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ISSN 2292-9754

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01.30.2016


ज़िन्दगी

बन कर मकड़ी
अपने ही जाले में
रही सदा जकड़ी
ख़ुद के ही इर्दगिर्द
उलझती रही
जब भी सँभलने को
डोर कोई पकड़ी


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