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ISSN 2292-9754

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01.30.2016


दोहे

अब तक हमने था रखा, अपने मन में धीर।
आँखों ने कह दी मगर, तुमसे सारी पीर॥1॥

किससे हम मन की कहें, कौन सुने ये राज़।
रूठे रूठे से यहाँ, बैठे अपने आज॥2॥

जीवन के जिस मोड़ पर, गए हमें वो छोड़।
उनके जीवन ना कभी, आये ऐसे मोड़॥3॥

लिख दी चिट्ठी प्रेम की, सोचा ना परिणाम।
लौटा दी उसने मगर, कहकर के बेदाम॥4॥

प्रेम अगर सच्चा मिले, भव सागर हो पार।
झूठ कपट से तो यहाँ, भरा हुआ संसार॥5॥


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