मंजूषा "मन"

कविता
ऊँचा पहुँचोगे तुम
किस लिए मन बावरा
कौन बतलाये हुआ है
ज़िन्दगी
दोहे
पंख फैलाओ अगर
पहले सपने
मन का कैनवास
मन का समर्पण
माहिया
रातों को दिल के करघे पर
सपने बुनती हूँ