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04.28.2014


माँ के क़रीब

जाओ आज के दिन
माँ के क़रीब जाओ,
और प्यार से सहलाओ उसे,
देखो कोई दर्द तो नहीं
दबा रखा है उसने?

जाओ, झाँको उसकी
झील सी आँखों में,
करो कोशिश उतरने की उसमें
देखो अधूरी चाहतों के मोती,
छिपे होंगे कहीं उसके तले में।

थामों उसकी हथेलियों को,
अपने मुलायम हाथों में,
हाथ की लकीरों में छिपे होंगे,
उसके कटु-अहसासों के छाले।

छुओ उसके चरणों को,
दबाओ हलके से,
और पहचानो उसकी टीस से
कि कितने काँटों की चुभन,
सही है उसने, तुम्हें आगे बढ़ाने में।

यदि कामयाब हो गए,
ढूँढने में एक भी छिपा दर्द,
समझो कि एकांश अदा कर दिया
तुमने उसके क़र्ज़ का।
जाओ, आज अपनी माँ के क़रीब जाओ।


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