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ISSN 2292-9754

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01.30.2016


माहिया

ये राज़ पुराने हैं
खोल दिए सारे
फिर भी ना जाने हैं॥1॥

हमसे वो यूँ बोले
कड़वे बोल बड़े
सुनकर ये दिल डोले॥2॥

ये सीपों में मोती
नदिया सागर से
मिलकर है क्यों रोती॥3॥

प्यारा ये सन्नाटा
इसने ही हमसे
है सारा दुख बाँटा॥4॥

काली कमली ढक कर
सोया है चंदा
बादल तकिया रख कर॥5॥

ये झरनों की कलकल
मन को भाती है
होती हलचल पलपल॥6॥


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