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07.19.2014


तुम

तुम यहाँ के, तुम वहाँ के
कितने कितने तुम....

कितनी ’मैं’ से बातें करते
कितने हिस्से तुम।

सारे दिन का साथ तुम्हारा
सारी रात हो तुम

सारे सारे सपने तुम हो
सारे अपने तुम।

संकेतों में नहीं समाते
इतने गहरे तुम

तुफ़ानों के बीच भॅंवर में
जैसे ठहरे तुम।

पत्ता-पत्ता, पानी-पानी
ठोस, तरल हो तुम

बहता-बहता, रुकता, फिरता
एक समय हो तुम।

सूने सूने रात समय की
रुंजन-गुंजन तुम

कोलाहल से भरी उषा में
मौन समाधी तुम।

उठती किरणें, झुकता अंबर
कोमल हलचल तुम

मेरे सुने अवकाशों में
गहरे बादल तुम ।

चाहूँ जब भी तुमसे छू लूँ
चाहूँ तब बंद कर लूँ

जब भी चाहूँ जीतूँ तुमसे
जब चाहे खुद हर लूँ


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