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ISSN 2292-9754

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07.25.2014


जाने कैसी राह

जाने कैसी राह बनी है
जाने कैसी चाह बनी है
ना बनता है चलना उसपर
ना छोड़ी वह जाती है।

जानी है; अनजानी भी है
अपनी सी होकर है परायी
काटों से जो बिछी पड़ी है
फिर भी क्यों मन को है भाती।

घुट-घुट कर चलना उसपर
चलना भी क्या चलना है?
हाय छोड़ना उसको यह तो
आत्मदाह को वरना है!

फिर भी निर्णय घड़ी का आना
’मरण बुलावा’ जैसा है
किसी एक को वरना यह तो
ख़ुद ही ख़ुद से छलना है!


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