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ISSN 2292-9754

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02.13.2017


किस लिए मन बावरा

कौन बतलाये हुआ है,
किस लिए मन बावरा।
आज के पहले न महका,
था कभी यूँ मोगरा॥

कल मिला था अजनबी बन,
आज मन का मीत है,
झूमकर गाए जिसे मन,
वो मधुर इक गीत है।
एक जादू है चला तो,
बन गया वो साँवरा।
आज के पहले.......

गीत मैंने इक लिखा है,
प्रेम मैं डूबा हुआ,
अब नहीं रहता कभी मन,
एक पल ऊबा हुआ।
एक मुखड़ा गुनगुनाऊँ,
गा रही मैं अंतरा।
आज के पहले......

उड़ चला मन देखिये अब,
थाम कोई कब सके,
है उमंगों से भरा ये,
किस तरह से ये थके।
दूर जाना चाहता मन,
तोड़ कर हर दायरा।

कौन बतलाये हुआ है,
किस लिए मन बावरा।
आज के पहले न महका,
था कभी यूँ मोगरा॥


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