठीक ठाक चलता रहा, बाद में किरोड़ी मल और रूपमती ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया। एक दिन दोनों को व्यापार और घर से बाहर कर दिया गया। अब तक लाभ मल के घ में एक लड़की और एक लड़के ने जन्म ले लिया था। जैसे तैसे लाभ मल ने अपने परिवार को लेकर पास के कस्बे नवल गढ़ में जा कर भाग्य आजमाने का प्रयास किया परन्तु पूँजी के अभाव में जो कुछ हाथ में था वह भी जाता रहा। लाभ मल को व्यापार का अनुभव भी नहीं था और उसके व्यापारियों के साथ गहरे संबंध भी नहीं थे। अब लाभ मल के परिवार के भूखे मरने की नौबत आ गई। अनेक बार प्रयास करने पर भी किरोड़ी मल ने न तो छोटे भाई को कोई सहारा दिया और न ही उसकी किसी प्रकार से सहायता की। जब-जब उसने अपने हिस्से की माँग की उसकी बेइज्जती ही की गई।

एक बार दीवाली का दिन था। हर जगह लोग खुशियाँ मना रहे थे। लोग नए-नए वस्त्र पहन कर पटाखे चला रहे थे। हर घर में रोशनी की जा रही थी और घर घर में मिठाइयाँ बाँटी जा रही थी। ऐसी हालत में लाभ मल के घर में पूरी तरह से अन्धेरा था। उसके बच्चे भूख से बिलख रहे थे। अन्त में दिल कड़ा करके एक बार फिर लाभ मल अपने भाई के घर रतन गढ़ पहुँचा। वहाँ पर बहुत एक बहुत बड़े भोज का आयोजन किया गया था। शहर भर के लोग सपरिवार उसमें निमंत्रित थे। चारों ओर रोशनी ही रोशनी थी। फुलझड़ियों और पटाखों का कोई अन्त ही नहीं था। लाभ मल को अपने दरवाजे पर भिखारियों की सी हालत में खड़े देख कर किरोड़ी मल ने उसे दुत्कारते हुए कहा, “यहाँ क्या लेने आए हो। तुम देखते नहीं कि मेरे यहाँ भोज चल रहा है। शहर के गणमान्य लोग यहाँ आये हुए हैं। ऐसे में बिना बुलाए इतनी गंदी हालत में तुम यहाँ क्यों आये हो।”

लाभ मल ने कहा मेरा परिवार भूखा है। यदि तुम मेरी कुछ सहायता कर दो तो मैं तुम्हारा अहसान कभी नहीं भूलूँगा।”

लाभ मल को जल्दी से जल्दी विदा करने के उदे्श्य से किरोड़ी मल ने एक मिठाई का डिब्बा उसकी ओर फेंकते हुए कहा। अब यहाँ से दफा हो जाओ और फिर कभी मुझे अपना मनहूस चेहरा मत दिखाना। आखिर मैं रोज रोज तुम्हारी सहायता कैसे करूँ।”
लाभ मल अनादर से दिए गए डिब्बे को बगल में दबा कर घर की ओर लौट चला। उसे लगा इससे एक दिन की भूख तो मिट ही जायेगी। आगे जो ईश्वर की इच्छा होगी। नवल गढ़ जाने के लिए उसे रास्ते में एक जंगल को पार करना था। उसे जंगल में एक बूढ़ा व्यक्ति मिला। उसने कहा, “आज दीवाली का दिन है यदि तुम मुझे एक टुकड़ा मिठाई का खिलाओगे तो तुम्हारा बहुत भला होगा।”

लाभ मल ने कहा, “यह तो मैं नहीं जानता परन्तु मेरे पिता जी कहते थे कि जो भी आपके पास हो उसे बाँट कर खाना चाहिए। आप शायद नहीं जानते कि मुझे मिठाई का यह डिब्बा कितनी कठिनाई से मिला है। मैं इसे अपने परिवार के साथ बाँट कर खाना चाहता हूँ। इसलिए जल्दी से जल्दी घर पहुँचना चाहता हूँ परन्तु मैं बहुत थक गया हूँ। मुझे बहुत ज़ोर से ठंड भी लग रही है। क्या आस-पास कोई ऐसा स्थान है जहाँ मैं कुछ देर बैठ कर आराम कर सकूँ।”

बूढ़े न कहा, “यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर एक सराय है। तुम उसमें चले जाओ। वहाँ तुम्हें कुछ खाने-पीने को भी मिल जायेगा और ठंड से भी तुम्हारी रक्षा होगी।”

लाभ मल ने डिब्बे से एक टुकड़ा मिठाई का निकाल कर बूढ़े को दिया और उसका धन्यवाद करते हुए सराय की ओर चल पड़ा। अभी वह मुड़ा ही था कि बूढ़े ने पीछे से आवाज़ दी और बोला, “वहाँ तुम्हें बहुत से लोग मिलेगें। इस मिठाई के बदले वह तुम को जितना चाहो धन दौलत देने को तैयार हो जायेगे परन्तु तुम उनकी एक बात भी नहीं सुनना। कहना यदि यह मिठाई चाहिए तो सामने की दीवार के साथ रखा जो खाली मटका है मुझे वह दे दो। वह मटका उनके किसी काम का नहीं है। ज्यों ही वह मटका दें तुम भाग कर मेरे पास चले आना। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि फिर तुम्हें कभी किसी बात की कमी नहीं रहेगी।”

बूढ़े की बात मान कर लाभ मल उस सराय में प्रवेश कर गया। भीतर ठंड बिल्कुल नहीं थी। वहाँ बहुत से स्त्री पुरुष आपस में हास परिहास कर रहे थे। लाभ मल को भीतर आते देख कर वे बोले, “तुम कौन हो और किस की आज्ञा से भीतर चले आये हो।”

लाभ मल ने उत्तर दिया, “मैं बहुत थक गया हूँ। मुझे ठंड भी बहुत लग रही है इसलिए मैं कुछ देर यहाँ आराम करना चाहता हूँ।”

तभी उनके मुखिया ने कहा, “अरे वाह तुम्हारे पास तो मिठाई है। तुम हमें यह मिठाई दे दो फिर हम तुम्हें यहाँ आराम करने देगें। तुम्हें खाने के लिए भोजन और पीने के लिए गरम कहवा भी मिलेगा।”

लाभ मल ने कहा, “यह मिठाई मैं अपने परिवार के लिए ले कर घर जा रहा हूँ। आज दीवाली है। हम सब मिल कर इस मिठाई को खायेंगे इसलिए यह मैं आप लोगों को बिल्कुल नहीं दे सकता।”

उन लोगों ने लाभ मल को बहुत लालच दिया। ढेर सारा सोना चाँदी देने को कहा परन्तु लाभ मल नहीं माना। तब सब लोग मिल कर उससे मिठाई के लिए अनुरोध करने लगे।

लाभ मल ने दीवार के साथ रखे मटके की ओर संकेत करते हुए कहा, “ठीक है आप लोग मुझे यह मटका दे दें तो मैं मिठाई दे दूँगा।”

उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि तुमने सोना चाँदी लेने से इंकार कर दिया अब इस खाली मटके लिए तुम मिठाई हमें देना चाहते हो। आखिर क्यों?

लाभ मल ने कहा, “आप मटका देते हैं तो दें नहीं तो मैं जा रहा हूँ। मुझे जल्दी से जल्दी घर भी पहुँचना है। बच्चे मेरी प्रतीक्षा कर रहे होगें।”

उन्होंने आपस में विचार विमर्श किया। उन्होंने सोचा कि मटका तो हमारे किसी काम का नहीं है इसलिए इसे देने में कोई हर्ज नहीं।

लाभ मल मिठाई के बदले मटका लेकर तुरन्त बाहर आ गया और दौड़ कर उस बूढ़े पास पहुँचा। अब उसके शरीर में थकान का नामों-िशान तक नहीं था। बूढ़े ने उसे अपनी ओर आते देख कर कहा, “अब चिन्ता की कोई बात नहीं है। मैं जैसा कहूँ वैसा करते रहो।”

बूढ़े ने बताया कि यह सराय देवदूतों के लिए है। अन्दर जितने लोग थे वे देवदूत और परियाँ थे। ये लोग जब एक लोक से दूसरे लोक की लम्बी लम्बी यात्राएँ करते हैं तो यहाँ विश्राम के लिए रूकते हैं। मैं इस सराय का चौकीदार हूँ। यह कोई साधारण मटका नहीं है। यह एक अक्षय भंडार है। इससे श्रद्धापूर्वक और पूरे आदर से जो कुछ भी माँगोगे वह तुम्हें मिल जायेगा। जब तुम्हें अपने और अपने परिवार के लिए जो भी और जितना भी चाहिए हो इससे ले लेना। इसके बाद उसने लाभ मल के कान में एक मंत्र फूँका और कहा, “जब यह मंत्र पढ़ोगे तो मटका पूर्ववत स्थिति में आ जायेगा। पर एक बात अवश्य ही ध्यान रखना। ज्यादा लालच कभी न करना। उतना ही माँगना जितना वास्तव में चाहिए हो। गरीबों की हमेशा सहायता करना और मटके को कभी गंदे स्थान पर भूल कर भी न रखना।”

लाभ मल उस मंत्र और बूढ़े के निर्देशों को मन ही मन याद करता हुआ घर पहुँच गया। उसके हाथ में एक खाली मटका देख कर बच्चे रोने लगे और आभामती बहुत दुःखी हुई। फिर भी उसने आदर सहित उसे बिठाते हुए पूछा, “क्या थोड़ा सा सामान भी खाने को नहीं ला पाए। यदि भैया भाभी ने ही सहायता नहीं कि तो अब और कौन करेगा।”

लाभ मल ने कहा, “चिन्ता न करो। अब हमारे दिन बदल जायेगें। यह कोई साधारण मटका नहीं है बल्कि अक्षय भंडार है। उसने अभा मती को शीघ्रता से घर का एक कोना अच्छी तरह से साफ करने को कहा। आभामती जिस स्थान पर रोज पूजा करती थी वह स्थान तो साफ सुथरा ही था फिर भी उसने जल्दी-जल्दी वहाँ की सफाई कर दी। लाभ मल ने मटके को उस साफ सुथरे स्थान पर आदरपूर्वक रख दिया। चारों लोग श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़ कर मटके के पास बैठ गए। तब लाभ मल बोला, “कृपया हमारे लिए अच्छे अच्छे खाने के पकवानों का प्रबंध कर दें।”

तुरन्त ही मटके में से साफ सुथरे आसन, थालियाँ, गिलास और कटोरियाँ इत्यादि बाहर आने लगे। थालियों में तरह तरह के पकवान आ गए। स्वादिष्ट पकवानों की सुगन्ध से वह छोटा सा घर महकने लगा। भोजन करने के पश्चात उसने मटके से नए-नए वस्त्रों की माँग की। फिर घर के आलीशान हो जाने की माँग की। जैसा उसने चाहा तुरन्त वैसा ही होता गया।
अब लाभ मल के पास किसी बात की कमी नहीं रही। वह अपनी आवश्यकता के अनुरूप जो भी माँगता उसे मिल जाता। यदि कोई याचक दर पर आ जाता तो वह तुरन्त ही उसकी इच्छा पूरी कर देता था।

लाभ मल के इस वैभव को देख कर एक पड़ोसी ने कहा, “लगता है कहीं से अच्छा धन हाथ लगा है। अच्छी बात है। परन्तु इसके लिए आस पड़ोस के लोगों को दावत तो दी ही जानी चाहिए।”

लाभ मल को यह सुझाव पसन्द आया। उसने कहा, “क्यों नहीं कल ही दावत दे देते हैं। आप सब पड़ोसियों को मेरी ओर से निमंत्रण दे दें। मैं भी कुछ लोगों को बुला लूँगा। उसने अपने बड़े भाई और भाभी को नौकरों चाकरों सहित भोज पर आने का न्यौता दिया।

अपने नितान्त निर्धन भाई से दावत का निमंत्रण पा कर किरोड़ी मल को बहुत आश्चर्य हेआ। वह ईर्ष्या से जल भी उठा। उसने सोचा इसके पीछे क्या रहस्य है इसका पता करना चाहिए। किरोड़ी मल अपनी पत्नी सहित दावत में आया। दावत का शानदार प्रबंध देख कर उसकी आँखें फटी की फटी रह गई परन्तु उसने अपने चेहरे पर विस्मय के भाव नहीं आने दिए। जब सब मेहमान चले गए तो किरोड़ी मल वहीं रुक गया। उसने देखा घर में भी चारों ओर ठाठ बाट है। उसने मीठी-मीठ बातों से लाभ मल को टटोलना शुरू किया। लाभ मल स्वभाव से बहुत सरल और सीधा था फिर वह अपने भाई का बहुत आदर भी करता था। थोड़ी देर में लाभ मल ने दीवाली के दिन वाली सारी घटना कह सुनाई। अब तो किरोड़ी मल की लालच का पारावार न रहा। उसने जल्दी से जल्दी उस मटके को हथियाने की योजना बनानी शुरू कर दी। उसने बताया कि वह किस प्रकार सिर से पाँव तक कर्जे में डूबा हुआ है। पिता जी के मरने और उसके घर से चले आने के बाद से ही व्यापार में निरन्तर घाटा हो रहा है। उसने कहा कि इस मटके की मुझे तुम से कहीं अधिक आवश्यकता है। फिर बोला, “अच्छा हो तुम यह मटका मुझे दे दो। आखिर मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ। एक सप्ताह बाद मैं यह मटका तुम्हें लौटा दूँगा। वैसे भी तुम्हारी तो कोई खास जरूरतें हैं ही नहीं जबकि मेरी आवश्यकताओं की तो काई सीमा ही नहीं ।”

 उसने लाभ मल को कुछ भी कहने का अवसर नहीं दिया। उसकी झिझक और मौन को उसने उसकी स्वीकृति ही मान लिया। उसने लाभ मल की एक नहीं सुनी और जल्दी से मटका ले कर चलने के लिए तैयार हो गया। लाभ मल उसे उस मंत्र के विषय में समझाना चाहता था। मटके का प्रयोग किस प्रकार करना है यह भी बताना चाहता था परन्तु किरोड़ी मल तो जैसे कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था। उसे लगा कि कहीं इसका मन न बदल जाए। इसलिए वह जल्दी से जल्दी वहाँ से निकल जाना चाहता था।

घर पहुँच कर उसने अपनी पत्नी को बुलाया और उसको सारी बात बताते हुए कहा कि जल्दी से जल्दी सारी खिड़कियाँ और दरवाजे बंद कर दो। गन्दे से मटके को देख कर रूपमती ने नाक भौं सिकोड़े और किरोड़ी मल ने एक नाली पर मटका रख कर अपने हाथ मुँह धोये। बोला न जाने कितनी गन्दगी से भरा हुआ था। बाद में दोनों पति पत्नी वहाँ आ कर बैठ गए और बोले सबसे पहले तो इस घर का निर्माण सोने की ईंटों से करना चाहिए। पूरी दुनिया में सोने की ईंटों का घर तो किसी का नहीं होगा। इससे पूरे शहर में हमारी अमीरी की धाक जम जायेगी। उन्होंने मटके से कहा जल्दी से जल्दी सोने की ईतनी ईटें दे दो कि हमारा तीन मंलिल का मकान बन सके। उनके कहते ही मटके से लोहे की ईंटें निकलनी प्रारम्भ हो गई। उसने सोचा थोड़ी देर बाद सोने की ईंटें निकली शुरू होंगी। कुछ ही देर में उनके चारों ओर ईंटें ही ईंटें जमा हो गई। किरोड़ी मल ने मंत्र तो सीखा ही नहीं था इसलिए वह ईंटों का निकलना रोक नहीं पाया। साथ में ही सोचा कि बाजार में लोहे का भाव भी कोई कम नहीं है। इन ईंटों को बेच कर आवश्यकतानुसार सोने की ईंटें खरीदी जा सकती है। मटके से बहुत तेजी से ईंटें निकल रही थी थोड़ी देर में वह उनके नीचे दब गए। पूरा मकान भी लोहे के भार से टूट गया। मकान के गिरते ही दोनों वहीं के वहीं ढेर गए। उसके मरते ही मटके से लोहे की ईंटें निकलनी बंद हो गईं।

जब लाभ मल को यह समाचार मिला तो वह रतन गढ़ आया। किसी को कुछ समझ में नहीं आया कि यह सब कैसे हुआ। उसने भाई भाभी का क्रियाकर्म किया और मकान को ठीक करवाने के प्रयास में देखा कि मटका एक गन्दी नाली के उपर रखा है। उस के सामने सारी स्थिति साफ हो गई। वह अपना मटका उठा कर घर की तरफ चल पड़ा। मार्ग में उसे वह बूढ़ा मिला। उसने मटका उसे लौटाते हुए कहा आप यह वापिस ले लें क्योंकि अब मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है। आप इसे किसी जरूरतमन्द को दे देना। मटके को हाथ में पकड़ते ही वह बूढ़ा वहाँ से गायब हो गया। लाभ मल पूरे परिश्रम और ईमानदारी से अपना व्यापार चलाने में जुट गया।


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