अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
02.18.2014


समरसता का दूसरा नाम है होली

अपने अहंकार को, समाज की दहलीज पर न्यौछावर कर देने का पर्व है होली। या फिर यूँ कह लें कि एक दूसरे के साथ पूरी समरसता का दूसरा नाम है होली। होलिकादहन तमस को जला डालने का एक सामाजिक यज्ञ है। पूरे समाज अथवा कुल द्वारा हर साल किया जाने वाला हवन। इसीलिए होली सामूहिक रूप से जलाई जाती है। व्यक्तिवाद का एक कण तक छू नहीं पाता इस त्योहार की आत्मा को। हमारे समाज में प्रकृति से प्राप्त किसी भी वस्तु को स्वयं ग्रहण करने से पूर्व उसका कुछ भाग देवताओं को अर्पित करने की परम्परा है। फाल्गुन पूर्णिमा तक खेतों में फसल पक कर तैयार हो जाती है। नया अन्न देवताओं को समर्पित करने के लिए यह पर्व मनाया जाता है। नये अन्न को यज्ञ की अग्नि में आधा भून कर प्रसाद रूप में ग्रहण करना हमारी संस्कृति का भाग रहा है। संस्कृत में आधा भूना अन्न ’होलक‘ कहलाता है और इसी आधार पर इस पर्व को होलकोत्सव अथवा होलिकात्सव कहा गया। कालान्तर में यह त्योहार होली के नाम से जाना जाने लगा।

फाल्गुन मास मस्त एवं मादक मंद समीर की शीतलता और अठखेलियों का मास है। इसलिए इस त्योहार में मस्ती का रंग सहज रूप से होता है। होली का पर्व वसंत पर्व के चालीस दिन बाद मनाने की परम्परा है। वसंत मानव मन में एक्य और मादकता का संचार करता है। इस प्रकार होली बाह्य एकता और आन्तरिक उल्लास का पर्व है। इस अवसर पर लोग मिल कर जल क्रीड़ा करते हैं। टेसू के फूलों से युक्त जल को चन्दन, केसर और गुलाब तथा इत्र इत्यादि वस्तुओं से सुवासित करके एक दूसरे पर डाला जाता है। यह द्रव्य कीटनाशक होने के कारण स्वास्थ्य के लिए हितकर होता है।

प्राचीन काल से ही रंगीन जल पिचकारियों में भर कर दूर दूर तक लोगों पर फेंका जाता था। इसी जल क्रीड़ा का आधुनिक रूप दूलेंदी को देखने में आता है। बाल, युवा, वृद्ध, स्त्री-पुरुष बिना किसी भेद भाव, ऊँच नीच के इस दिन एक दूसरे पर रंग डालते हैं। गले मिलते हैं और करोड़ों रूपए का गुलाल वातावरण को रंगीन बना देता है। इस दिन समाज के प्रत्येक स्तर का आदमी होली खेलता है। आर्थिक स्थिति किसी की उमंग-तरंग में आड़े नहीं आती। यदि अत्यन्त सम्पन्न वर्ग के लोग इत्र, चंदन, गुलाब मिश्रित रंगों से नए नए वस्त्र पहन कर होली खेलते हैं तो निर्धन अपने चीथड़ों में ही गोबर और कीचड़ को अपनी मस्ती का माध्यम बना लेते हैं। इस दिन पूरा समाज अपने भीतर के शुद्रत्व को बाहर निकाल फेंकता है। होली की यही भावना है कि पूरे समाज में सेवा भाव की महत्ता का उदय हो और जन जन में परस्पर सहयोग स्थापित हो।

होली के अवसर पर माना जाता है कि इस दिन सभी वर्णों के लोग बिना किसी भेद भाव के सपरिवार एकत्र हो कर होली खलेंगे। उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे होलिका का भस्म, सिंदूर, कुकंम के रूप में लगाएँ और शरीर में सर्वत्र मल कर गीत, वाद्य तथा नृत्य के साथ पिशाच क्रीड़ा करें। इस प्रकार इस पर्व का उद्देश्य समस्त जातियों में समानता और एकता के भाव को जागृत करना रहा है। प्राचीन काल में होली के दिन ब्राह्मणों के लिए सर्वाधिक अछूत माने जाने वाले लोगों को भी छूना अनिवार्य होता था। ज्योतिर्निबंध नामक ग्रंथ में कहा गया है कि होलिका दहन के लिए अग्नि किसी चांडाल के घर से अथवा किसी सूतिका स्त्री के घर से किसी बालक द्वारा चुरा कर लाई जानी चाहिए। स्मरणीय है कि होली की पवित्र अग्नि को अग्निहोम के लिए प्रत्येक घर में ले जाने का भी प्रचलन है। यही अग्नि गृहस्थी के घर पूरा साल जलती रहती है। इस प्रकार होली वह महान सामाजिक पर्व है जिसमें वर्ण व्यवस्था का कोई बन्धन नहीं रहता। सब लोग खुले मन से एक दूसरे पर रंग डालते हैं और गले मिलते हैं। परस्पर वैमनस्य, मन की मलिनता और गर्द गुब्बार को बाहर निकाल कर कूड़े करकट की तरह से जला दिया जाता है।

भारत में न तो समाज व्यक्ति पर शासन करता है और न ही व्यक्ति समाज पर। दोनों ही उस विवेक से अनुप्राणित होते हैं जो दोनों में एक समान संचारित होता है। व्यक्ति में जिस भाव का निरूपण होता है उसकी जांच परख समाज में होती है जहाँ उसे विस्तार भी मिलता है। भारतीय अवधारणा में व्यक्ति और समाज में कोई टकराव नहीं। हो ही नहीं सकता क्योंकि पिंड को ही ब्रह्मांड समझने वाली हमारी नजर समाज और व्यक्ति में भेद नहीं करती। दोनों का सम्बन्ध शासक और शासित का नहीं है। दोनों का अद्वैत भाव ही हमारी संस्कृति है। इसलिए होली परस्पर सहयोग का त्योहार है।

यांत्रिक साधनों के अभाव में कोई किसान अपनी फसल अपने दम पर अकेले नहीं काट सकता था और होली का पर्व नई फसल के तैयार होने का पर्व है। इसलिए गाँव-कुल के लोग मिल जुल कर खेतों में फसल काटते थे। आज भी फसल कटाई के समय फसल काटने वाले को नकद मजदूरी के साथ साथ फसल का एक अंश भी दिया जाता है। फसल में दाना पड़ने से पूर्व ही पूरे गाँव में सहयोग का वातावरण बनाने की आवश्यकता को हमारे बुजूर्गों न काफी पहले ही समझ लिया था। होी इसी मानसिक तैयारी का त्योहार है। परस्पर भेद भाव, कुंठाएँ, शिकायतें और शिकवे समाप्त करने तथा “किया कराया सब माफ” करके नये सिरे से सम्बन्ध स्थापित करने का महापर्व है होली।

प्राचीन काल से अविरल होली मनाने की परम्परा को मुगलों के शासन में भी अवरुद्ध नहीं किया गया बल्कि कुछ मुगल बादशाहों ने तो धूमधाम से होली मनाने में अग्रणी भूमिका का निर्वाह किया। अकबर, हुमायूं, जहांगीर, शाहजहां और बहादुरशाह ज़फ़र होली के आगमन से बहुत पहले ही रंगोत्सव की तैयारियाँ प्रारम्भ करवा देते थे। अकबर के महल में सोने चाँदी के बड़े-बड़े बर्तनों में केवड़े और केसर से युक्त टेसू का रंग घोला जाता था और राजा अपनी बेगम और हरम की सुन्दरियों के साथ होली खेलते थे। शाम को महल में उम्दा ठंडाई, मिठाई और पान इलायची से मेहमानों का स्वागत किया जाता था और मुशायरे, कव्वालियों और नृत्य-गानों की महफिलें जमती थीं। जहांगीर के समय में महफिल-ए-होली का भव्य कार्यक्रम आयोजित होता था। इस अवसर पर राज्य के साधारण नागरिक बादशाह पर रंग डालने के अधिकारी होते थे। शाहजहां होली को ‘ईद गुलाबी’ के रूप में धूमधाम से मनाता था। बहादुरशाह ज़फ़र होली खेलने के बहुत शौकीन थे और होली को लेकर उनकी सरस काव्य रचनाएँ आज तक सराही जाती हैं।

भारत ही नहीं विश्व के अन्य अनेक देशों में भी होली अथवा होली से मिलते जुलते त्योहार मनाने की परम्पराएँ हैं। भारत में यह पर्व अपने धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और आर्थिक पक्षों के कारण हमारे सम्पूर्ण जीवन में रच बस गया है। यह पर्व स्नेह और प्रेम से प्राणी मात्रा को उल्लासित करता है। इस पर्व पर रंग की तरंग में छाने वाली मस्ती जब तक मर्यादित रहती है तब तक आनन्द से वातावरण को सराबोर कर देती है। सीमाएँ तोड़ने की भी सीमा होती है और उसी सीमा में बन्धे मर्यादित उन्माद का ही नाम है होली। एक दूसरे के साथ भाई चारा बढ़ाने और मिलजुल कर देश को आगे ले जाने का नाम ही तो है होली।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें