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ISSN 2292-9754

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04.05.2017


आधी आबादी की प्रतिभाओं का आकाश

मानवीय सभ्यता संस्कृति के विकास क्रम में स्त्री-पुरुष जीवन रथ के दो पहिए हैं। सृष्टि सृजन में दोनों का समान योगदान होता है। नारी जननी, माँ, बेटी, पत्नी, बहन, नानी, दादी बन समाज, परिवार को पोषित करती है। नारी को कई दैवीय रूपों में पूजा जाता है। ऐश्वर्य के लिए लक्ष्मी, शक्ति के लिए दुर्गा, ज्ञान के लिए सरस्वती।

संस्कृत का श्लोक है – "यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवताः" अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। वैदिक काल में गार्गी जैसी विदूषी स्त्री ने यज्ञवलक्य को शास्त्रार्थ में हरा दिया था। कहने का तात्पर्य यह है कि उस ज़माने में स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त थे। स्वतंत्रता-स्वच्छंदता थी।

मध्यकालीन युग में नारियों की दशा बरबस, बेचारी-सी हो गई। उसे पाँव की जूती मानने लगे और नारी परिवार-समाज की संकुचित सीमाओं में बँध कर रह गई। पुरुष प्रधान समाज में नारी के नारीत्व का हरण होने लगा। पुरुषों ने नारी को राजनैतिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से पंगु बना दिया।

हिंदी साहित्य के वीरगाथा कल से रीतिकाल तक कवियों का दृष्टिकोण नारी के प्रति सीमित, अशोभनीय रहा है। उसे सुरा-सुन्दरी, भोग्या, पुरुष की दासी, चल सम्पत्ति के रूप में परोसा जाने लगा।

आधुनिक काल में नारी का दमन, शोषण, असमानता, अत्याचार, प्रताड़ना, भेदभाव को सहते हुए चूल्हा-चौका सँभालते हुए भी बेचारी घर की चार दीवारी में सिसकती रहती है। तभी मैथिलीशरण गुप्त ने कहा-

"अबला जीवन हाय, तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में है दूध, आँखों में है पानी।"

प्रकृति के चितेरे सुमित्रानन्दन पन्त की पंक्ति है नारी पीड़ा को देख कर-

"मुक्त करो नारी को
चिर बंधन नारी का।"

नारी को आज भी क्या स्वतन्त्र है? विचारणीय है। नारी सही मायने में स्वतंत्र है क्या?

समय ने करवट बदली। व्यक्ति बंधन सहर्ष स्वीकार नहीं करता। वह बंधन मुक्त रहना चाहता है। पाश्चात्य जगत के प्रभाव से भारतीय नारी समाज अत्यधिक प्रभावित हुआ है, उनको देख कर भारत में नारी-स्वतंत्रता के आन्दोलन चलाए गए। नारी-शिक्षा से भारत में नारियों में चेतना जागी, विचार बदले, जागरूकता जागी। जिससे आज नारी को दोयम दर्जे देने वाले नारी लोक में बदलाव आया। मेरे अनुसार-

सबला जीवन वाह, तेरी महिमा न्यारी।
आँखों में खुशी की चाह, प्रेम-त्याग पर वारी।

-मंजु गुप्ता

महिला स्वतन्त्रता काग़ज़ों पर सार्थक नहीं हो सकती है। जहाँ पर सारी स्त्रियों का लक्ष्य यही होता है कि हमने क्या पाया, क्या खोया क्या उपलब्धियाँ हासिल की हैं? किस तरह अपने कार्यों, व्यक्तित्व के द्वारा पुरुष प्रधान समाज में संवैधानिक समानता का दर्जा मिले। भविष्य की चुनौतियों को स्वीकार कर शिखर पर पहुँचे। वैश्विकरण के दौर में समाज, परिवार में अपनी शैक्षिक योग्यता, प्रतिभा, हौसलों की उड़ानों से सामाजिक बदलावों में मुख्य भूमिका निभाई है।

रचनाधर्मिता नारी का वैशिष्ट्य है, नारी की सृष्टि का मूल है, वह रचे बिना नहीं रह सकती है। २१वीं सदी की नारी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही है। आज की नारी के आँचल में दूध की ताक़त, आँखों में पानी के बदले समृद्धि, सफलता, समाजिकता, विकास के उन्नत सपने हैं। रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा- "स्त्रियाँ घर में प्रकाश करने वाली देवियाँ हैं और आत्मा का प्रकाश हैं।"

स्त्रियाँ एक समर्थ-सार्थक समाज की रचना में साझेदारी के संकल्प से भरी भूमिका निभा रही हैं। विकास कर्म में स्त्री पुरुष से आगे है। पुरुष पूर्ण विकास के लिए पहुँचे तो वह स्त्री हो जाएगा।

क्या भारत आज़ादी में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर स्त्रियों ने सहयोग नहीं दिया था? क्या देवासुर संग्राम में दुर्गा ने कोशिका का रूप धारण कर शुंभ-निशुंभ का वध नहीं किया था?

वर्तमान संदर्भ में नारी में पुनः चेतना आई है गुणों, प्रतिभा से भरी नारियों में जागरण के बीज अंकुरित हुए हैं। ज्योतिबा फूले, सावित्रीबाई फूले, सरोजनी नायडू, इंदिरा गांधी, प्रतिभा पाटील, बॉक्सिंग की मेरी कॉम, किरन बेदी, कल्पना चावला आदि इस प्रसंग में उल्लेखनीय है। हाल ही में अपनी योग्यता से अरुंधती भट्टाचार्या स्टेट बैंक की चेयरमन बनीं। इससे अधिक आशाजनक और क्या हो सकता है कि पारिवारिक प्रतिकूलताओं, विषमताओं, दबाबों से घिरे होने बावजूद चुनौतियों को स्वीकार करते हुए स्त्री शक्ति अपनी बेहतरी के लिए बाहर निकल रही है, आर्थिक संपन्नता ला रही है, अपने हक़ के लिए बाहर निकल रही है और अपनी हक़ की लड़ाई के लिए अपनी आवाज़ खुद मुखर कर रही है। सभी क्षेत्रों में नारी काम कर आगे बढ़ी है, इस जीवन की गाड़ी दो पहियों से चलती है एक पुरुष, दूसरी स्त्री। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। हमारे संविधान ने स्त्रियों को पुरुषों के बराबर दर्जा दिया है।

आज माहौल, वातावरण, परिवेश और समाज में परिवर्तन दिखाई देता है। ख़ुद स्त्रियाँ अत्याचारों, दहेज, बलात्कारों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रही ऴैं। यूनीसेफ, मानव अधिकार, महिला आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग, सरकार की एजेंसियाँ भी स्त्रियों पर हो रहे ज़ुल्म को, मानसिक त्रासदियाँ आदि को बढ़ावा न मिले ठोस क़दम, नियम, क़ानून, योजनाएँ बना रही हैं।

केन्द्रीय सरकार की "महिला प्रकोष्ठ" ने महिलाओं को आत्मबल दिया है; आत्म सम्मान को बढ़या है। अब तो भारत की महिला आँन लाइन शिकायत भी दर्ज कर सकती है।

भारत में स्त्री-स्वतन्त्रता, सशक्तिकरण का जागरण हो गया है। रेलों की ड्राइवर, पायलेट, शिक्षिका, जल, थल, नभ सेना, कार्पोरेट जगत, बैंक आदि सभी आयामों में स्त्रियाँ बुलंदियाँ छू रही हैं। हाल ही में गणतंत्र दिवस २६ जनवरी २०१५ की परेड में विंग कमांडर पूजा ठाकुर ने मा. ओबामा जी को गार्ड ऑफ़ ऑनर दे कर नारी शक्ति का परिचय दिया।

रियो ओलिंपिक में बेडमिंटन में पीवी सिन्धु ने रजत पदक जीता, साक्षी मालिक ने कुश्ती में ब्रांज पदक जीता और त्रिपुरा की दीपा ने जिमिनास्टिक में प्रोडूनोवा की कलाबाज़ी कर के चौथा स्थान प्राप्त किया। जिमिनास्टिक को देश में पहचान दीपा ने दिलवाई। इन बेटियों ने कामयाबी का परचम देश, विश्व में फहरा दिया। लाखों बेटियों, लड़कियों की ये प्रेरणा बनीं हैं।

बॉलीवुड स्त्रियों की सशक्तिकरण का पक्षधर रहा है सुपर हिट फिल्म क्वीन में हीरो का स्थान गौण था, कंगना ने केन्द्रीय भूमिका निभा के अपने अपने अभिनय का लोहा मनवा दिया। प्रियंका चौपड़ा बॉलीवुड के साथ हॉलीवुड में अपने काम से देश का नाम रोशन कर रही हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता तृप्ति देसाई ने पुरुष प्रभुत्व शनि शिंगणापुर में, हाजीअली दरगाह में स्त्रियों का प्रवेश करा के धार्मिक क्रांति कर दिखाई। भारतीय मूल की इंदिरा नूयी नव निर्वाचित अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की सलाहकार समिति की सदस्या हैं।

हाल ही में ६ बार रही तमिलनाडू की मुख्यमंत्री, तमिल फिल्मों की अभिनेत्री जय ललिता उर्फ़ अम्मा की अंतिम विदाई में लाखों की भीड़ ने रो-रो के विदाई दी, उनके शोक में ५९७ लोगों की मौत हुई। उनकी सारी योजना गरीबों, दलितों, जनता से जुड़ी हुई थीं। जो अम्मा ब्रांड थीं। गरीबों की वे मसीहा थीं। अम्मा मोबाइल, मिक्सर ग्राइंडर, साइकिल महिलाओं को मुफ़्त में बाँटती थीं। इसी तरह राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे उनसे प्रेरित हो के अम्मा की तरह अपने राज्य काम करना चाहती हैं। अब पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों को अपनी सोच, मानसिकता बदलनी होगी।

महिलाओं ने ख़ुद संघर्ष कर अपनी पारम्परिक छवि को तोड़कर पुरुषों के हर क्षेत्र में बराबरी में जगह बनाई है। परिवार, समाज, देश के नव निर्माण, विकास नई नई दिशा दे रही हैं।

नारी तो ऊँची रही और रहेगी क्योंकि पुरुष को जन्म देने वाली नारी ही तो है।

नारी जागरण की स्वरचित पंक्तियाँ -

अब दब नहीं सकती हिन्द की नारियाँ
जो दबाए उसे कोई बनेगी चिंगारियाँ
नहीं अब वे भोग-लिप्सा की तितलियाँ
वे कार्योँ-गुणों की चमकती बिजलियाँ
जागी है भारती युग है बदल रही
सेवा, शुचिता,शिक्षा, प्रेम, त्याग से
करके क्रान्ति पहचानी अपनी शक्ति।

- मंजु गुप्ता

कटु सत्य है स्त्री को आज़ादी मिली है लेकिन स्त्रियों पर आज भी अत्याचार हो रहे हैं। एसिड फेंकते हैं, इज़्ज़त लूटते हैं, बाल विवाह, दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या आदि क़ायम हैं। घर-समाज में पुरुषवादी मानसिकता का बोलबाला है। अतः देश-समाज विकास के लिए पुरुष प्रधान समाज महिलाओं के हिफ़ाज़त की शपथ ले, सम्मान करे, बराबरी का अवसर दे, लैंगिक भेदभाव न हो, महिलाओं को सशक्त बनाएँ। स्त्री शक्ति को परिभाषित करने के लिए मा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने "बेटी बचाओ पढ़ाओ" योजना की शुरुआत कर सराहनीय क़दम उठाया है।

अंत में नारी को शोषित, दलित बनाए रखना असंभव है ।

इस युग में नारी सम्मान की भावना बढ़ी। युग की क़ैद में नारी को मुक्त कराने के लिए आवाज़ें उठने लगीं। कवि ने कहा जैसे -

"मुक्त करो नारी को
मानव चिर वंदनी प्यारी को
युग-युग की बर्बर कारा से
जननी सखी प्यारी को।"

स्त्री विमर्श से नारी-स्वतन्त्रता को बल मिला।

नारी सशक्तिकरण आयामों पर खूब साहित्य लिखा जा रहा है। अब नारी अबला से सबला हो रही है। पुरुष के साथ कंधे से कन्धा मिला कर काम कर रही है। अपनी प्रतिभा के दम पर देश की बहादुर बेटियाँ भावना, मोहना, अवनी वायु सेना की महिला फाइटर बन आकाश की बुलंदियों को छू रही हैं।

नारी शक्ति को समर्पित मेरी यह रचना –

दुर्गा – सी देश की बेटियाँ
अवनि, मोहना, भावना
भर के हौसलों की उड़ान
थाम वायु सेना की कमान
छू रहीं आधी आबादी का आसमान
गले लगा रही स्त्री-आजादी को जहान।

-मंजु गुप्ता

नारी अपनी प्रतिभा, हिम्मत हौसलों की कामयाबी की मसाल से दुनियाभर में स्वयं अपने रास्तों को प्रकाशित कर रही है। महिला-स्वतन्त्रता से समाज, देश की स्थिति बेहतर हुई है। सपनों को साकार करने के लिए उन्हें उन्मुक्त गगन मिला है। ज़रा सोचो सारा आकाश, धरा उनके क़दमों में है। उसकी गूँजे अनुगूँज-

"न ज़मीन-आसमां की चिंता हमें
न तान-ओ तशनी की फ़िक्र हमें
जिस धरा पर जन्म लिया हमने
वह सारी धरा, सारा जग हमारा है।"

अंत में मैं अपनी ही मिसाल दे रही हूँ

मेरी दोनों डाक्टर बेटियाँ हिमानी, शुचि ने मेरा कार एक्सीडेंट होने पर मुर्दा हुई माँ को सेवा कर के पुन्हः ज़िंदा कर दिया।


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