अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
02.13.2017


सपने बुनती हूँ

 रातों को दिल के करघे पर
सपने बुनती हूँ,
सुबह टूट जाते सारे मैं
किरचें चुनती हूँ।

इक मुद्दत से कहता सुख
अब आऊँ मैं तब आऊँ ,
जाने कब गूँजेगी आहट
गीत ख़ुशी के कब गाऊँ।
कुण्डी खड़केगी मेरी मैं
आहट सुनती हूँ।

क्या कहते कितनी पीड़ा
चुप रहकर हम झेल गए,
दिल की बातें किसे सुनाते
सबसे ही तो मेल गए।
दीमक वाली लकड़ी हूँ मैं
पल पल घुनती हूँ।

रातों को दिल के करघे पर
सपने बुनती हूँ,
सुबह टुट जाते सारे मैं
किरचें चुनती हूँ।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें