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04.17.2014


तकलीफ़ भरी ख़ामोशी

तकलीफ़ भरी ख़ामोशी में
क्यों जलती रोशनी सी कवितायें

क्यों किसी बेजान रात में
सपनों में आती ज़िंदगी
हिलाकर रख देती है
वफ़ादारी भरे रिश्ते

क्यों आत्मायें अकेले
आवास ढूँढती
किसी अंजान जगहों पर,
निर्जन पहाड़ियों पर

क्यों सागर की गाज में अपने
अंतर्मन की परछाई देखते;
घुप्प अँधेरे में, सर्द रेत में
पड़े रहते अनपहचाने से
अपने ही देह

एक खुलापन आत्मा का
एक नंगापन शरीर का
एक उन्माद मन का
क्या इतना ही टटोला जाना होता है
समय के गर्भ में भी?

गाज (मराठी शब्द) = सागर की लहरों की शेर जैसी दहाड़

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