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ISSN 2292-9754

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05.25.2016


यूँ तो शहर से शहर सट गये

यूँ तो शहर से शहर सट गये
हम भाषा मज़हब में बट गये

देखी जो उनके चेहरे की रंगत
हम उनकी राहों से ख़ुद हट गये

ख़त्म हो रहा दौर अब वह पुराना
परिवार चार बंदों में बट गये

क्या जान पाएँगे हम दर्द उनका
आज़ादी की ख़ातिर जो सर कट गये

जुनूं चढ़ रहा पैसे का इस क़द्र
अब जीवन के मूल्य घट गये

ऊँची उड़ान की चाह थी जिनको
उन ही परिंदों के पर कट गये


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