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05.03.2012
 
ठूँठ
मंजु महिमा भटनागर

एक ठूँठ,
जिस पर,
छितराई हुई,
नग्न, पत्र-विहीन
शाखाएँ,
पृष्ठ में,
लाज से आरक्त,
आसमाँ के कपोल,
मुँह छिपाता,
दिवाकर,
पर,
वह ठूँठ
वैसे ही खड़ा है,
न लाज से आरक्त,
न ही मुँह छिपाता हुआ,
अपनी ’नग्नता’ में भी
सौन्दर्य को बनाए हुए
अपने,
आत्मबोध को जिलाए हुए


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