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ISSN 2292-9754

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02.13.2017


मन का समर्पण

मेरे भावों अर्पण को
मेरे मन के समर्पण को
कहो क्या तुम समझते हो।
कहो क्या तुम समझते हो।

बहुत से दर्द ऐसे हैं
जो कहकर भी न कह पाये।
है गहरी पीर इक ऐसी
जो चुप रहकर न सह पाये।

हृदय के टूटे दर्पण को
कहो क्या तुम समझते हो।

जो मैंने स्वप्न देखे थे
नहीं वो रूप ले पाये,
हज़ारों कामनाएँ की
तुम्हें पर कुछ न दे पाये।

मेरी चाहत के तर्पण को
कहो क्या तुम समझते हो।

कभी जब कृष्ण की बंसी
मधुर इक तान गाती है,
तभी मीरा भी जाने क्यों
नया इक गीत गाती है।

उसी कमजोर इक क्षण को
कहो क्या तुम समझते हो।


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