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ISSN 2292-9754

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05.25.2016


न जाऊँगी बेटा मैं गाँव को छोड़

न जाऊँगी बेटा मैं गाँव को छोड़
पाँव रोकेगी यादें खड़ी हर मोड़

दुल्हन बनकर इक दिन यहीं थी मैं आई
अर्थी भी अब तो यहीं से ही जाये
लगी है शहर में जीवन की होड़
न जाऊँगी .........

ये ताल तलैया औ गाँव की गलियाँ
बरगद और नीम की मीठी सी छइयाँ
यही हैं तो मुझे मेरे लाख करोड़
न जाऊँगी .......

ये आबोहवा हैं बसी मेरे मन में
ज़ुदा कर न पाऊँगी इसको मैं तन से
है जीवन का मेरे यही तो निचोड़
न जाऊँगी .......

यह दर औ दरीचे जीवन के साथी
जली और बुझी यहीं जीवन की बाती
जाऊँ कैसे पुराना रिश्ता मैं तोड़
न जाऊँगी .......

न जाऊँगी बेटा मैं गाँव को छोड़
पाँव रोकेंगी यादें खड़ी हर मोड़।


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