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| 09.09.2007 |
| कुछ पता भी न चला मंजु महिमा भटनागर |
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धीमे-धीमे तुम्हारी बातों की आदत हो गई मुझे,
और कब तुम्हारे ख़्यामल ’हम-ख़्याल’ हो गए, कुछ पता भी न चला। यूँ तो बहुत सी राहें थीं, मेरे कदमों के लिए, पर कब मेरे कदम तेरे ’हम-कदम’ हो गए, कुछ पता भी न चला। हँस रहे थे हम भी ज़माने के साथ, पर कब ग़म से तेरे, आँख मेरी ग़मगीन हो गई, कुछ पता भी न चला। कहाँ धरती, कहाँ आसमाँ? दूरी थी बहुत, कब झुक आया आसमाँ पाषाणी कुचों पर, कुछ पता भी न चला। भावनाओं के गहराते मेघों से भीगी पीत धरती कब हरी हो गई, नीलाकाश के सहवास से, कुछ पता भी न चला। |
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