अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
02.09.2017


मग़रूर तेरी राहें

मग़रूर तेरी राहें
किस तौर फिर निबाहें

मशगूल तुम हुए हो
महरूम मेरी चाहें

तुम पास गर जो होते
महफूज़ थीं फ़िज़ाएँ

किससे गिला करें अब
मायूस मेरी आहें

बदली है चाह इनमें
मख़्मूर जो निगाहें

तुम जो जुदा हुए हो
महदूद मेरी राहें

टूटा हुआ ये दिल है
तस्की इसे दिलाएँ।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें