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05.03.2012
 
कुछ पता भी न चला
मंजु महिमा भटनागर

धीमे-धीमे तुम्हारी बातों की आदत हो गई मुझे,
और कब तुम्हारे ख़्यामल ’हम-ख़्याल’ हो गए,
कुछ पता भी न चला।
यूँ तो बहुत सी राहें थीं, मेरे कदमों के लिए,
पर कब मेरे कदम तेरे ’हम-कदम’ हो गए,
कुछ पता भी न चला।
हँस रहे थे हम भी ज़माने के साथ,
पर कब ग़म से तेरे, आँख मेरी ग़मगीन हो गई,
कुछ पता भी न चला।
कहाँ धरती, कहाँ आसमाँ? दूरी थी बहुत,
कब झुक आया आसमाँ पाषाणी कुचों पर,
कुछ पता भी न चला।
भावनाओं के गहराते मेघों से भीगी पीत धरती
कब हरी हो गई, नीलाकाश के सहवास से,
कुछ पता भी न चला।


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