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मैं गंधारी नहीं,
कि
पतिव्रत पालन हेतु,
बाँध लूँ पट्टी अपनी,
आँखों पर,
बनिस्पत इसके कि
अपने पति की आँखें बन सकूँ.
मैं अहिल्या भी नहीं,
कि छलावे की भागीदार,
बनकर
पति संशय की ख़ातिर,
बनाया जाऊँ शिला पत्थर की,
मैं नहीं सीता भी,
कि
जिसे अपनी पतिव्रता सिद्ध.
करने हेतु,
करना पड़े अग्नि-प्रवेश
और
अंतत: बनाए
रखने को अपनी,
गरिमा
बाध्य हो जाऊँ
समा जाने को
धरती में।
बस...बस...बस...
हो चुकी -
बहुत मनमानी
महानता की आड़ में,
सच ही मैं
सीता नहीं,
अहिल्या नहीं,
न ही हूँ गान्धारी,
मैं तो हूँ बस
वर्तमान की नारी,
अपनी अस्मिता
के साथ
अब और न उठा
सकूँगी,
पुरुष के अंह का भार,
हम दोनों,
साथी हैं,
साथ साथ चलेंगे
अपने अपने
व्यक्तित्व के साथ,
संघर्षों के,
जीवन पथ पर,
बिना महानता को ओढ़े
रचना है हमें,
वर्तमान
न कि इतिहास ओ’ पुराण
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