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ISSN 2292-9754

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11.16.2016


बिछड़ डाली से केवल

बिछड़ डाली से केवल ये नहीं शृंगार बनता है
गुलों का चीर कर दिल तब कहीं इक हार बनता है

किसी ने दी शहादत इस जहां अपने ही प्यारों की?
गुरु गोबिंद जैसा कौन अब किरदार बनता है

न आया है न आयेगा यहाँ कोई भगत सिंह सा
भगत जैसा जो हो विरला वही सरदार बनता है

गलाकर फिर बनाओगे रहूँगा तो वही सोना
मगर किरदार मेरा इक नया हर बार बनता है

खिले हैं गुल हज़ारों मुख़्तलिफ़ अहले जहां में तो
नहीं इक फूल के खिलने से ये संसार बनता है।


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